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भारतीय बैंकिंग के क्षेत्र में तीन दिलचस्प विलय

तमाल बंद्योपाध्याय /  February 04, 2019

पी एस जयकुमार, वी वैद्यनाथन और चंद्र शेखर घोष इन तीनों के साथ एक खास बात क्या है? ये तीनों ही भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में तीन सर्वाधिक दिलचस्प विलय प्रक्रिया को अंजाम देने में जुटे हैं। घोष के नेतृत्व वाले बंधन बैंक ने हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनैंस कॉर्प लिमिटेड (एचडीएफसी) की सहायक इकाई गृह फाइनैंस लिमिटेड का अधिग्रहण करने की घोषणा की है। इसी तरह, वैद्यनाथन की कैपिटल फस्र्ट लिमिटेड का आईडीएफसी बैंक लिमिटेड के साथ विलय हो चुका है।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम में दो अपेक्षाकृत छोटे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों-देना बैंक और विजय बैंक- का जयकुमार के बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) में विलय हो रहा है। जयकुमार और वैद्यनाथन दोनों ही इतिहास रचने की दहलीज पर खड़े हैं। वजह भी साफ है, क्योंकि इन दोनों को जिस कार्य की जिम्मेदारी दी गई है, उसकी मिसाल भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के इतिहास में पहले देखने को नहीं मिली थी। बीओबी-देना-विजय बैंक का आपस में विलय भारत के सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र में समेकन का पहला उदाहरण है। 

ऋण परिसंपत्तियों में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत के करीब है। हालांकि इससे पहले भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के पांच सहायक बैंकों का विलय हो चुका है, लेकिन यह एक आंतरिक मामला था। वैसे इस विलय से देश का सबसे बड़ा कर्जदाता एसबीआई विश्व के शीर्ष 50 बैंकों की फेहरिस्त में शामिल हो गया था। इसी तरह, आईसीआईसीआई बैंक के सबसे युवा कार्यकारी निदेशक वैद्यनाथन, जिन्होंने एक उद्यमी बनने का निर्णय लिया, पहले ऐसे पेशेवर हैं जिन्हें बिना आवेदन किए ही बैंकिंग लाइसेंस मिल गया! सभी व्यावहारिक कारणों से उनकी गैर-वित्तीय बैंकिंग कंपनी कैपिटल फर्स्ट आईडीएफसी बैंक का अधिग्रहण कर रहे हैं। आईडीएफसी बैंक को अस्तित्व में आए उतना ही समय हुआ है, जितना बंधन बैंक को हुआ है। ये तीनों लोग निवेशकों की अपेक्षाओं को साधने में लगे हैं, लेकिन मैं उस पहलू पर ध्यान नहीं दे रहा हूं। इसका कारण यह है कि सभी विलय पहले ही दिन से गुणवत्ता का समागम करेंगे ऐसा भी नहीं है, लेकिन शेयरधारकों को दीर्घ अवधि में जाकर इसका लाभ मिल सकता है। सेंचुरियन-बैंक ऑफ पंजाब का एचडीएफसी बैंक के साथ विलय इसका एक उदाहरण है।

बैंकिंग क्षेत्र में समेकन की प्रक्रिया स्पष्टï तौर पर दिख रही है, लेकिन बीओबी के साथ देना बैंक और विजय बैंक के विलय में देना बैंक को उबारने का भी उद्देश्य निहित है। देना बैंक को तथाकथित सुधार सूची (प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन/पीसीए) में डाल दिया गया है और इसकी सामान्य बैंकिंग गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी गई है। दिसंबर, 2015 में बैंकिंग के फंसे कर्ज का आंकड़ों में इजाफा शुरू होने के बाद देना बैंक को सितंबर 2018 तक 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। बैंक को इस दौरान 12 तिमाहियों में 11 में नुकसान उठाना पड़ा। इस अवधि के दौरान बैंक की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 9.85 प्रतिशत से बढ़कर 23.64 प्रतिशत हो गईं। सरकार नियंत्रित बैंकों में यह एनपीए का चौथा सबसे बड़ा आंकड़ा था। 

जयकुमार ने बीओबी का बहीखाता दुरस्त करने और इसके परिचालन में उपयुक्त बदलाव लाने के लिए कई पहल किए हैं, लेकिन विलय एक अलग ही मामला है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती देना बैंक और विजय बैंक के वरिष्ठï कर्मचारियों की चिंताओं को साधने की होगी। इसमें कोई शक नहीं कि इन वरिष्ठï कर्मचारियों के मन में उनके साथ अनुचित भेदभाव होने का भय सताता रहेगा। अगर देना बैंक का बहीखाता जितना कमजोर दिख रहा है उससे भी कमजोर दिखा तो यह मनोभावना और बिगड़ सकती है। याद करें कि किस तरह सहायक बैंकों के समागम के बाद एसबीआई का फंसा कर्ज सरपट ऊपर भागा था। विलय के बाद अस्तित्व में आने वाली नई इकाई एसबीआई और एचडीएफसी बैंक लिमिटेड के बाद भारत की तीसरी सबसे बड़ी कर्जदाता होगी। इस इकाई की 9,489 शाखाओं में 85,675 लोग काम करेंगे।

