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वर्टिकल खेती को बढ़ावा देने के लिए नीतियां लाए सरकार

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  February 05, 2019

कृषि जोत सिकुड़कर अव्यावहारिक बन रही हैं और परंपरागत कृषि अलाभकारी हो रही है। ऐसे में वर्टिकल खेती ने फसल उगाने के एक आकर्षक तरीके के रूप में ध्यान आकृष्ट करना शुरू कर दिया है। कृषि की इस अनोखी प्रणाली में पौधों को दीवारों से जुड़ी अलमारियों पर रखे कंटेनरों में या उगाया जाता है या लंबे फ्रेम या पिलर पर टांगा जाता है। इससे पौधों को अपनी पूरी ऊंचाई तक बढऩे और हर पौधे तक प्रकाश को पहुंचने की पर्याप्त जगह मिलती है। छतों, बालकनी और शहरों में बहुमंजिला इमारतों के कुछ हिस्सों में फसली पौधे उगाने को भी वर्टिकल कृषि के ही एक हिस्से के रूप में देखा जाता है। हालांकि इसके सबसे अच्छे नतीजे तब मिलते हैं, जब ऐसी खेती इमारत के भीतर या पॉलि हाउस में की जाती है। इनमें पर्यावरण की दशाओं को नियंत्रित किया जा सकता है। वर्टिकल कृषि का बुनियादी उद्देश्य कम से कम जगह में ज्यादा से ज्यादा संख्या में पौधे उगाना है। इसमें क्षैतिज की तरह ऊध्र्वाधर जगह का इस्तेमाल किया जाता है। 

 
हालांकि अभी भारत में फसलें उगाने का यह तरीका शुरुआती चरण में ही है। मगर यह अन्य कई देशों में काफी प्रगति कर चुका है। विशेष रूप से उन देशों में, जहां जमीन की उपलब्धता कम है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बड़े आकार और वजनी फसलें इस तरह की खेती के लिए उपयुक्त नहीं हैं। लेकिन ऊंचे मूल्य और छोटे आकार की बहुत सी फसलें आसानी से ऊध्र्वाधर ढांचों में उगाई जा सकती हैं। वर्टिकल खेती करने वाले ज्यादातर उद्यमी लेटिस, ब्रोकली, औषधीय एवं सुगंधित जड़ी-बूटियां, फूल और साज-सज्जा के पौधे, टमाटर, बैगन जैसी मझोली आकार की फसलें और स्ट्रॉबेरी जैसे फल उगाते हैं। 
 
संरक्षित पर्यावरण में अलमारियों में ट्रे में मशरूम की वाणिज्यिक खेती वर्टिकल खेती का सबसे आम उदाहरण है। उच्च तकनीक वाली वर्टिकल खेती का एक अन्य सामान्य उदाहरण टिश्यू कल्चर है। इसमें पौधों के बीजों को टेस्ट ट्यूब में सिंथेटिक माध्यम में उगाया जाता है और कृत्रिम प्रकाश और पर्यावरण मुहैया कराया जाता है। वर्टिकल फार्म में उगाए जाने वाले उत्पाद बीमारियों, कीटों और कीटनाशकों से मुक्त होते हैं। आम तौर पर इनकी गुणवत्ता बहुत बेहतर होती है, इसलिए उनके दाम भी ज्यादा मिलते हैं। 
 
इस समय वर्टिकल कृषि मुख्य रूप से बेंगलूरु, हैदराबाद , दिल्ली और कुछ अन्य शहरों में होती है। यहां उद्यमियों ने शौकिया तौर पर वर्टिकल खेती की शुरुआत की थी, लेकिन बाद में व्यावसायिक उद्यम का रूप दे दिया। इन शहरों में बहुत से उद्यमी हाइड्रोपोनिक्स और एयरोपोनिक्स जैसे जानी-मानी प्रणालियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाइड्रोपोनिक्स में पौधों को पानी में उगाया जाता है। इस पानी में आवश्यक पादप पोषक मिले होते हैं। एयरोपोनिक्स में पौधों की जड़ों पर केवल मिश्रित पोषक तत्त्वों का छिड़काव किया जाता है। गमले में लगे पौधों के मामले में आम तौर पर मिट्टी की जगह पर्लाइट, नारियल के रेशे, कोको पीट, फसलों का फूस या बजरी का इस्तेमाल किया जाता है। 
 
हालांकि वर्टिकल कृषि के कुछ पेचीदा पहलू भी हैं। ये दिक्कतें मामले पर निर्भर करती हैं और इसलिए उनसे हर मामले के आधार पर निपटा जाना चाहिए। इनमें से एक चुनौती पौधों के लिए पर्याप्त प्रकाश सुनिश्चित करना भी है। अगर उस इमारती ढांचे की इकाइयों में पर्याप्त मात्रा में सूरज की रोशनी उपलब्ध नहीं है तो कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि पौधों की सामान्य वृद्धि हो सके। इसमें एलईडी बल्ब और ट्यूब मददगार साबित हो सकते है, जिनकी लागत अब काफी कम हो गई है। इमारत के अंदर के पौधों तक सूरज की रोशनी पहुंचाने के लिए प्रकाश परावर्तकों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।  
 
परागण एक अन्य चुनौती है, विशेष रूप से क्रॉस पॉलिनेटड फसलों के मामले में। इस पर ध्यान देने की जरूरत है। इनडोर फॉर्म में परागण कीट नहीं होते हैं, इसलिए परागण हाथ से करना होता है। इसमें लागत आती है और समय भी खर्च होता है। अब बहुत से उद्यमी इस उद्देश्य के लिए वर्टिकल फॉर्मिंग इकाइयों में मधुमक्खी पालन करते हैं। मधुमक्खी पालन से शहद और मोम, प्रोपोलिस और रॉयल जेली जैसे महंगे उपोत्पाद प्राप्त होते हैं, जिसे बेचकर अतिरिक्त आमदनी अर्जित की जा सकती है। 
 
भारत में वर्टिकल फॉर्मिंग के मामूली प्रसार की मुख्य वजहों में से एक शोध एवं विकास मदद का अभाव है। वर्टिकल खेती की तकनीक को बेहतर बनाने और लागत कम करने के लिए मुश्किल से ही कोई संस्थागत शोध चल रहा है। वर्टिकल खेती के समर्थक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक टी जानकीराम कहते हैं कि खेती की इस प्रणाली को लोकप्रिय बनाने के लिए ऐसे शोध की तत्काल जरूरत है।  सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों को शोध एवं विकास केंद्र स्थापित करने के बारे में विचार करना चाहिए ताकि वर्टिकल खेती को प्रोत्साहित किया जा सके। इससे इस कृषि प्रणाली के आर्थिक, पर्यावरण और अन्य लाभ हासिल किए जा सकेंगे। कृषि उपज की बड़ी मात्रा को शहरों में भेजने से यातायात जाम और वाहन प्रदूषण समेत जटिल समस्याएं पैदा हो रही हैं। इसके अलावा इन उपजों को भेजने की भारी मालभाड़ा लागत आती है। इसे मद्देनजर रखते हुए शहरों को अपनी जरूरत के एक हिस्से की आपूर्ति स्थानीय उत्पादन से करनी चाहिए। इसलिए सरकार को वर्टिकल कृषि को बढ़ावा देने के लिए नीतियां लानी चाहिए। 
Keyword: agri, farmer, crop,,
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