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अच्छा कारोबारी माहौल बनाने में अब भी जूझ रहा भारत

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  February 07, 2019

जब आप भारतीय कंपनियों के उन लोगों की फेहरिस्त बनाते हैं, जो 2017 के उत्तराद्र्ध से लेकर 2018 के आखिर तक सुर्खियों में रहे तो यह सामने आएगा कि ज्यादातर उदाहरण कुप्रबंधन, उचित जांच-पड़ताल का अभाव, कारोबारी फैसलों और धोखाधड़ी के हैं। इनमें नीरव मोदी, विजय माल्या, नरेश गोयल, सुभाष चंद्रा, आईएलऐंडएफएस, चंदा कोछड़, रुइया परिवार, अनिल अंबानी, शिखा शर्मा, राणा कपूर आदि शामिल हैं। सफलता हासिल करने वाले उद्यमियों में कुछ ही नाम शामिल हैं, जिनमें मुकेश अंबानी, ओयो के रितेश अग्रवाल और फ्लिपकार्ट के सचिन और बिन्नी बंसल (लेकिन केवल सफल बिक्री करने के लिए) आदि शामिल हैं। 

 
इसलिए क्या भारतीय कारोबारी, प्रबंधक और बैंकर औसत दर्जे से नीचे के हैं? या वे उचित कारोबारी माहौल न होने से पीडि़त हैं, जिसमें लॉबिइंग नियमों पर भारी पड़ रही है और नीति-निर्माण में टिकाऊपन नहीं है? आप पाएंगे कि वजह दोनों हैं। विजय माल्या, नरेश गोयल और सुभाष चंद्रा ने स्वीकार किया है उन्होंने गलत फैसले लिए। पहले दोनों व्यक्तियों के लिए नाकाम होने का मुख्य कारण लागत को नियंत्रित नहीं कर पाना रहा है, जो दुनिया में किसी भी विमानन कंपनी के लिए सबसे जरूरी है। गोयल के मामले में यह कहना गलत होगा कि वह अब जिस स्थिति में हैं, उसकी वजह केवल तेल की कीमतों में बढ़ोतरी है। उनकी लागत एवं इससे संबंधित अन्य चुनौती- कर्मचारी प्रबंधन के साथ जद्दोजहद कम से कम एक दशक से चल रही है। उन्हें ये चुनौतियां 2006 में डूबती एयर सहारा को खरीदने के फैसले की विरासत में मिली हैं। 
 
टीवी पर चले 2008 के उस नाटक को याद कीजिए। जब उन्होंने करीब 1,900 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था। फिर देर रात नाटकीय संवाददाता सम्मेलन के बाद बहाल किया गया। युवा प्रदर्शनकारी जेट एयरवेज की अपनी चमकीली पीली वर्दी और काले चश्मे पहनकर एकत्रित हुए। इसके बाद संवाददाता सम्मेलन में गोयल आए, जहां उन्होंने आंसू बहाए और अपनी दिवंगत मां की कसम खाते हुए कहा कि उनके दिल में कर्मचारियों के लिए कोई दुर्भावना नहीं है।  माल्या ने भी एक अभिनेता की छवि बनाई, लेकिन उनके नाटक में किंगफिशर एयरलाइंस की आपात लैंडिंग अप्रत्याशित थी। माल्या ने भी अधिग्रहण का एक गलत फैसला लिया। उन्होंने विदेशी मार्गों पर उड़ानों के लिए सरकारी नियमों को मात देने के लिए एयर डेक्कन का अधिग्रहण किया। उनका यह फैसला भी उसी तरह गलत साबित हुआ, जिस तरह इकनॉमी क्लास के यात्रियों को बिज़नेस क्लास की सुविधाएं मुहैया कराने की उनकी रणनीति। माल्या ने किंगफिशर एयरलाइंस को अपनी कारोबारी असफलता करार दिया था।  मगर उनकी इस बात से बैंक सहमत नहीं हैं। बैंकों के 7,000 करोड़ रुपये से अधिक बकाया हैं। माल्या जब ऋण लेने की कोशिश कर रहे थे तब यह सवाल उठा कि कैसे विमानन को 'बुनियादी ढांचे के ऋण' का रूप दिया गया। 
 
