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पुल-विहीन सड़क दामोदर नदी की

विवेक देवरॉय /  February 05, 2019

अठारहवीं सदी में कई सड़कें ऐसी थीं जिनके रास्ते में पडऩे वाली बड़ी नदियों पर पुल ही नहीं होते थे। इस अजीबोगरीब समस्या के बारे में बता रहे हैं विवेक देवरॉय

 
'सफर थकान और दर्द से भरपूर था। और इस दौरान ऐसे अनुभव हुए जो भारत भर में रेल यात्रा से जुड़े नीरस विवरणों से पूरी तरह अलग थे। हंटर ने अपनी विक्टोरिया बग्घी में सवार होकर सड़क मार्ग से सफर किया। इस बग्घी को हमेशा दो घोड़े खींचते थे जबकि तीसरे घोड़े को पहले ही अगले मुकाम पर भेज दिया जाता था। दामोदर नदी के तट पर पहुंचने के बाद बदकिस्मत यात्रियों को नदी की प्रचंड धारा का सामना करना पड़ता था।' यह विवरण 'लाइफ ऑफ सर विलियम विल्सन हंटर' किताब का अंश है। अधिकतर लोग विलियम विल्सन हंटर को 'इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया' के लिए याद करते हैं जबकि बंगाली उन्हें 1868 में प्रकाशित 'एनल्स ऑफ रूरल बंगाल' के लिए याद रख सकते हैं। अभी जिस यात्रा का जिक्र हुआ है वह 1866 में वीरभूम के सिउरी से मिदनापुर के हुए सफर का है। आज इन दोनों जगहों के बीच सड़क मार्ग से दूरी 245 किलोमीटर है। इस दौरान आपको दामोदर नदी पार करनी होगी। राष्ट्रीय राजमार्ग 39 (अब नया एनएच 14) होने के बावजूद इस रास्ते से जाने में आपको करीब छह घंटे लग जाएंगे। वर्ष 1866 में हंटर वीरभूम के असिस्टेंट मजिस्ट्रेट एवं कलेक्टर थे और उन दिनों वह शायद 'एनल्स ऑफ रूरल बंगाल' के लिए सामग्री जुटाने में लगे हुए थे। फ्रांसिस हेनरी स्क्राइन ने 1901 में हंटर की जीवनी  लिखी थी और ऊपर वर्णित आख्यान उसी किताब से लिया गया है। बांकुड़ा का जिला गजेटियर वर्ष 1905 में प्रकाशित हुआ था। जब मैं इन पुराने जिला गजेटियरों को पढ़ता हूं तो उनमें उपलब्ध सामग्री के भंडार और उनके लेखकों की पढऩे की आदत से हैरत में पड़ जाता हूं। 
 
बांकुड़ा के जिला गजेटियर के लेखकों ने भी स्क्राइन की लिखी हंटर की जीवनी पढ़ी थी और संचार के साधनों पर लिखे गए अध्याय में हंटर की यात्रा और उससे जुड़ी पीड़ा को भी उस गजेटियर में बखूबी पिरोया था। गजेटियर को उद्धृत करें तो, '1902 तक जिले में कोई रेल लाइन नहीं थी और यहां पहुंचने का सबसे आसान तरीका यही था कि रेल मार्ग से रानीगंज तक पहुंचें और फिर बाकी रास्ता सड़क मार्ग से पूरा करें। हालांकि यह न केवल महंगा पड़ता था बल्कि यात्रा थकाऊ भी होती थी। इस दौरान दामोदर नदी को भी पार करना पड़ता था। रेल लाइन अब बांकुड़ा के पूर्व से पश्चिम छोर तक जाती है लेकिन भीतरी इलाकों तक जाना काफी मुश्किल होता है क्योंकि रास्ते में कई नदियां मिलती हैं जिन पर कोई पुल नहीं है। हालांकि पुलों के अभाव के अलावा जिले की सड़कें काफी अच्छी स्थिति में हैं और रायपुर के आसपास के दक्षिण-पश्चिमी छोर के अलावा जिले का हरेक हिस्सा उनसे जुड़ा हुआ है।' सवाल उठता है कि केवल सड़कें ही क्यों मौजूद थीं, कोई पुल क्यों नहीं था? आम तौर पर लोग ऐसी स्थिति के बारे में नहीं सोचते हैं। कोई भी किसी मार्ग को लेकर यही सोचेगा कि रास्ते में नदी आने पर पुल भी बने होंगे।
 
