बिजनेस स्टैंडर्ड - मनमोहन के संप्रग-2 पर भारी मोदी का कार्यकाल
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मनमोहन के संप्रग-2 पर भारी मोदी का कार्यकाल

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  February 03, 2019

बीते पांच वर्ष के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज को देखें तो आर्थिक मोर्चे पर उसका प्रदर्शन कैसा रहा, इस बारे में दो विपरीत बातें सामने आती हैं और ये पूरी तरह आपकी पसंद पर निर्भर करती हैं। एक समूह कहेगा कि आर्थिक मोर्चे पर सरकार का प्रदर्शन शानदार रहा तो दूसरा समूह यह कह सकता है कि सरकार बुरी तरह विफल रही। सरकार के प्रशंसक आंकड़ों की दलील देंगे, आलोचक इसका विरोध करेंगे। परंतु सवाल यह है कि अगर आंकड़ों से छेड़छाड़ की गई हो तो आकलन कैसे होगा? हमें दोनों धु्रवों के विशेषज्ञों को इस मसले पर लडऩे भिडऩे देना चाहिए और मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में राजनीतिक अर्थव्यवस्था को लेकर व्यापक दृष्टि से विचार करना चाहिए।

 
मोदी सरकार का पांच वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने को है, ऐसे में नजर डालते हैं पांच ऐसे आर्थिक कदमों पर जिन्हें इस सरकार ने सही ढंग से अंजाम दिया। अपनी बात पर जोर देने के लिए मैं यह दोहराता हूं कि मैं इस तस्वीर को राजनीतिक या राजनीतिक अर्थव्यवस्था के चश्मे से देखता हूं, न कि विशुद्ध रूप से आर्थिक। यही वजह है कि मेरी नजर में सबसे बड़ी सकारात्मक घटना है ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी)का सफल क्रियान्वयन।  यह सही है कि अब तक केवल 12 डिफॉल्टरों को इस प्रक्रिया के अधीन किया गया है लेकिन ये 12 सबसे बड़े और ताकतवर लोग हैं। ये उस तरह के लोग हैं जिनके फोन में अधिकांश ताकतवर राजनेताओं और नौकरशाहों के नंबर स्पीड डायल में रहते हैं। जिनकी जेबों में लेनदारी की पर्ची जमा रहती हैं। परंतु तथ्य यही है कोई फोन कॉल उनको बचा नहीं सका। फिर चाहे वह एस्सार के ताकतवर रुइया ही क्यों न हों। यह एक नई तरह की राजनीतिक इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
 
इसे दूसरी तरह से देखते हैं। अगर एक बार आपको पता चल जाए कि एक मित्रवत फोन कॉल आपकी मदद नहीं कर सकता है तब आप यह देश में पूंजीवाद के नए युग के साथ बरताव सीख जाते हैं। यहां अगर आपका कारोबार विफल हुआ तो दिवालिया होना तय है। पूंजीवादी व्यवस्था की मजबूती के लिए समाज को यह कड़वा सबक सीखना होता है कि नाकामी को भी स्वीकार करना होगा। हमारे देश में दिवालियापन को शर्मिंदगी का सबब माना जाता रहा है और छिपाया जाता है।  मुखर रूप से वाम-समाजवादी रुझान वाला लेकिन फोन पर मदद मुहैया कराने वाला राज्य इसमें साझेदार के समान था। मोदी सरकार ने इसका अंत किया। बड़े-बड़े कारोबारी धराशायी हो रहे हैं। यह दौरा भारतीय पूंजीवाद के नए स्वरूप के उभार की वजह बन सकता है। मुझे यह राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर अनिवार्य बदलाव नजर आ रहा है।
 
मोदी सरकार की इस बात के लिए काफी आलोचना हुई है कि कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद उसने पेट्रोलियम पदार्थ के दाम ज्यादा रहने दिए। परंतु इसे लेकर उतनी हायतौबा नहीं मची जैसी संप्रग के दौर में देखने को मिलती थी। यह इसलिए क्योंकि उपभोक्ता महीने के अंत में खरीदारी के समग्र बिल को देखते हैं। मोदी के कार्यकाल में तेल कीमतें अधिक रहीं लेकिन महंगाई, खासतौर पर खाद्य महंगाई में कमी आई। मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है, न ही जीडीपी की तरह उसमें कोई फेरबदल किया गया है। ऐसे में संप्रग के साथ इसकी तुलना करना उचित होगा।
 