वर्ष 2012 में यह विमानन कंपनी बंद हो गई, जिससे हजारों कर्मचारी बेरोजगार हो गए। इसके बाद रिपोर्ट आईं कि ऋणदाता बहुत सी कारों, लक्जरी घरों और निजी जेट पर कब्जा कर रहे हैं। इससे भी बड़ी खबर यह आई कि अपना शराब का मुख्य कारोबार डियाजियो को बेचने के बाद वह ब्रिटेन भाग गए हैं। इसके बाद प्रत्यर्पण की सुनवाई शुरू हुई।  सुभाष चंद्रा के एस्सेल समूह के शेयरों में पिछले सप्ताह भारी गिरावट आई थी। चंद्रा ने खुलकर यह बताया कि वह इस हालत में क्यों पहुंचे। इन कारणों में बुनियादी ढांचे में 'गलत बोलियां,' डी2एच के अधिग्रहण में एक अहम गलती, पारिवारिक कारोबार को बांटने के दौरान भारी कर्ज लेना और आईएलऐंडएफएस संकट आदि शामिल हैं। आईएलऐंडएफएस संकट के बाद उनकी कर्ज लौटाने की क्षमता कम हो गई। उनके मुख्य मीडिया कारोबार के अलावा विविधीकरण भी ठीक नहीं था। लेकिन उन्होंने अपनी समस्याओं का आरोप 'विरोधी ताकतों' पर लगाया, जिन्होंने उनकी कंपनी के शेयर जानबूझकर गिराए हैं। 
 
लागत को नियंत्रित रखना और बुद्धिमता से विविधीकरण करना प्रबंधन के बुनियादी सिद्धांत हैं। आईएलऐंडएफएस समेत बहुत से समूह इसलिए नाकाम हुए हैं क्योंकि उन्होंने बुनियादी ढांचा क्षेत्र की महंगी परियोजनाओं पर भारी खर्च कर दिया। यह क्षेत्र अप्रत्याशित सरकारी नीति के जाल में इतना जकड़ा हुआ है कि अब भारतीय बैंकिंग प्रणाली के ज्यादातर फंसे हुए कर्ज इसी क्षेत्र में हैं।  लेकिन बुनियादी प्रबंधन के लिए उचित जांच-पड़ताल भी जरूरी है। ऐक्सिस बैंक की शिखा शर्मा और येस बैंक के राणा कपूर एक समय भारतीय बैंकिंग प्रणाली के मुख्य चेहरे थे। दोनों को केंद्रीय बैंक आरबीआई ने इन्हीं आधारों पर अपना पद छोडऩे को कह दिया। चंदा कोछड़ के खिलाफ जांच के दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। उनके मामले से यह तो पता चलता है कि उन्होंने हितों के टकराव के मुद्दे को पूरी गंभीरता से नहीं लिया। 
 
सफल उद्यमियों में अग्रवाल के ओयो रूम्स की लगातार और भारी वृद्धि साफ तौर पर एक कारोबारी सफलता है। अब यह कमरों के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी होटल कंपनी है। यह विदेश में भी पांव पसार रही है। मुकेश अंबानी की जियो आज भारत के दूरसंचार क्षेत्र में सबसे मजबूत ताकत है। यह दूसरे पायदान पर केवल इसलिए पहुंच पाई है क्योंकि उसने भारत के प्रतिस्पर्धा और नियामकीय कानूनों की कमजोरियों का फायदा उठाया है। क्या वह नियम आधारित अन्य किसी देश में इतना दबदबा कायम करने में सफल होती? 
 
कुल मिलाकर तस्वीर धुंधली है। आर्थिक उदारीकरण को शुरू हुए करीब तीन दशक बीत चुके हैं। इसके बावजूद भारत एक अच्छा कारोबारी माहौल पैदा करने में जूझ रहा है। यह कारोबारियों के लिए उस कानूनी और नियामकीय माहौल के बारे में काफी कुछ बयां करता है, जिसमें वे काम कर रहे हैं। 
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