हाल फिलहाल तक हमारे पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं था जो राष्ट्रीय राजमार्गों पर मौजूद पुलों की संख्या और उनकी हालत के बारे में बता सके। भारतीय पुल प्रबंधन प्रणाली (आईबीएमएस) के सौजन्य से अब हमारे पास राजमार्गों पर बने 'पुलों की सेहत' के बारे में एक सर्वे के आंकड़े उपलब्ध हैं। अब हमें पता है कि कुल 1.72 लाख पुलों में से करीब 6,000 पुलों की संरचनात्मक हालत ठीक नहीं है। इसका जवाब तलाशने के लिए हम 1908 के इम्पीरियल गजेटियर के पन्ने पलटते हैं। इसके मुताबिक, 'साल भर में आठ महीनों से अधिक समय तक नदियों की मौजूदगी होते हुए भी भारत के मैदानी इलाके रोजमर्रा के संचार साधनों के जरिये पार किए जाने लायक हैं। अलग-अलग स्थानों पर आवाजाही के लिए इसे कोई बाधा नहीं माना जाता रहा है। यहां तक कि 18वीं सदी के अंत तक सैन्य उद्देश्य के लिए भी बनी हुई सड़कों की कोई मांग नहीं होती थी। ऐसी स्थिति में परिवहन मुख्य रूप से ग्रामीण रास्तों पर मवेशियों के जरिये होता था। लोग या तो इन पशुओं की सवारी करते थे या पालकियों में बैठते थे।'
 
करीब उसी समय रेल मार्गों का निर्माण शुरू हुआ जिसने नई सड़कों के चरित्र एवं कामकाज दोनों पर गहरा असर डाला है। रेल प्रणाली के विस्तार के साथ अब और ज्यादा जरूरी हो गया है कि सड़कें ऐसी दिशाओं में बनाई जाएं जो रेल मार्गों के प्रतिद्वंद्वी नहीं, पूरक की भूमिका निभाएं। इसी के साथ पक्की सड़कों की मांग भी बढ़ी है। 1823 में मैलोनी ने ग्रेट दक्कन रोड के नागपुर-जबलपुर खंड के बीच सड़क की हालत सुधारने की वकालत करते हुए कहा था 'स्थानीय उपज की वास्तविक मात्रा उपभोग से अधिक थी। देश की संपन्नता के लिए अधिशेष उत्पाद को दूसरी जगह पहुंचाने के लिए सस्ता एवं सरल संचार अपरिहार्य है।'
 
यह टिप्पणी कम शब्दों में ही यह बयां कर देती है कि 19वीं सदी के शुरुआती दौर में सड़कों के निर्माण के पीछे का सामान्य मकसद क्या होता था? फसलों की कटाई का समय नदियों में पानी कम होने का भी वक्त होता था, लिहाजा ग्रांड ट्रंक मार्गों को छोड़कर बाकी सड़कों में पुलों के निर्माण की जरूरत ही नहीं समझी गई। कई बड़ी नदियों पर अभी तक स्थायी पुल नहीं बन पाए हैं और उनकी जगह तैरते पुल या नौकाएं ही आवागमन का साधन बनते हैं। इस तरह, शुरुआती दौर की अधिकांश सड़कें निचले इलाकों असल में नदियों के किनारे तक पहुंचने का साधन भर होती थीं। रेलवे के आगमन के साथ ही हालात बदल गए और पक्की सड़कों और नदियों पर पुलों की मांग बढ़ गई ताकि पूरे साल रेल मार्ग तक संपर्क कायम रखा जा सके।' शुरुआत में नदियों पर पुल इसलिए नहीं बनाए गए थे क्योंकि उनकी जरूरत ही नहीं समझी जाती थी। लेकिन रेलवे के आने से यह धारणा भी बदल गई।
 
आईबीएमएस के सर्वे के मुताबिक राजमार्गों पर 1.34 लाख पुलिया, 32,806 छोटे पुल, 3,647 बड़े पुल और 1,835 बहुत बड़े पुल बने हुए हैं। इनमें से बहुत सारे पुल कई दशक पहले उस समय बने थे जब वाणिज्यिक वाहन अपेक्षाकृत कम वजन के साथ दौड़ते थे। इस सर्वे से पता चला है कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर बने 23 पुल तो सौ साल से भी अधिक पुराने हैं। ढोला-सदिया जैसे आधुनिक पुल के साथ इन पुलों का भी वजूद है। बांकुड़ा और दामोदर से जुड़ी सामग्री का अध्ययन करते समय मुझे बांकुड़ा के सालटोरा प्रखंड के कई गांवों के बारे में भी पता चला जो दामोदर नदी पर बने पुल के जरिये आसनसोल से जुड़े हुए थे। लेकिन वह पुल शायद बांस से ही बना था। 
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: road, transport, NHAI, bridge,,
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