बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन-जापान की करीबी और भारत की दूरी
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चीन-जापान की करीबी और भारत की दूरी

श्याम सरन /  February 06, 2019

भारत ऐसा कोई अवसर नहीं मुहैया करा पा रहा है जिसकी तुलना चीन की 'मेड इन चाइना 2025' पहल से की जा सके। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं श्याम सरन 

 
अमेरिका और चीन के कारोबारी युद्घ की बातों के बीच हम एक अहम घटना पर ध्यान नहीं दे पाए हैं। पिछले कुछ दिनों में चीन और जापान के तनावपूर्ण राजनीतिक रिश्तों की बर्फ कुछ हद तक पिघलती नजर आई है और उनके बीच व्यापारिक और आर्थिक रिश्तों में नई जान आ रही है। चीन के प्रधानमंत्री ली कछ्यांग मई 2018 में जापान की यात्रा पर गए थे। वह एक शुरुआत थी जिसके बाद अक्टूबर 2018 में जापानी प्रधानमंत्री चीन गए। यह 11 वर्ष में पहला मौका था जब कोई जापानी प्रधानमंत्री चीन गया था। दोनों पक्षों के तनावपूर्ण रिश्तों में नरमी की शुरुआत तब हुई जब अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने व्यापारिक मसलों पर इन दोनों देशों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। चीन के लिए जापानी उद्योग एवं व्यापार का महत्त्व यह है कि अमेरिकी बाजारों और उन्नत तकनीक तक उसकी पहुंच लगातार सीमित होती जा रही है। उधर जापान कुछ सीमाओं के साथ एक आकर्षक विकल्प बना हुआ है। हाल के दिनों में हुआवेई का जापानी दूरसंचार बाजार से बाहर होना ऐसी ही एक घटना है। 
 
चीन और जापान के रिश्तों में तनाव नई सहस्राब्दी के आगमन के समय क्षेत्रीय और सुरक्षा मसलों को लेकर हुआ। सन 2012 में  विवादित सेंकाकू द्वीप को लेकर हालात बहुत नाजुक हो गए थे। वर्ष 2012 में चीन में जापानी एफडीआई 740 करोड़ डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंचा था लेकिन अगले कुछ वर्षों में इसमें गिरावट आई और यह 2016 में 310 अरब डॉलर रह गया। सालाना सर्वेक्षणों की बात करें तो अधिक से अधिक जापानी कंपनियां चीन से बाहर निकलने पर विचार कर रही थीं जबकि वहां विस्तार करने की इच्छा रखने वाली कंपनियां बहुत कम थीं। दोनों देशों के बीच अत्यंत तनावपूर्ण रिश्तों के कारण जापान ने अपना निवेश चीन के अलावा अन्य क्षेत्रों में फैलाना शुरू किया। यही वह वक्त था जब जापान ने भारत की ओर ध्यान दिया। यह ध्यान सुरक्षा साझेदार के रूप में भी था और जापानी व्यापार और निवेश के केंद्र के रूप में भी। तेजी से विकसित होती भारतीय अर्थव्यवस्था को चीन के समतुल्य पेशकश वाला बाजार माना जाने लगा। भारत में जापानी एफडीआई 2006-07 के 8.5 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2016-17 में 470 करोड़ डॉलर हो गया। चीन में कुल मिलाकर 10,000 करोड़ डॉलर की जापानी पूंजी है। भारत में यह केवल 2,500 करोड़ डॉलर है। अब जबकि चीन एक बार फिर जापानी निवेश के लिए उपयुक्त केंद्र बनकर उभर रहा है तो कहा जा सकता है कि भारत पर हाशिये पर चले जाने का खतरा मंडरा रहा है। चीन में जापानी एफडीआई 2017 में सुधरकर 320 करोड़ डॉलर हो गया और माना जा रहा है कि इसमें आगे और सुधार होगा। जापान के बाह्य व्यापार संगठन (जेट्रो) के एक अधिकारी के मुताबिक, 'हमारा मौजूदा निष्कर्ष यह है कि जापनी कारोबार चीन में निवेश को लेकर आगे और सकारात्मक रहेगा।'
 
