बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत में रोजगार से जुड़ी चुनौतियां
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भारत में रोजगार से जुड़ी चुनौतियां

अमिताभ कांत /  February 08, 2019

आने वाले समय में ऐसे लोगों की आकांक्षाएं पूरी करना एक चुनौती होगी जो रोजगार में तो लगे हैं, लेकिन अधिक आय की लालसा रखते हैं। आलेख के दूसरे एवं अंतिम भाग में बता रहे हैं अमिताभ कांत

 
यह पूरी तरह स्पष्ट है कि आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) पीएलएफएस के नतीजों की पिछले रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (ईयूएस) से तुलना नहीं की जा सकती। पीएलएफएस का इस्तेमाल 2017-18 के आधार से बदलावों को मापने में किया जाना चाहिए। हम पहले भी यह देख चुके हैं। भारत में सर्वेक्षण करना हमेशा पेचीदा रहा है और सर्वेक्षण पद्धति में छोटे से बदलाव से अप्रत्याशित नतीजे सामने आए हैं। पीएलएफएस में श्रम बल की भागीदारी की दर में गिरावट को भी उजागर किया गया है। अगर यह सही भी है तो इसमें यह उल्लेख नहीं किया गया है कि इसकी वजह स्कूलों में उपस्थिति में बढ़ोतरी या उच्च शिक्षा जैसे कारक हो सकते हैं। 
 
समस्या सर्वेक्षण की पद्धति में है। नमूने का आकार बहुत छोटा था, जबकि तकनीक की मदद से ज्यादा परिवारों से प्रतिक्रिया हासिल की जा सकती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वेक्षण किए गए परिवारों की संख्या महज 55,000 थी। इसे देश में 16 करोड़ परिवारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस तरह नमूने का प्रतिशत 0.03 फीसदी यानी हर 10,000 पर करीब तीन परिवार। परिवारों के चयन में भी 75 फीसदी भारांश उन परिवारों को दिया गया, जिनमें 15 साल से अधिक उम्र के 10वीं पास लोगों की संख्या अधिक थी। वर्तमान स्थिति में 15 साल की उम्र के बाद भी शिक्षा को जारी रखने की संभावना होती है। 15 से 18 साल की उम्र के ज्यादातर लोग शिक्षा ग्रहण करना जारी रखते हैं। जो पढ़ाई कर रहे हैं, वे इस तरीके से जबाव देंगे कि वे रोजगार ढूंढ रहे हैं। नमूने का आकार इतना छोटा है कि आंकड़ों की संवेदनशीलता बहुत अधिक होगी। शहरी परिवारों में एक परिवार के प्रत्येक क्षेत्र में गलत जवाब देने पर श्रम बल की भागीदारी दर संख्या 25 फीसदी के दायरे में दिखेगी। इनकी तात्कालिक आंकड़ों से पुष्टि करने का कोई स्रोत नहीं है। सर्वेक्षण में जिन सर्वेयरों की सेवाएं ली गईं, वे बाहरी एजेंसी के थे। यह जरूरी नहीं कि वे लोगों से बातचीत करने के लिए सही व्यक्ति हों। हालांकि इन सर्वेयरों को डेटा रिकॉर्डिंग के लिए एक टैबलेट मुहैया कराया गया, लेकिन उन्हें सिम और डेटा कनेक्टिविटी नहीं दी गई। यहां तक कि जगहों की भी तस्वीरें नहीं ली गईं। मैं इस बात से अचंभित हूं कि आज की दुनिया में भी तात्कालिक डेटा और तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया। 
 
एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछा जा सकता है कि वर्तमान में भारत में रोजगार सृजन की स्थिति क्या है? सामाजिक सुरक्षा लाभों में योगदान देने वाले लोगों के बारे में अब हमारे पास वृहद आंकड़े उपलब्ध हैं। ये आंकड़े हमें कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ), कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) और राष्ट्रीय पेंशन फंड (एनपीएस) के माध्यम से प्राप्त होते हैं। सितंबर 2017 से नवंबर 2018 तक ईपीएफओ के साथ 73,50,786 नौकरीशुदा लोग जुड़े। दूसरे शब्दों में कहें तो हरेक महीने कुल 490,000 लोग इससे जुड़े हैं। ईएसआईसी भी लगभग यही कहानी बयां करता है। सितंबर, 2017 से नवंबर 2018 के बीच औसतन लगभग 10 से 11 लाख लोग हरेक महीने ईएसआईसी के साथ जुड़ते चले गए। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें कि इनमें 50 प्रतिशत लोग ईपीएफओ से भी जुड़े हैं तो भी हरेक महीने 1 लाख और सालाना 12 लाख लोग औपचारिक रोजगार के दायरे में आए। एनपीएस का विश्लेषण करने से पता चलता है कि सरकार केंद्र एवं राज्य सरकारों में 6 लाख से अधिक नौकरियां सृजित हो रही हैं। 
 