आईडीएफसी बैंक, जो शेयरधारकों की अनुमति के बाद आईडीएफसी फर्स्ट बैंक हो जाएगा, का बहीखाता 1.03 लाख करोड़ रुपये होगा। यह अपनी 203 शाखाओं और 454 ग्रामीण बैंकिंग प्रतिनिधि केंद्रों के जरिये अपने 72 लाख ग्राहकों को सेवाएं मुहैया कराएगा। कुल ऋण खाते में इसका खुदरा ऋण खाता 32.46 प्रतिशत का योगदान देगा। बहीखाता में वृद्धि करने और तकनीक को तवज्जो देने के लिए खास तौर पर मशहूर वैद्यनाथन ने बैंक में ऊपरी स्तर पर फेरबदल भी किए हैं। कैपिटल फ स्र्ट से बैंक के खुदरा कारोबार को मजबूती मिलेगी, वहीं वैद्यनाथन के लिए सबसे बड़ी चुनौती कम लागत वाली देनदारी के साथ आगे बढऩे की होगी। इन दोनों इकाइयों को छोड़ दें तो बंधन बैंक के लिए गृह फाइनैंस का सौदा एक मजबूरी है। बंधन बैंक देश में किसी सूक्ष्म वित्त इकाई के बैंक में तब्दील होने का पहला उदाहरण है। आरबीआई के लाइसेंस संबंधी नियमों के तहत परिचालन शुरू करने के तीन साल के भीतर इकाई को सूचीबद्ध कराना जरूरी है और प्रवर्तकों को हिस्सेदारी कम कर 40 प्रतिशत करना अनिवार्य है। बंधन बैंक की शुरुआत 23 अगस्त, 2015 को हुई थी और यह सूचीबद्ध भी हो गई है, लेकिन प्रवर्तकों की हिस्सेदारी जरूरी स्तर तक नहीं आई है। गृह फाइनैंस के अधिग्रहण के बाद प्रवर्तकों को उनकी हिस्सेदारी कुछ हद तक कम करने में मदद मिलेगी। ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि बंधन बैंक और गृह फाइनैंस का सौदा दोनों ही इकाइयों के अल्पांश शेयरधारकों के लिए अच्छा नहीं है और वास्तविक लाभ एचडीएफसी को मिलेगा। एचडीएफसी के पास गृह फाइनैंस की बहुलांश हिस्सेदारी है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सौदा बंधन के लिए ठीक है, लेकिन बैंक को इसके लिए अधिक भुगतान करना पड़ रहा है।

विलय प्रक्रिया पूरी होने के बाद बंधन बैंक का ऋण खाता बढ़कर 50,000 करोड़ रुपये (सितंबर 2018 की कमाई के आधार पर) हो जाएगा और यह अपने 1.5 करोड़ ग्राहकों को 4,182 बैंक शाखाओं से सेवाएं देगा। गृह फाइनैंस का आधा से अधिक कारोबार ग्रामीण क्षेत्रों में होता है और इसका औसत ऋण आकार 9.4 लाख रुपये है। पश्चिमी और मध्य भारत में इसकी उपस्थिति से बंधन बैंक को कारोबार बढ़ाने में खासी मदद मिलेगी। विलय से बंधन बैंक को पोर्टफोलियों संकेंद्रण से जुड़े जोखिम कम करने, कारोबार में विविधता लाने और गृह फाइनैंस की योजनाएं बेचने में भी मदद मिलेगी। हालांकि घोष के सामने कार्य करने की शैली से जुड़ी विविधताओं के साथ सामंजस बैठाने की चुनौती होगी। गृह फाइनैंस तकनीक पर अधिक जोर देती है और इसके वरिष्ठï अधिकारी बैंक के अपने समकक्षों के मुकाबले अधिक तवज्जो पाते हैं। हालांकि घोष ने बैंक की शुरुआत करने के समय नव नियुक्त बैंकरों और अपने सूक्ष्म-वित्त कर्मचारियों को बराबर तवज्जो देने में अच्छी भूमिका निभाई थी। (डिस्क्लेमर: मैं बतौर सलाहकार, रणनीति, इस बैंक के साथ अगस्त 2015 से अक्टूबर 2018 तक जुड़ा रहा) 

राकेश शर्मा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। फंसी परिसंपत्तियों के मामले में आईडीबीआई बैंक देना बैंक को टक्कर दे सकता है। भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) आईडीबीआई बैंक का अधिग्रहण कर रहा है, जो एक बार फिर भारतीय बैंकिंग जगत में एक अनूठा प्रयोग है। शर्मा निजी क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले उन दो मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) में शामिल थे (दूसरे जयकुमार थे), जिन्हें एक सरकार नियंत्रित बैंक संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि एलआईसी के अधिग्रहण की कवायद देखने के लिए मात्र छह महीने का कार्यकाल दिया गया है। जयकुमार करीब एक साल तक रहेंगे। लिहाजा, दोनों हड़बड़ी में हैं, लेकिन वैद्यनाथन और घोष के पास हालात संभालने के लिए खासा समय है। 

(स्तंभकार लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठï सलाहकार हैं। वह बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक हैं। )

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