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बुनियादी क्षेत्र की चिंता

संपादकीय /  February 06, 2019

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की पहली सरकार ने बुनियादी विकास को प्राथमिकता दी थी और उसे देश में रोजगार निर्माण और आर्थिक वृद्घि का सबसे महत्त्वपूर्ण इंजन बनाया था। पिछले चार बजट को देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी इन बातों पर ध्यान दिया गया है। परंतु हालिया अंतरिम बजट में पूरा ध्यान समाज के वंचित वर्ग पर रहा है। काफी हद तक सरकार की बजट प्राथमिकता चुनावी दबाव से संचालित रही है। चुनाव के पहले लगभग हर राजनीतिक दल के सुर लोकलुभावन हो जाते हैं। यही कारण है कि सरकार का ध्यान इस बार छोटे और सीमांत किसानों को प्रत्यक्ष आय समर्थन, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पेंशन योजना और 5 लाख रुपये तक की सालाना आय वाले लोगों को आयकर में छूट पर केंद्रित रहा है। कुल मिलाकर देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार को अपने संसाधनों को तार्किक बनाने की आवश्यकता पड़ी। पीएम-किसान और आयकर छूट जैसी योजनाओं की वजह से पडऩे वाले अतिरिक्त बोझ को समायोजित करने के लिए सरकार को बुनियादी विकास की योजनाओं के लिए किए जाने वाले बजट आवंटन में कमी करनी पड़ी। 

 
परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने बीते पांच वर्ष के दौरान सरकार की उपलब्धियां नहीं दर्शाईं। उन्होंने उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) योजना का खासतौर पर उल्लेख किया। इस योजना के परिणामस्वरूप देश में परिचालित हो रहे हवाई अड्डों की संख्या 100 का स्तर पार कर चुकी है। यही वजह है कि घरेलू विमान यात्रियों की संख्या बीते पांच वर्ष में बढ़कर दोगुनी हो गई। उन्होंने सुरक्षा के मामले में भारतीय रेल की सफलता का भी जिक्र किया। सफलता की इस दास्तान का एक बड़ा पहलू यह तथ्य भी है कि ब्रॉड गेज पर मौजूद तमाम मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग को समाप्त कर दिया गया है। इन बदलावों की बदौलत देश के दूरदराज इलाकों तक पहुंच की गति तेज हुई है। उदाहरण के लिए अरुणाचल प्रदेश अब देश के विमानन मानचित्र पर नजर आने लगा है और मिजोरम तथा मेघालय जैसे प्रांत पहली बार देश के रेलवे मानचित्र पर दिखने लगे हैं। एक अन्य घटना जो पहली बार घटी है वह यह कि कोलकाता से वाराणसी के बीच पहली बार जलमार्ग से माल ढुलाई की शुरुआत की गई। सड़क और रेल के मोर्चे पर भी पीछे मुड़कर देखने पर खुश होने की कई वजह नजर आती हैं। प्रति दिन लगभग 27 किलोमीटर का राजमार्ग निर्माण कार्य हुआ है। हाल के महीनों में यह गति और तेज हो गई है। हमारा देश राजमार्ग निर्माण की गति के मामले में दुनिया में सबसे आगे है। 
 
इन सफलताओं के बावजूद अंतरिम बजट इस मोर्चे पर निराश करता है। साफ देखा जा सकता है कि राजनीतिक दृष्टि से प्रेरित पुनर्वितरण योजनाओं ने इस क्षेत्र के आवंटन पर असर डाला है। ऐसे में हालांकि रेलवे को 1.57 लाख करोड़ रुपये का उच्चतम पूंजीगत व्यय आवंटित हुआ है और इसे 64,587 करोड़ रुपये का उच्च बजट समर्थन मिला है लेकिन सड़क और विमानन क्षेत्र इतने भाग्यशाली नहीं हैं। उदाहरण के लिए सरकार ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को मिलने वाली बजट राशि में 631 करोड़ रुपये से अधिक की कमी की है। यही वजह है कि प्राधिकरण को अब उधारी और सड़क परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण की मदद से फंड जुटाने की कवायद करनी होगी। इसी प्रकार सागरमाला परियोजना के लिए बजट आवंटन को वित्त वर्ष 2020 के लिए कम करके 550 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इससे पहले वित्त वर्ष 2019 में भी सरकार 600 करोड़ रुपये के आवंटन में से केवल 381 करोड़ रुपये ही खर्च कर सकी थी। 
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