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राजकोषीय नीति के समक्ष आसन्न दोहरा संकट

अजय शाह /  February 01, 2019

अंतरिम बजट पेश किया जा चुका है और यह सही समय है कि हम अपेक्षाकृत व्यापक फलक को लेकर बात करें। बजट प्रक्रिया और राजकोषीय नीति के सामने अब दो बड़ी समस्याएं हैं। पहली, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का गलत आकलन और उसका अधिमूल्यित अनुमान। इस बात के कर लक्ष्य और बॉन्ड जारी करने के कार्यक्रम पर कहीं गहरे प्रभाव पड़ेंगे। दूसरा, लोकलुभावन पात्रता कार्यक्रम। इनका दुनिया भर में राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। भारत को भी इसके राजनीतिक निहितार्थ के प्रबंधन के लिए काम करना होगा। 

 
अंतरिम बजट अप्रैल-जून तिमाही से प्रभावी होगा और जुलाई में सरकार बदलने के बाद पुन: बजट पेश किया जाएगा जो वर्ष भर के लिए सरकार की नीति तय करेगा। बहरहाल, यह बजट अवसर देता है कि हम ठहरकर देश की बजट प्रक्रिया और राजकोषीय नीति की चुनौतियों पर विचार करें। पहला सवाल जीडीपी के आंकड़ों से जुड़ा है। सबको पता है कि देश के आधिकारिक आंकड़े भरोसेमंद नहीं हैं। यह केवल अर्थशास्त्रियों की रुचि का मामला है। बहरहाल, जीडीपी आंकड़ों का बजट निर्माण पर सीधा असर होता है। 
 
हर बजट प्रक्रिया में जीडीपी के आंकड़ों का इस्तेमाल होता है। इसमें 0.08 फीसदी का गुणाकर उसे व्यापक कर नौकरशाही का लक्ष्य बनाया जाता है। जीडीपी आंकड़ों में चूक से कर लक्ष्य में चूक उत्पन्न होती है। वर्ष 2018-19 का कर राजस्व जीडीपी का 7.9 फीसदी था जो 2019-20 के लिए 8.1 फीसदी है।  हमारे यहां यह बात लगभग स्वीकार्य है कि जीडीपी के अनुमान लगाने में चूक होती है। कुछ स्वतंत्र आंकड़ों के स्रोत कॉर्पोरेट बिक्री, कॉर्पोरेट मुनाफा, निजी निवेश आदि बताते हैं कि आधिकारिक अनुमान बढ़ाचढ़ाकर किए गए हैं। उदाहरण के लिए 2014-15 से 2017-18 तक नॉमिनल जीडीपी 37 फीसदी बढ़ी। परंतु 5019 गैर तेल गैर वित्त कंपनियों की नॉमिनल शुद्घ बिक्री 22 फीसदी बढ़ी। 
 
अगर जीडीपी बढ़ाचढ़ाकर प्रस्तुत की गई तो कर लक्ष्य ऊंचे होंगे। तब कर निरीक्षक भी दबाव बढ़ाते हैं और अनावश्यक तनाव उत्पन्न होता है।  वर्ष 2014-15 में शुद्घ कर राजस्व 9.8 लाख करोड़ रुपये था जिसके जीडीपी का 7.5 फीसदी होने का अनुमान था। पांच वर्ष बाद यह 17.1 लाख करोड़ रुपये और जीडीपी का 8.1 फीसदी अनुमानित है। क्या नॉमिनल जीडीपी इन पांच वर्ष में 62 फीसदी बढ़ा जैसा कि बजट निर्माण में अनुमान लगाया गया था? 
 
बॉन्ड कार्यक्रम को लेकर बजट आकलन भी जीडीपी के गलत आकलन से प्रभावित होता है। अगर जीडीपी अधिमूल्यित है, तो बॉन्ड बिक्री खपत से अधिक हो जाती है। जीडीपी आंकड़ों की अनुपस्थिति कर नीति को प्रभावित करती है लेकिन उसके गलत आकलन के बावजूद सरकारी कर्ज को पटरी पर रखना संभव है। कर को लेकर एक अहम नियम ऐसा है जहां जीडीपी अनुमान की जरूरत नहीं। अगर हम प्राथमिक तौर पर अधिशेष की स्थिति में हैं, हम कर्ज चुकता कर रहे हैं और डेट तथा जीडीपी का अनुपात कम हो रहा है तो जीडीपी की परवाह नहीं। ऐसे माहौल में राजकोषीय नीति निर्माताओं को इसी कायदे का प्रयोग करना चाहिए। फिलहाल भारत में प्राथमिक घाटा करीब 40,000 करोड़ रुपये का है। इस मजबूत नियम के प्रयोग के लिए आवश्यक है कि घाटे को 40,000 करोड़ रुपये से कम किया जाए। यह कोई बड़ी बात नहीं है। इससे हम गलत राजकोषीय नीति आकलन से बचेंगे। 
 
