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सब्सिडी का बोझ अनुमान से अधिक रहने के आसार

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 06, 2019

पिछले शुक्रवार को पेश अंतरिम बजट में वित्त वर्ष 2018-19 के कुछ अनुमानों को संशोधित किया गया है, जिन्हें लेकर कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं। लेकिन ऐसे लोगों को सरकार का जवाब यह है कि वित्त मंत्रालय के पास ऐसे ब्योरे और आंकड़े उपलब्ध हैं, जो उसे ये आंकड़े जारी करने का भरोसा देते हैं। यह बयान आश्वस्त करने वाला होना चाहिए। आखिरकार ये संशोधित आंकड़े सरकार के लिए राजकोषीय घाटे के अपने संशोधित लक्ष्य को हासिल करने में अहम होंगे। यह लक्ष्य वित्त वर्ष 2018-19 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.4 फीसदी है। 

 
इसके बावजूद इन आंकड़ों की हकीकत की पड़ताल उपयोगी साबित हो सकती है। सबसे पहले हमें देश में प्रमुख सब्सिडी पर खर्च को देखना चाहिए। खाद्य सब्सिडी का संशोधित अनुमान वित्त वर्ष 2018-19 के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये है, जबकि इसका बजट अनुमान 1.69 लाख करोड़ रुपये पेश किया गया था। अंतरिम बजट से पहले नवंबर 2018 तक का खाद्य सब्सिडी का मासिक आंकड़ा उपलब्ध था। इस आंकड़े के अनुसार अप्रैल से नवंबर तक खाद्य सब्सिडी का बिल 1.42 लाख करोड़ रुपये या करीब 17,800 करोड़ रुपये प्रतिमाह था। अगर यह मानकर चलते हैं कि चालू वित्त वर्ष के शेष चार महीनों में खाद्य सब्सिडी की औसत मासिक दर यही बनी रही तो कुल खाद्य सब्सिडी बिल बढ़कर 2.14 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। यह अंतरिम बजट के संशोधित अनुमान से करीब 42,000 करोड़ रुपये अधिक होगा। 
 
उर्वरक सब्सिडी के भी दो अहम हिस्से हैं। अंतरिम बजट दर्शाता है कि यूरिया सब्सिडी का संशोधित अनुमान वित्त वर्ष 2018-19 के लिए 44,985 करोड़ रुपये है। यह बजट अनुमान 44,989 करोड़ रुपये से मामूली कम है। अप्रैल से नवंबर 2018 के दौरान यूरिया सब्सिडी पर खर्च 33,294 करोड़ रुपये रहा है, यानी हर महीने 4,162 करोड़ रुपये। अगर चालू वर्ष के शेष चार महीनों में भी खर्च इसी दर से बढ़ा तो कुल यूरिया सब्सिडी बिल बढ़कर 49,941 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा, जो अंतरिम बजट में दिए गए संशोधित अनुमान के आंकड़े से करीब 4,956 करोड़ रुपये अधिक होगा। 
 
इसी तरह पोषण आधारित उर्वरकों का सब्सिडी बिल 2018-19 के संशोधित अनुमानों में 25,090 करोड़ रुपये दिखाया गया है, जो एक साल पहले बजट अनुमानों में दिए गए आंकड़े के समान है। लेकिन इस मद पर अप्रैल-नवंबर 2018 की अवधि में 20,152 करोड़ रुपये पहले ही खर्च हो चुके हैं यानी हर महीने 2,159 करोड़ रुपये। अगर वर्ष के शेष चार महीनों में खर्च इसी रफ्तार से बढ़ा तो पोषण आधारित उवर्रकों की सब्सिडी का सालाना बिल बढ़कर 30,228 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। यह अंतरिम बजट में पेश किए गए संशोधित अनुमान से 5,138 करोड़ रुपये अधिक होगा। 
 
अंतरिम बजट में पेट्रोलियम सब्सिडी बिल का संशोधित अनुमान 24,833 करोड़ रुपये है, जो इसी वर्ष के बजट अनुमान 24,933 करोड़ रुपये से कम था। चालू वित्त वर्ष के दौरान कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं, इसलिए रसोई गैस और केरोसिन के सब्सिडी बिल बढऩे चाहिए। असल में चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में पेट्रोलियम सब्सिडी पर 23,142 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है यानी हर महीने 2,893 करोड़ रुपये का खर्च आया है। अगर चालू वित्त वर्ष के शेष चार महीनों में पेट्रोलियम सब्सिडी का खर्च इसी रफ्तार से बढ़ा तो कुल बिल बढ़कर 34,713 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। यह अंतरिम बजट के संशोधित अनुमान से 9,880 करोड़ रुपये अधिक होगा। 
 
संशोधित अनुमानों के मुताबिक इन प्रमुख सब्सिडी पर 2018-19 के दौरान कुल 2.66 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह राशि बजट अनुमान 2.64 लाख करोड़ रुपये से मामूली अधिक है। अगर आप अप्रैल से नवंबर 2018 के दौरान इन सब्सिडी पर आए खर्च के आधार पर पूरे साल के खर्च का अनुमान लगाएंगे तो पाएंगे कि खर्च 0.62 लाख करोड़ रुपये अधिक रह सकता है। प्रमुख सब्सिडी का वास्तविक बिल 3.28 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जबकि इनका संशोधित अनुमान 2.64 लाख करोड़ रुपये ही है। 
 
यह बात ध्यान देने लायक है कि इन सब्सिडी पर खर्च के मासिक आंकड़े नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) हर महीने जारी करता है। निस्संदेह सीएजी के आंकड़े ऑडिट नहीं किए हुए और अस्थायी हैं। इसके अलावा यह भी संभव है कि बीते महीनों के खर्च की रफ्तार हर मामले में लागू न हो। बजट बनाने वालों की सूचनाओं और आंकड़ों तक ज्यादा पहुंच होती है। इनसे उन्हें संशोधित आंकड़े जारी करने का भरोसा मिलने की संभावना है। यह संभव है कि राजकोषीय घाटे के आंकड़े पर इसके असर को कुछ मदों में संंशोधित अनुमानों की तुलना में कम खर्च करके बेअसर कर दिया जाए। या इस खर्च के एक हिस्से को अगले साल तक टाल दिया जाए? लेकिन प्रमुख सब्सिडी पर ही संशोधित अनुमान के मुकाबले 0.62 लाख करोड़ रुपये अधिक खर्च होने से सरकार के राजकोषीय मजबूती के कार्यक्रम की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ेंगे। 
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