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वृद्घि को महत्त्व

संपादकीय /  February 07, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने अपनी पहली मौद्रिक नीति समीक्षा में मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के निर्णयों की जानकारी दी जो औसत आवास ऋण लेने वाले आम आदमी से लेकर सरकार तक सबको प्रसन्न करने वाले हैं। एमपीसी ने 4-2 के बहुमत से यह निर्णय लिया कि रीपो दर में 25 आधार अंकों की कटौती की जाएगी। सबसे अहम बात यह है कि यह कटौती आरबीआई के अब तक के नीतिगत रुख से अलग है। वह अब तक पूरे आकलन के बाद सख्ती की नीति अपना रहा था लेकिन अब उसने इसे निरपेक्ष कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आगामी 4 अप्रैल को एक बार फिर दरों में कटौती की जा सकती है। आम चुनावों को देखते हुए वह कटौती काफी अहम साबित हो सकती है। आरबीआई के रुख में बदलाव और कटौती का यह निर्णय वर्ष के आने वाले वक्त के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान में संशोधन के बाद आया है।

 
सालाना आधार पर आकलित की जाने वाली खुदरा महंगाई अक्टूबर 2018 के 3.4 फीसदी से कम होकर दिसंबर में 2.2 फीसदी रह गई। यह पिछले 18 महीनों की सबसे न्यूनतम दर है। यहां तक कि खाद्य और ईंधन वस्तुओं को निकाल दिया जाए तो शेष खुदरा महंगाई भी अक्टूबर के 6.2 फीसदी से कम होकर दिसंबर में 5.6 फीसदी रह गई। इससे भी अहम बात यह है कि मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान भी कमजोर पड़ा है। आरबीआई के सर्वेक्षण के मुताबिक दिसंबर 2018 में आम परिवारों का मुद्रास्फीतिक अनुमान भी तीन महीने आगे के परिदृश्य से 80 आधार अंक कमजोर पड़ा। वहीं अगले 12 महीने के परिदृश्य में यह 130 आधार अंक कम हुआ। इसी प्रकार कच्चे माल की लागत के मामले में मुद्रास्फीति का उत्पादकों का आकलन तीसरी तिमाही में कम हुआ। यह जानकारी आरबीआई के औद्योगिक पूर्वानुमान सर्वेक्षण में विनिर्माण कंपनियों द्वारा दी गई है। इसके परिणामस्वरूप अगर 2019 में मॉनसून के सामान्य रहने की उम्मीद की जाए तो खुदरा महंगाई को 4 फीसदी (2 फीसदी ऊपर नीचे) रखने का लक्ष्य तय किया जाएगा। माना यही जा रहा है कि आगामी 12 महीनों के दौरान यह 2.8 फीसदी से 3.9 के दायरे में रहेगी। 
 
आरबीआई के सीमित दायरे में रहने का लाभ यह हुआ कि आरबीआई को वृद्घि से जुड़े नीतिगत कदम उठाने का अवसर मिला है। हमारे देश में अभी भी वाणिज्यिक क्षेत्र का बैंक  ऋण और वित्तीय प्रवाह व्यापक पैमाने पर नहीं है। इतना ही नहीं वैश्विक वृद्घि में आया ठहराव और व्यापारिक तनाव भी विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे में भले ही आरबीआई आने वाले वर्ष के लिए वृद्घि का पूर्वानुमान नहीं बदले लेकिन उसने यह रेखांकित किया है निजी निवेश गतिविधियों को बढ़ावा देने और निजी खपत में इजाफा करने की आवश्यकता है। 
 
मौद्रिक नीति समीक्षा के अलावा आरबीआई गवर्नर ने ऐसे नियामकीय उपायों की भी घोषणा की जो वित्तीय बाजारों को व्यापक बनाने और उनकी गहराई बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं। खासतौर पर संकटग्रस्त गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए उपाय घोषित किए गए। आरबीआई ने मूल निवेश कंपनियों के अलावा सभी एनबीएफसी को ऋण की आवक सुनिश्चित करने के लिए उन तक बैंकों का रेटिंग के आधार पर तय जोखिम सुनिश्चित करने की बात कही है। कह सकते हैं कि ताजातरीन मौद्रिक नीति वक्तव्य आरबीआई के मूल्य स्थिरता के लक्ष्य और सरकार की उच्च आर्थिक वृद्घि की चिंताओं के बीच एक किस्म की सुसंगतता का संकेत देता है। यह देखना सुखद है क्योंकि हालिया अतीत में दोनों संस्थानों के रिश्ते बहुत सौहार्दपूर्ण नहीं रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में केवल राजकोषीय फिसलन ही एक आशंका है। परंतु इस दिशा में भी किसी पेशकदमी के पहले आरबीआई प्रमाण चाहता है।
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