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फिर कल्याण का दौर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  February 08, 2019

वर्ष 2014 में अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण के पहले पैराग्राफ में 'नव मध्य वर्ग' का उल्लेख किया था। भाषण समाप्त होने के पहले भी उन्होंने कम से कम दो बार ऐसा किया। इसके विपरीत गत सप्ताह पीयूष गोयल के बजट भाषण में 12 करोड़ किसान परिवारों के लिए महत्त्वाकांक्षी कल्याण योजना की घोषणा की गई। सरकार ने आकांक्षापूर्ण वर्ग पर ध्यान देने से आम आदमी तक का सफर तय कर लिया है। इसके बावजूद बीच के पांच वर्षों में प्रति व्यक्ति आय में करीब एक तिहाई की बढ़ोतरी हुई। यह किसी भी अन्य देश से अधिक थी। ऐसे में वृद्घि के लाभ का असमान वितरण लाजिमी था। परंतु इसके बावजूद बहुआयामी गरीबी सूचकांक पर आधारित संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015-16 तक के दशक में गरीबी का स्तर आधा हो गया। करीब 27 करोड़ लोग इस अवधि में गरीबी के भंवर से बाहर निकले। इस बीच देश की आधी आबादी के पास स्मार्ट फोन हैं और प्रति स्मार्ट फोन इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले हम दुनिया के सबसे बड़े देश बन गए। इन पांच वर्षों में करीब 9 करोड़ स्कूटर और मोटर साइकिल खरीदी गईं जबकि इससे पिछले तीन वर्ष में यह आंकड़ा 4 करोड़ था। यानी 2011 से अब तक यह आंकड़ा 13 करोड़ पहुंच चुका है। जनगणना के मुताबिक देश के हर पांच में से एक परिवार के पास पहले ही इंजन वाला दोपहिया वाहन है। आज यह आंकड़ा दो परिवारों में एक वाहन तक पहुंच गया होगा। पिछले वर्ष हर दिन करीब 6.66 लाख लोगों ने विमान यात्रा की। यह विमानन में निजी क्षेत्र के प्रवेश के समय के यात्रियों का 25 गुना है। अगर हम आकांक्षा को ध्यान में रखें तो हमने कुछ तो हासिल किया है। 

 
सवाल यह है कि नव मध्य वर्ग से आम आदमी तक इस बदलाव को कैसे समझा जाए। खासकर कर्ज माफी, कर छूट और नकद राशि देने के इस दौर में। यह काफी हद तक सन 1971 की याद दिलाता है जब गरीबी हटाओ का नारा दिया गया था। आज हमारी प्रति व्यक्ति आय उस दौर से सात गुना अधिक है। हां, एक अंतर अवश्य है। इंदिरा गांधी ने पहले अमीरों पर कर लगाकर और राज्य का प्रभुत्व इस्तेमाल कर अमीरों से पैसे निकलवाए, उसके बाद उन्होंने कल्याण योजनाओं की मदद से गरीबों की सहायता की। नरेंद्र मोदी ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को कांग्रेसी विफलता का प्रतीक बताकर सही किया था लेकिन उन्होंने खुद इस मद में सबसे अधिक आवंटन किया। भोजन के अधिकार कार्यक्रम के तहत अभी भी अनाज इतनी कम कीमत पर बेचा जा रहा है जिसने सन 1984 में एनटी रामाराव की सरकार बनवाई थी। मानो गरीबों की असमायोजित आय बीते 35 वर्ष से वहीं ठहरी हुई है। 
 
इसके बावजूद राजनीतिक वर्ग हमेशा लोक कल्याण की योजनाओं को लेकर एकमत रहा। दोहरापन इसकी एक व्याख्या हो सकती है। खासतौर पर इसलिए कि देश अच्छी तादाद में गैर कृषि रोजगार नहीं तैयार कर सका। इसकी दूसरी व्याख्या पहले नोटबंदी और उसके बाद वस्तु एवं सेवा कर से उपजी विसंगति के रूप में की जा सकती है। इनसे भी कृषि क्षेत्र में निराशा बढ़ी क्योंकि उपज की कीमतों में गिरावट आई। मोदी दूसरी बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन वह पहली बात को भी विवादित मानते हैं। लोकसभा में अपने भाषण में उन्होंने ऐसा ही किया। आपको मानना होगा कि उनकी बातें तार्किक थीं। परंतु उनकी दूसरी अवधारणा को खारिज कर सकते हैं जो उन्होंने मुद्रा ऋण की सफलता की बात की, वह विसंगतिपूर्ण है। चाहे जो भी हो लेकिन सरकार के कदम बताते हैं कि उसे दोहरेपन विसंगति और कृषि संकट का ध्यान है। 
 
यह शायद चुनावी वर्ष में बरती गई सतर्कता भर है लेकिन इन कदमों का फायदा तो होगा। एक लोक कल्याणकारी राज्य को तभी सही माना जा सकता है जब वह सबको शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा सके। निम्र मध्य आय वर्ग वाले देश में यूं धन बांटना तब तक सही विकल्प है जब तक कि जिन लाभों का वादा किया गया है वे गैर जरूरतमंदों से पैसे लेकर पूरे किए जाएं और इनका आर्थिक बोझ बहुत अधिक न हो। अगर ऐसा नहीं है तो यह पुराना सवाल उठेगा कि किसी व्यक्ति को मछली देना सही है या उसे मछली पकडऩे की कला सिखाना? लोककल्याण के मौजूदा दौर से तो यही संदेश निकल रहा है कि राज्य के पास गरीबों को देने के लिए नकदी के अलावा कुछ नहीं है।
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