जापान-चीन व्यापार में भी वर्ष 2012 के बाद आई गिरावट अब पलटी है और सुधार देखने को मिल रहा है। 2017 में यह करीब 30,000 करोड़ डॉलर रहा। भारत-जापान व्यापार में हाल के वर्षों में गिरावट आई है और यह 2012-13 के 1,850 करोड़ डॉलर से घटकर 2016-17 में मात्र 1,350 करोड़ डॉलर रह गया। इसी अवधि में भारतीय निर्यात 610 करोड़ डॉलर से कम होकर 380 करोड़ डॉलर रह गया।  जापान का कारेाबारी जगत चीन की मेड इन चाइना 2025 पहल को एक बड़े अवसर के रूप में देखता है। इस पहल में 10 क्षेत्रों को चिह्नित किया गया है जिनमें कृत्रिम मेधा, रोबोटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल और क्वांटम कंप्यूटिंग आदि शामिल हैं। चीन का लक्ष्य सन 2025 तक इन तमाम क्षेत्रों में अच्छी काबिलियत हासिल करने का है। जापान इन क्षेत्रों में पहले ही अहम काबिलियत हासिल कर चुका है। हाल ही में जापान की रोबोट निर्माता कंपनी यासकावा और चीन की वाहन कंपनी चेरी ने इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण को लेकर समझौता किया है। नैशनल पैनासोनिक के शांघाई स्थित शोध एवं विकास केंद्र ने चीन की अलीबाबा और बायडू से कनेक्टेड डिवाइस और नई पीढ़ी के वाहनों के इंस्ट्रूमेंट पैनल बनाने के लिए समझौता किया है। अमेरिकी और पश्चिमी यूरोप के देश जहां मेड इन चाइना पहल को अपने तकनीकी दबदबे के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं, वहीं जापान का रुख इसके उलट है। भारत के पास इसके समतुल्य अवसर नहीं है। 
 
सन 2013 में जापान ने चीन की बेल्ट ऐंड रोड पहल का विरोध किया था। परंतु 2015 में उसने गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढंाचे में सहयोग के साथ प्रतिक्रिया दी और एशिया तथा अफ्रीका के देशों में वित्तीय सहायता का व्यवहार्य तथा पारदर्शी विकल्प उपलब्ध कराया। सन 2017 में भारत और जापान ने मिलकर एशिया-अफ्रीका इकनॉमिक ग्रोथ कॉरिडोर (एएईजीसी) की घोषणा की ताकि एशिया और अफ्रीका के देशों में बुनियादी विकास को संयुक्त फंडिंग की जा सके। बहरहाल, जून 2018 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजे आबे ने इसके लिए चीन का हाथ थाम लिया। अक्टबूर 2018 में उनकी चीन यात्रा के दौरान ऐसी 50 परियोजनाओं की घोषणा की गई। इनमें थाईलैंड की एक रेल परियोजना भी शामिल थी। जापान अब बेल्ट रोड पहल में चीन के साथ है। 
 
जापान का कारोबारी जगत भारत में निवेश के माहौल को लेकर भी चिंतित रहता है। भारत-जापान बिज़नेस लीडर्स की हालिया संयुक्त रिपोर्ट में जापानी पक्ष ने भारत सरकार से मांग की कि वह जीएसटी व्यवस्था को सुसंगत और गतिशील बनाए तथा उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को भी ठीक करे। इसके अलावा कर व्यवस्था को सुधारने, उसमें आंतरिक स्तर पर निरंतरता लाने आदि जैसी बातें भी कही गईं। इसमें मास्टर फाइल की जरूरतों की समीक्षा, श्रम सुधारों को मजबूत बनाना और उनमें संशोधन करना, डेटा स्थानीयकरण को लेकर नियमों को सहज कर डेटा का मुक्त प्रवाह सुनिश्चित करना, बुनियादी विकास को बढ़ावा देना, परियोजनाओं की बोली प्रक्रिया में सुधार, पारदर्शिता लाना, कानूनी और संस्थागत ढांचों के प्रवर्तन में निरंतरता उत्पन्न करना, प्रशासनिक प्रक्रियाओं के आम नियमों का विकास करना और उनका डिजिटलीकरण करना आदि तमाम बातें शामिल हैं। आज चीन में एफडीआई को लेकर कोई बहुत बेहतर शर्तों की पेशकश नहीं है लेकिन इसके बावजूद जापान को भारत के बजाय चीन तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के साथ कारोबार करना ज्यादा रास आ रहा है, उसे इसमें अधिक सहजता महसूस हो रही है। 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान में सीपीआर के वरिष्ठ फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।)
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