दूसरी चिंता बढ़ती पात्रता योजनाओं से संबंधित है। इतिहास पर दृष्टि डालें तो केंद्र सरकार का सबसे महंगा निर्णय था एक रैंक, एक पेंशन। अपने आकार के हिसाब से यह देश का एकल सबसे बड़े व्यय वाला निर्णय था। अमेरिका के पास 20 विमान वाहक पोत हैं, हम पर अगर यह बोझ न होता तो शायद हम ऐसे 40 पोत खरीद लेते।  दिक्कत यह है कि एक रैंक, एक पेंशन के शुद्घ मूल्य का आकलन निर्णय लेने के पहले नहीं किया गया। आज भी हमें इसकी पूरी लागत नहीं पता। एक के बाद एक नए वादे सामने आ रहे हैं। खासतौर पर स्वास्थ्य और पेंशन को लेकर। अब तक हम इस स्थिति में नहीं पहुंचे हैं कि ऐसे किसी भी निर्णय को पलटा जाए। इनके क्रियान्वयन की प्रशासनिक क्षमता भी नहीं बन सकी है और अधिकांश नागरिकों को लगता नहीं कि ये वादे पूरे किए जाते हैं। ऐसे में राजनेताओं के पास भी बच निकलने की गुंजाइश बनी रहती है। नीतिगत लचीलेपन की यह गुंजाइश भी क्रियान्वयन के साथ समाप्त हो रही है। 
 
दुनिया भर के नीति निर्माताओं ने अत्यंत कठिनाई के साथ यह सबक सीखा है कि इस प्रकार की लोकलुभावन पात्रता योजनाएं, आगे चलकर बहुत दिक्कतदेह साबित होती हैं। उनका मानना है कि किसी भी अल्पकालिक राजनीतिक लाभ की तुलना 75 वर्ष की अवधि में उसके शुद्घ मूल्य के साथ करके ही ऐसे निर्णय की प्रासंगिकता पर विचार करना चाहिए। एक रैंक, एक पेंशन की तरह देश में स्वास्थ्य और पेंशन के क्षेत्र में जो नए वादे किए जा रहे हैं उनको लेकर भी ऐसा कोई आकलन नहीं किया गया है। जाहिर सी बात है कि अगले वर्ष के अनुमानित व्यय वाले कार्यक्रम के लोभ में पड़ जाना काफी आसान है। 
 
भारत में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो  मध्य आय के चरण में है। हम एक ऐसे परिदृश्य में प्रवेश कर रहे हैं जहां 75 वर्ष का आकलन न किया जाए तो पात्रता योजनाएं अक्सर व्यवहार्य नजर आती हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम कुछ संस्थागत उपाय अपनाएं जिनकी सहायता से इन निर्णयों को रोकने का प्रयास सक्षम ढंग से किया जा सके।  फिलहाल अपेक्षाकृत कमजोर बॉन्ड बाजार की स्थिति में ऐसा उपाय सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी (फिलहाल नदारद) और राजकोषीय परिषद (फिलहाल नदारद) के रूप में ही नजर आता है और इनकी सहायता से ही बजट की प्रक्रिया को कुछ हद तक तार्किक बनाया जा सकता है। ऐसे में जब हम आंतरिक बॉन्ड खरीद बाजार से बाजार आधारित तंत्र की ओर पहलकदमी करते हैं, जहां बॉन्ड के खरीदार स्वैच्छिक हों, तो ऐसे में लंबी अवधि के परिदृश्य को लेकर राजकोषीय मजबूती को लेकर सवाल उठने भी लाजिमी हैं। बॉन्ड बाजार सरकार की ओर से घोषित किए जाने वाले एक से एक उदार कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए पडऩे वाले राजनीतिक दबाव के लिए प्रतिरोध का अच्छा जरिया हो सकते हैं। हम अब मध्य आय वर्ग वाले चरण में प्रवेश कर चुके हैं। अब हमें तत्काल ऐसे संस्थागत उपायों की आवश्यकता है जो मध्य आय वाली अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होते हैं। ऐसा करके ही हम अपनी राजकोषीय नीति को संवार पाएंगे। इसके लिए  जीडीपी के आकलन, सुविचारित बॉन्ड बाजार, सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी और राजकोषीय नीति की आवश्यकता है।
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