सन 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई तो संप्रग-2 ने जो अर्थव्यवस्था सौंपी उसमें खुदरा महंगाई 8.33 फीसदी थी। दिसंबर 2018 में यह केवल 2.19 फीसदी है। ध्यान रहे ऐसा तब है जबकि तेल कीमतें ऊंची हैं। मुद्रास्फीति को कम करना मोदी सरकार के अपेक्षाकृत गैर अकादमिक राजनीतिक अर्थशास्त्र की दूसरी बड़ी सफलता है। अधिकांश भारतीय सरकारें तेल कीमतें कम करने और शहरी बुर्जुआ वर्ग को शांत रखने को तरजीह देतीं। कीमतों की राजनीति का अपना ही रहस्य है। संप्रग-1 ने किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में लगातार इजाफा किया। इससे किसानों और कृषि श्रमिकों की स्थिति थोड़ी बेहतर हुई और सरकार को दूसरा कार्यकाल आसानी से मिल गया। दूसरे कार्यकाल में उपभोक्ता खाद्य वस्तुओं की महंगाई आकाश छूने लगी और काफी दबाव उत्पन्न हुआ। नतीजा, सरकार को हार का मुंह देखना पड़ा। मोदी सरकार के कार्यकाल में इसमें गिरावट आ रही है। इसके लिए कुछ हद तक एमएसपी न बढ़ाना वजह है। इसके अलावा बाजार की परवाह किए बिना उसने दालों की खेती को खूब बढ़ावा दिया है।
 
यही कारण है कि किसान गरीब होने लगे और मेहनताना कम होने लगा। महज विगत तीन फसल चक्रों से राजग ने एमएसपी बढ़ाना शुरू किया। परंतु अभी उसके असर का आकलन करना जल्दबाजी होगी। ऐसे में राहुल का यह कहना गलत नहीं कि मोदी के पांच साल के कार्यकाल में किसानों को नुकसान हुआ है। यह कड़वी राजनीतिक हकीकत है कि जब तक उपभोक्ताओं और किसानों के हित परस्पर विरोधी होंगे, तब तक कीमतें बढऩे और घटने पर सरकार गिरने का उतना ही जोखिम होगा। इस चक्रव्यूह से निकलने का एक ही तरीका है और वह है कृषि सुधारों को अंजाम देना। राजग सरकार ऐसा करने में पूरी तरह नाकाम रही है। 
 
सवाल है कि मोदी सरकार ने ईंधन क्षेत्र में जो कर जुटाया, उसका क्या किया? इस प्रश्न का उत्तर इस बात में निहित है कि उसने राजकोषीय घाटा कम करने में सफलता हासिल की। मतदाताओं को विभिन्न योजनाओं में हजारों करोड़ रुपये की राशि देने के बावजूद सरकार घाटे पर काबू रख सकी क्योंकि उसे तेल से लाभ मिलता रहा। राजमार्ग निर्माण में भारी निवेश किया गया लेकिन बंदरगाहों, सागरमाला परियोजना, पूर्वोत्तर क्षेत्र और रेलवे पर उतना ध्यान नहीं दिया गया। आंकड़े बताते हैं कि देश का बुनियादी व्यय बीते एक दशक में जीडीपी के प्रतिशत के रूप में करीब तीन गुना हो गया है। इसमें काफी कुछ बीते चार वर्ष में हुआ है।
 
पांच सफलताओं में से चौथी है जीडीपी की तुलना में कर अनुपालन और कर में सुधार। यह अब जीडीपी के 9 फीसदी से बढ़कर 13 फीसदी हो गया है। उच्चस्तर पर देखें तो कर अधिकारियों पर कर आतंक फैलाने का आरोप लगता रहा है। परंतु निचले और मझोले स्तर पर कर प्रशासन प्रभावी रहा है। इस स्तर पर मानव हस्तक्षेप सीमित हुआ है। अगर आप बहुत बड़े कारोबारी नहीं हैं या एजेंसियां आपके पीछे नहीं पड़ीं अथवा आप राजनीतिक पीडि़त नहीं हैं तो कर अधिकारियों के साथ आपका अनुभव बुरा नहीं होगा। पांचवीं और अंतिम उपलब्धि है वस्तु एवं सेवा कर। इसके चलते तमाम दिक्कतें पैदा हुईं, भाजपा के मूल मतदाता यानी कारोबारी वर्ग में इसे लेकर नाराजगी रही लेकिन इसे लागू किया गया।
 
यकीनन कई क्षेत्र ऐसे भी रहे हैं जिनमें नाकामी का सामना करना पड़ा। कृषि से लेकर निर्यात तक और विनिर्माण से रोजगार तथा सुधार रहित सरकारी उपक्रमों तक कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां सफलता नहीं मिली। आंकड़ों में हेराफेरी तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का सबब बनी। नोटबंदी जैसी घटना को अंजाम दिया गया जिसकी विचित्रता की तुलना चीन में माओ द्वारा गौरैयों के खात्मे के प्रयास से की जा सकती है। ऐसी चीजों को लेकर तो हम शिकायत करते ही रहे हैं और करते रहेंगे। फिलहाल हम इस दुर्लभ उदाहरण को देखें जहां यह साबित हुआ है कि अच्छी अर्थनीति हमेशा राजनीतिक दृष्टि से बुरी नहीं होती। न ही इसका उलटा हमेशा सच होता है।
 
Keyword: election, BJP, congress, narendra modi,,
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