बिजनेस स्टैंडर्ड - दैनिक गणना किसानों का है अपमान
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दैनिक गणना किसानों का है अपमान

ज्योति मुकुल और इंदिवजल धस्माना /  02 06, 2019

बीएस बातचीत

बतौर रेल मंत्री पीयूष गोयल भले ही कभी रेल बजट नहीं पेश कर पाए लेकिन पिछले हफ्ते उन्होंने राजग सरकार का अंतरिम बजट वित्त मंत्री के तौर पर पेश किया। ज्योति मुकुल और इंदिवजल धस्माना के साथ बातचीत में गोयल ने कहा कि अगर यह अंतरिम बजट नहीं होता तो कई और चीजें इसमें शामिल की जा सकती थीं ...

बाजार में आशंका है कि बजट प्रावधान से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, जिससे मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) पर दर में कटौती नहीं करने का दबाव रह सकता है। क्या आप इससे सहमत हैं और एमपीसी को आप क्या सलाह देंगे?

बिजनेस स्टैंडर्ड दैनिक गणना किसानों का है अपमानआपको बजट में कहां महंगाई भड़काने वाली चीज नजर आई? मुझे नहीं लगता कि इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी और न ही राजकोष पर दबाव बढ़ेगा। हमने राजकोषीय समेकन का ध्यान रखते हुए किसानों के योगदान का सम्मान करने का प्रयास किया है। हमने किसानों को तीन किस्तों में भुगतान करने की घोषणा की है, ताकि फसल कटाई के समय हर बार उनके हाथ में कुछ पैसे बच सकें, जिससे वे बिजली बिल का भुगतान कर सकें और कुछ बीज खरीद सकें। एमपीसी को क्या करना चाहिए इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता।

आपको नहीं लगता कि पीएम-किसान में काफी कम मदद दी गई है और इसे कुछ ज्यादा ही देर से लाया गया?

आपको शायद इसका अहसास नहीं है कि यह छोटे किसानों के लिए कितनी अहम है। 

आलोचकों का कहना है कि किसानों को प्रतिदिन करीब 17 रुपये की मदद काफी कम है...

सालाना 6,000 रुपये छोटे किसानों के लिए बड़ी राशि होती है। इसकी गणना प्रतिदिन के हिसाब से करना दुर्भाग्यपूर्ण है और किसानों का अपमान है। हम किसानों को पूरे सम्मान के साथ पैसे मुहैया कराएंगे और वे पूरी निष्ठा से इसे ग्रहण करेंगे। यह अनुदान या खैरात की तरह नहीं है। आप देख सकते हैं कि कांग्रेस से हमें किस तरह की विरासत मिली है। अर्थव्यवस्था का बुरा हाल था। 1.6 लाख करोड़ रुपये के बकाया बिल थे, मुद्रास्फीति काफी ज्यादा थी, विकास दर निचले स्तर पर पहुंच गई थी और राजकोषीय घाटा उच्च स्तर पर था। हमने किसानों के बेहतर भविष्य के लिए कई कदम उठाए हैं- 22 उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है, एमएसपी के तहत खरीद के लिए ज्यादा राशि का प्रावधान किया है, फसल बीमा योजना, अधिशेष बिजली आदि इनमें शामिल है। टिकाऊ कृषि और किसानों के बेहतर भविष्य के लिए यह ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाया है। 

पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों के इस योजना में शामिल होने के अनिच्छुक हैं। क्या आपको लगता है कि इस योजना का राजनीतिक विरोध हो रहा है?

