बिजनेस स्टैंडर्ड - बजट से टलेगी दरों में कटौती!
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बजट से टलेगी दरों में कटौती!

अनूप रॉय / मुंबई 02 03, 2019

लोकलुभावन उपायों से बढ़ सकती है महंगाई

तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव की भी चिंता

बिजनेस स्टैंडर्ड बजट से टलेगी दरों में कटौती!अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार की बजट घोषणाएं महंगाई बढ़ाने वाली हैं और इससे फरवरी में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति में दरों में कटौती की संभावना लगभग खत्म  हो गई हैं। हालांकि बाजार का एक वर्ग ऐसा भी है जो अब भी दरों में कटौती की उम्मीद कर रहा है। मगर बजट के बाद बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी कुछ और ही संकेत दे रही है। बॉन्ड की अधिक आपूर्ति और ब्याज दरों के सख्त होने की उम्मीद में प्रतिफल में बढ़ोतरी या बॉन्ड की कीमतों में गिरावट आती है।

सरकार एक बार फिर राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रही है। सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष में इसे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.3 फीसदी रखने का लक्ष्य निर्धारित किया था लेकिन इसके 3.4 फीसदी रहने का अनुमान है। अगले वित्त वर्ष के लिए भी इसे 3.4 फीसदी रखने का लक्ष्य रखा गया है जबकि इसे 3 फीसदी से कम रखने की बात की जा रही थी।  यूबीएस ने एक रिपोर्ट में कहा कि सरकार ने विस्तारवादी राजकोषीय नीति अपनाई, जिसमें लोकलुभावनवाद को विवेकशीलता से ज्यादा तरजीह दी गई है।

ब्रोकरेज ने कहा कि आरबीआई राजकोषीय फिसलन के कारण महंगाई बढऩे के जोखिम के प्रति सचेत रहेगा। केंद्रीय बैंक अपने 'नपेतुले सख्त' रुख को बदलकर 'तटस्थ' कर सकता है लेकिन दरों में कटौती की संभावना नहीं है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस बजट के बाद आरबीआई दरों में कटौती नहीं कर सकता है क्योंकि सरकार के लोकलुभावन कदमों और तेल की कीमतों में तेजी के कारण महंगाई बढ़ सकती है। 

डीबीएस बैंक ने एक रिपोर्ट में कहा, 'खपत में बढ़ोतरी और विकास में तेजी अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक होगी लेकिन इससे आक्रामक मौद्रिक सहजता चक्र की गुंजाइश सीमित हो जाएगी।' बजट में ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के लिए कई घोषणाएं की गई हैं, मध्य वर्ग के लिए करों में छूट दी गई है जबकि सामाजिक क्षेत्र के लिए भी कई घोषणाएं की गई हैं। डीबीएस की अर्थशास्त्री राधिका राव ने कहा, 'व्यापक राजकोषीय लक्ष्य मोटे तौर पर सही दिशा में चल रहे हैं जिससे हम उम्मीद कर रहे हैं कि आरबीआई मूल्य स्थिरता को प्राथमिकता देगा।' उनका कहना है कि 2019 में नीतिगत दर यथावत रह सकती हैं क्योंकि उपभोक्ता के अनुकूल बजट से महंगाई बढऩे की आशंका रहती है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई अप्रैल-मई 2018 में 4.9 फीसदी थी जो दिसंबर में घटकर 2.2 फीसदी रह गई। खासतौर पर खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट के कारण ऐसा हुआ। आगामी महीनों के दौरान कीमतों के यथावत रहने की संभावना है जिससे महंगाई 2 से 3 फीसदी के आसपास रह सकती है। लेकिन दरों में कटौती के लिए यह पर्याप्त नहीं है बल्कि रुख में बदलाव ही काफी है। कच्चे तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव की स्थिति है। कच्चे तेल की कीमत जहां 62 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है जो सितंबर में 84 डॉलर थी। तेल की कीमत में अब भी अनिश्चितता बरकरार है।

एक बैंक के वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने कहा कि आरबीआई ने कुछ ही समय पहले 'नपातुला सख्त' रुख अपनाया था और अगर वह इतनी जल्दी दरों में कटौती करता है तो इससे उसकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने कहा, 'इस समय दरों में कटौती का कोई मतलब नहीं है। आरबीआई कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में ऊंची दरों को कम करने का प्रयास कर सकता है।'

फिर भी कुछ लोग फरवरी में दरों में कटौती की उम्मीद कर रहे हैं। उदाहरण के लिए एसबीआई पेंशन फंड्स के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी कुमार शरदिंदु ने कहा कि लंबे समय से महंगाई आरबीआई के अनुमान से कम पर टिकी है जिससे दरों में कटौती की उम्मीद की जा सकती है। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के ट्रेजरी प्रमुख जयेश मेहता भी आगामी मौद्रिक नीति में दरों में कटौती की उम्मीद कर रहे हैं।
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