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लोककल्याण और पूर्वग्रह

संपादकीय /  February 04, 2019

गत सप्ताह पेश किए गए अंतरिम बजट के दो प्रावधानों को अत्यंत विपरीत प्रतिक्रियाएं मिली हैं, हालांकि दोनों ही उपाय राजकोषीय विस्तारवाद का उदाहरण हैं। पहली बात, सरकार ने यह निर्णय लिया है कि दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले छोटे किसानों को केंद्र सरकार की ओर से आय समर्थन दिया जाएगा। हालांकि इसके लिए 6,000 रुपये वार्षिक की जो राशि तय की गई है वह अपेक्षाकृत कम है। यह राशि तीन किस्तों में किसानों के खाते में डाली जाएगी। देश में खेती का रकबा इतना बंटा हुआ है कि सैद्घांतिक रूप से इस योजना से बहुत बड़ी तादाद में लोग लाभान्वित होंगे।

वित्त मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक इससे करीब 12 करोड़ लोगों को लाभ पहुंचेगा। यह देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। बजट के मुताबिक अगले वर्ष इस योजना के चलते 75,000 करोड़ रुपये की राशि व्यय करनी होगी। एक अन्य निर्णय जिसने सुर्खियां बटोरीं वह कर राहत के रूप में लिया गया। इसके तहत सालाना 5 लाख रुपये तक की आय वाले करदाताओं को कर में छूट प्रदान की गई है। कर नियमों में थोड़े बहुत बदलाव के साथ यह खजाने पर 23,000 करोड़ रुपये का बोझ डालने वाली योजना है। 

यह खेद की बात है कि सार्वजनिक बहस में इन दोनों नीतिगत निर्णयों को लेकर होने वाली बहस काफी बंटी हुई है। ऐसे समय में जबकि राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पर ध्यान दिया जाना चाहिए, उस वक्त कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किए जाने की आलोचना करना एक बात है। लेकिन इसके बावजूद कर कटौती का स्वागत किया जाना कतई उचित नहीं है। 

इसके साथ ही साथ देश के सबसे हाशिये पर मौजूद किसानों के लिए न्यूनतम आय समर्थन की आलोचना करना भी बिल्कुल विचित्र है। देश की प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो 31 जनवरी, 2019 को जारी किए गए शुद्घ राष्ट्रीय आय के प्रथम संशोधित आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 के लिए यह लगभग 1.1 लाख रुपये सालाना रही। दूसरे शब्दों में कहें तो 5 लाख रुपये तक की आय वाले लोगों को कर मुक्त करने का अर्थ यह है कि न्यूनतम आय से पांच गुना तक आय अर्जित करने वालों को भी अब आय कर चुकाने की आवश्यकता नहीं है। 

यह अस्वाभाविक स्थिति है। अगर प्रति व्यक्ति आय शक्ति के हिसाब से आकलन किया जाए तो भी तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है। 12,500 रुपये की कर राहत के हिसाब से देखा जाए तो देश के सबसे सीमांत किसानों को 6,000 रुपये प्रति परिवार की राहत बहुत अधिक नहीं है। इससे करीब 12 करोड़ लोगों को फायदा पहुंचेगा जबकि आयकर में छूट का लाभ अधिकतम 3 करोड़ लोगों तक ही पहुंचेगा। इसमें बहुत कम संदेह है कि प्राथमिकता किसे प्रदान की जाए। आय के अनुरूप कराधान अथवा आय के पुनर्वितरण के सवालों को तो अभी छोड़ ही देते हैं। 

मध्य वर्ग के विस्तारित पूर्वग्रह के साथ समस्या यह है कि कई बार इसका आकलन तथ्यात्मकता से दूर हो जाता है। यह बात अहम है कि कल्याणकारी उपायों तक के राजकोषीय तथा अन्य लाभों का आकलन अधिकतम निष्पक्ष होकर किया जाए। इस मामले में कर में कटौती की तुलना अगर किसानों को दिए गए आय समर्थन से की जाए तो वह एक राजकोषीय विलासिता है। किसानों को दी गई राहत को ग्रामीण संकट और आय की दिक्कत को दूर करने का न्यूनतम उपाय माना जा सकता है। चाहे जो भी हो लेकिन इन दोनों उपायों के प्रति प्रतिक्रिया में एक का स्वागत और दूसरे को लेकर निराशा को पाखंड मानकर खारिज कर दिया जाना चाहिए।

Keyword: Interim Budget, Fiscal, Hectare, Farmer, Farm, Land, Finance Minister, Piyush Goyal,
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