पश्चिम बंगाल के किसानों को यह अहसास होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें कुछ मानदेय देना चाहते हैं लेकिन ममता दीदी उसे उन तक नहीं पहुंचने दे रही हैं। किसान राज्य सरकार को इसका जवाब देंगे।  इससे यह पता चलेगा कि वे किसानों को केंद्र की मदद नहीं देना चाहते हैं और वे नहीं चाहते कि किसानों का भविष्य बेहतर हो। केंद्र की कई योजनाएं हैं और वह राज्यों को काफी ज्यादा पैसे दे रहा है।

राजकोषीय घाटे के  लिहाज से राजस्व का लक्ष्य महत्त्वाकांक्षी है। विनिवेश लक्ष्य 80,000 करोड़ रुपये  है, लेकिन अब तक मात्र 30,000 करोड़ रुपये झोली में आए हैं। आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

अगर आंकड़ों पर नजर दौड़ाएंगे तो पता चलेगा कि अंतिम तिमाही में 50 से 55 प्रतिशत विनिवेश की रकम आ चुकी है। सभी योजनाएं पुख्ता तौर पर तैयार की गई हैं। हम लक्ष्य जरूर प्राप्त करेंगे। 

अब किन कंपनियों में निवेश होगा?

दीपम की मंजूरी मिल रही है। इस बारे में मैं ज्यादा नहीं कहूंगा, क्योंकि यह सेबी के दिशानिर्देशों का उल्लंघन होगा।

मौजूदा वित्त वर्ष में जीएसटी संग्रह का लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। अब  वित्त वर्ष 2020 के लिए 18 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान रखा गया है। क्या यह अधिक नहीं है?

हमने जीएसटी संग्रह की वास्तविक तस्वीर पेश की है। हमने काफी रकम लौटाई है। पहले से विचाराधीन रिफंड भी इस साल निपटाए जा रहे हैं। इससे हमारे राजस्व पर असर पड़ा है। हमें इस साल जीएसटी से हरेक महीने औसतन 97,000 करोड़ रुपये मिल रहे हैं। इससे हमे 11.5 लाख करोड़ रुपये मिलेंगे, जिनमें केंद्र का हिस्सा 6 लाख करोड़ रुपये होगा। वैसे हमने कम आंकड़े दिखाए हैं। अगले साल रिफंड उतना अधिक नहीं होगा, क्योंकि बकाया रकम तेजी से निपटाई जा रही है।

मूडी ने कहा है कि लगातार दो साल वित्तीय घाटा बढऩा साख के लिहाज से नकारात्मक है। सरकार इसे किस तरह देख रही है? 

मुझे नहीं लगता कि साख के लिहाज से यह नकारात्मक है। काफी पहले जब मॉनसून अच्छा रहता था तो पूरी अर्थव्यवस्था को ताकत मिलती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग तभी खर्च करते हैं जब उनके पास रकम होती है और इससे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। आगे चलकर मुझे अर्थव्यवस्था में और तेजी आने की उम्मीद है। किसान, मध्य वर्ग, गरीब को अगर किसी तरह का लाभ मिलता है तो इससे अर्थव्यवस्था निश्चित तौर पर लाभान्वित होता है। 

सब्सिडी जारी रखने से आपकी सरकार भी परहेज नहीं कर रही है?

जो रकम साल के अंत में आती है, उसका जिक्र अगले साल होता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। हालांकि यह उतनी बड़ी रकम भी नहीं है, जितनी हमें कांग्रेस से विरासत में मिली थी।  

ऑफलाइन उधारी लेने के लिए सरकार को फटकार लगाई है। आपको इस बारे में क्या कहना है?

काफी कुछ चीजें ही ऑफलाइन हैं। इनके भुगतान की एक अवधि तय होती है, इसलिए वे बजट में शामिल नहीं किए जाते हैं। उदाहरण के लिए अगर हम एक रेलवे ढांचा स्थापित करते हैं और अगर पांच से छह साल में इसका भुगतान हो जाता है तो इसमें मुझे कोई हानि नहीं नजर नहीं आती है। मुझे लगता है कि लोगों को जल्द लाभ देना हरेक सरकार की जिम्मेदारी होती है। 

अंतरिम बजट को चुनावी बजट बताया जा रहा है। अगली सरकार के लिए बजट के प्रस्ताव लागू करना मुश्किल काम नहीं होगा?