देश में परिवहन क्षेत्र भी रोजगार के आंकड़े की झलक पेश कर रहा है। इसके लिए व्यावसायिक वाहनों की बिक्री पर विचार करें। भारत में वित्त वर्ष 2018 में 750,000 वाहनों की बिक्री हुई। इनमें अगर 25 प्रतिशत नए वाहन पुराने वाहनों की जगह खरीदे गए हैं तो भी आंकड़ा 560,000 के करीब रहता है, जो किसी दृष्टिकोण से कम नहीं है। अगर हरेक वाहन दो लोगों को रोजगार दे रहा है तो इस दर से इस क्षेत्र में सालाना 11 लाख नौकरियां जोड़ी जा रही हैं। इनमें अगर कारों की बिक्री भी शामिल कर लें तो केवल इस क्षेत्र में सालाना 30 लाख नौकरियां सृजित हो रही हैं। भारत में स्वरोजगार भी रोजगार सृजन का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। पेशेवर सेवा प्रदाताओं जैसे चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील और डॉक्टर के माध्यमों से भी रोजगार सृजन होता है। इन पेशेवरों के कामकाज पर नजर और इनका नियमन करने वाली संस्थाओं के आंकड़ों से यह बात जाहिर हो जाती है।
 
आयकर आंकड़े तेजी से बढ़ रहे नए स्वरोजगार का संकेत दे रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार समीक्षा वर्ष 2014-15 और 2017-18 के बीच कर दाखिल करने वाले सालाना 150,000 नए पेशेवर जुड़े। इससे यह भी पता चलता है कि इनमें ज्यादातर करदाता सहायता के लिए कर्मचारी रखते हैं, जिनकी संख्या 20 से कम होती है। कर्मचारियों की संख्या 20 से अधिक होने पर सामाजिक सुरक्षा पंजीयन कराना अनिवार्य हो जाता है। अगर प्रत्येक पेशेवर पांच लोगों की भी सेवाएं लेता है तो यह आंक ड़ा बढ़कर सालाना 750,000 हो जाता है। मुद्रा योजना के तहत 15.56 करोड़ ऋण जारी हो चुके हैं। इन ऋणों का कुल मूल्य करीब 7 लाख करोड़ रुपये होता है। पहली बार ऋण लेने वाले 4 लाख से अधिक लोगों ने अपने कारोबारी उद्यम शुरू किए हैं। छोटे उद्यमियों को इतनी बड़ी तादाद में ऋण दिए जाने से बड़ी संख्या में रोजगार सृजित हुए हैं।
 
मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट 'इंडियाज लेबर मार्केट-अ न्यू एम्फेसिस ऑन गेनफुल इम्प्लायीमेंट' में कहा गया है कि सरकार की तरफ से व्यय बढऩे और स्वतंत्र रोजगार और उद्यमशीलता का विकास होने से 2014-17 के दौरान 2 से 2.6 करोड़ लोगों के लिए रोजगार बढ़े हैं। पर्यटन मंत्रालय के एक विश्लेषण के अनुसार पिछले चार वर्षों में अकेले पर्यटन क्षेत्र ने 1.46 करोड़ रोजगार के अवसर सृजित किए हैं। हालांकि ऊपर वर्णित आंकड़े रोजगार सृजन का पूर्ण ब्योरा नहीं देते हैं, लेकिन ये देश में तेजी से हो रहे रोजगार सृजन का पुख्ता प्रमाण हैं, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है। दूसरी तरफ रोजगार कम होने जैसी धारणा नकारने के लिए ये आंकड़े पर्याप्त हैं।
 
क्या इन तथ्यों से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि भारत में रोजगार से जुड़ी चुनौतियां नहीं हैं? ऐसा कहना भी सच्चाई से भागना होगा। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत की मुख्य चुनौती उन लोगों की अपेक्षाएं पर खरा उतरने की है, जो रोजगार तो कर रहे हैं, लेकिन अधिक आय की लालसा रखते हैं। इसके लिए औद्योगिक क्षेत्र के मौजूदा कर्मचारियों और जो लोग कृषि क्षेत्र से बाहर निकलना चाहते हैं, उनके लिए अधिक आय देने वाली नौकरियां सृजित करने की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति तैयार करने के लिए ऐसी नीतियों की जरूरत होगी, जो देश में उत्पादकता बढ़ाती हैं। जहां तक पीएलएफएस की बात है तो मेरा मानना है किइस परियोजना से मिले अनुभव को आधार पर बनाकरतकनीक और वास्तविक समय के आंकड़े के इस्तेमाल से और नमूने का आकार बढ़ाकर सर्वेक्षण की गुणवत्ता में सुधार किया जाना चाहिए। केवल मोटे अनुमानों से मदद नहीं मिलती है। अगर आयोग के सदस्य के तौर पर एक प्रति मुझे मिली होती या मसौदा रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए संपूर्ण आयोग की बैठक हुई होती तो ये मुद्दे मैंने उठाए होते। 
 
(लेखक नीति आयोग के सीईओ है। ये उनके निजी विचार हैं।)
Keyword: employment, BJP, narendra modi, NSSO,,
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