अगर चुनाव नहीं होता तो मैं कई चीजें करता। ये सभी कल्याणकारी योजनाएं हैं और इन पर काफी पहले से काम हो रहा है। हम पूरी तरह आश्वस्त हैं कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर सत्ता में आ रहे हैं। अगली सरकार को बजट प्रस्ताव लागू करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। अगली सरकार हमारी होगी और उसी हिसाब से हमने योजनाएं तैयार की हैं। 

क्या बजट बनाते समय सार्वभौमिक बुनियादी आय  के बारे में विचार किया या आप यह मानते हैं कि आय सहायता योजना बेहतर विचार है? 

एक टीवी चैनल पर एक कार्यक्रम में मेरे सामने कांग्रेस के नेता थे, जिन्होंने यूबीआई के बारे में बात की। जब उनसे यह पूछा गया कि इसके लिए धन की व्यवस्था कैसे की जाएगी तो उन्होंने कहा कि हम सभी सब्सिडी बंद कर देंगे। मैं आपके जरिये कांग्रेसी दोस्तों से यह जानना चाहूंगा कि क्या वे उर्वरकों को पांच गुना महंगा कर देंगे और किसानों से पांच गुना ज्यादा कीमत वसूल करेंगे। क्या कांग्रेस 80 करोड़ नागरिकों को 2 से 3 रुपये प्रति किलोग्राम की दर दिए जाने वाले खाद्यान्नों को बंद कर खाद्य सुरक्षा अधिनियम के साथ छेड़छाड़ करेगी? क्या तब रसोई गैस दोगुनी महंगी हो जाएगी। हम सब्सिडी बंद नहीं करेंगे। 

आप एक ऐसे मंत्रालय के मुखिया हैं, जो एक बड़ा रोजगार सृजक है, लेकिन फिर भी पद रिक्त हैं? 

मैं पहले ही 1,50,000 नौकरियों की घोषणा कर चुका हूं, जिनकी  प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है। एक लाख 20 हजार ऐसी नौकरियां हैं, जिनके लिए प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सेवानिवृत्ति के कारण 99,000 पद रिक्त होंगे।  करीब 2 करोड़ नौकरियों के लिए प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इनमें कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण होगा।

लेकिन फिर भी सरकार रोजगार सृजित नहीं कर पाई? 

जहां रिक्तियां हैं, उन्हें सरकार भरेगी। कोई उम्मीद नहीं करता है कि रोजगार केवल सरकारी क्षेत्र में ही सृजित होंगे। दुनिया बदल चुकी है और नौकरियों की प्रकृति भी बदल चुकी है। हम नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। 

मेक इन इंडिया योजना सफल होती तो क्या रोजगार के मोर्चे पर असर दिखता? 

यह कई तरीकों से सफल रही है। पहली वंदे भारत एक्सप्रेस भारतीय फैक्टरियों से बनकर आ रही है। इसके ज्यादातर कुलपुर्जे भारतीय फैक्टरियों में बने हैं। मोबाइल बनाने वाली इकाइयों की संख्या बढ़कर करीब 250 हो गई है। पहले ऐसे कुछ क्षेत्र थे, जहां क्षमता पहले ही बहुत अधिक थी और उनमें क्षमता का कम इस्तेमाल हो रहा था। साफ तौर पर इन क्षेत्रों में कोई निवेश नहीं करेगा। इन क्षेत्रों में क्षमता का पूर्ण इस्तेमाल होने के बाद इनमें निवेशक आएंगे। हमने रेलवे और सड़कों में पूंजीगत खर्च पर निवेश किया है। आप किसी क्षेत्र को देख लें, उसमें रोजगार सृजन हो रहा है। आप बिना रोजगार के 7.5 फीसदी वृद्धि हासिल नहीं कर सकते। 
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