बिजनेस स्टैंडर्ड - 3.5 और 7.5 फीसदी के फेर में फंसी अर्थव्यवस्था
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3.5 और 7.5 फीसदी के फेर में फंसी अर्थव्यवस्था

टी टी राम मोहन /  February 01, 2019

राजनीतिक गलियारों में यह महसूस किया जाने लगा है कि तेज विकास से रोजगार नहीं पैदा होंगे। इसलिए राजनेता लोकलुभावन योजनाओं पर ज्यादा खर्च करने लगे हैं जो बड़ा खतरा है। बता रहे हैं टी टी राम मोहन 

 
इस अंतरिम बजट पर आम चुनाव की छाप साफ महसूस की जा सकती है। यकीनन इसमें सबसे बड़ा ऐलान किसानों के लिए नकद हस्तांतरण योजना का है, जिस पर 75,000 करोड़ रुपये की लागत आएगी। साथ ही, समय पर कर्ज चुकाने वाले किसानों के लिए 5 फीसदी के ब्याज अनुदान का ऐलान भी किया गया है।  इसके अलावा, सरकार मध्यम वर्ग को लुभाने के लिए भी हरसंभव प्रयास कर रही है। इस दिशा में अब 5 लाख रुपये तक कोई आयकर नहीं देना होगा। वहीं, अब नौकरीपेशा कर्मचारियों के लिए मानक कटौती भी अब 50,000 रुपये कर दी गई है। सिर्फ इन दो प्रस्तावों से सरकारी खजाने पर 23,200 करोड़ रुपये की चपत लगने वाली है। 
 
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अब एक के बजाय दो रिहाइशी मकानों के लिए पूंजीगत लाभ को रोलओवर करने की सुविधा मिलेगी। वहीं, अब नई पेंशन योजना के तहत सरकारी कर्मचारियों के लिए सरकारी हिस्सेदारी भी 10 फीसदी से बढ़ाकर 14 फीसदी कर दी गई है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सरकार ने 3,000 रुपये मासिक पेंशन का वादा भी किया है।  सरकार की नकद हस्तांतरण योजना का फायदा देश के 12 करोड़ किसानों को मिलेगा। वहीं, आयकर में छूट का फायदा 3 करोड़ करदाताओं को मिलेगा। जाहिर है, चुनावी वर्ष में वित्त मंत्री ने मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई कोशिश छोड़ी नहीं है। 
 
तो सवाल उठता है कि सरकार की इन नेमतों और ऐलानोंं का राजकोषीय स्थिति पर क्या असर पड़ेगा? दो दिनों पहले जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों को बजट के साथ मिलाकर देखें तो बड़ी विरोधाभासी बातें नजर आती हैं। बजट अनुमान के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में जीडीपी की वृद्धि दर 7.8 फीसदी रह सकती है। वहीं, केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के वित्त वर्ष 2016-17 और 2017-18 के लिए संशोधित आंकड़ों की मानें तो चालू वित्त वर्ष में करीब 6 फीसदी वृद्धि दर रह सकती है! सरकार की मानें तो  बजट में 11.5 फीसदी के मामूली इजाफे से अर्थव्यवस्था में 8 फीसदी की रफ्तार आ जाएगी। ऐसे में आप खुद समझ सकते हैं कि राजकोषीय घाटे की हालत क्या रहेगी। 
 
वैसे भी अगले वित्त वर्ष में खर्चों पर लगाम लगाए बिना राजकोषीय घाटे को जीडीपी की तुलना में 3.4 फीसदी की सीमा में बांधे रखना सरकार के लिए काफी मुश्किल होगा। सरकार मानकर चल रही है कि इस वित्त वर्ष में करों से होने वाली कुल कमाई बजट अनुमान के बराबर ही रहेगी, जबकि यह स्पष्ट है कि कुल कर राजस्व अब तक लक्ष्य से कम रहा है। इसी एक अनुमान की वजह से वित्त मंत्री को बजट अनुमानों के मुकाबले पूंजीगत व्यय में इजाफा दिखाने का मौका मिल गया। हकीकत में इस साल पूंजीगत व्यय में चपत लगने वाली है। अगले वित्त वर्ष में कर राजस्व में 15 फीसदी का इजाफे का अनुमान चालू वित्त वर्ष के लिए 19 फीसदी की संभावित बढोतरी की तुलना में तर्कसंगत है। हालांकि, इस उम्मीद की बुनियाद वस्तु एवं सेवा कर में 18 फीसदी के इजाफे पर टिकी हुई है। 
 
जीडीपी की तुलना में 3 फीसदी का राजकोषीय घाटे की बात अब तो एक सपना लगने लगी है। राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) कानून में राजकोषीय घाटे के लिए यही सीमा निर्धारित की गई थी। हालांकि, वित्तीय कानून, 2018 ने 3 फीसदी राजकोषीय लक्ष्य की समय सीमा को चालू वित्त वर्ष से बढ़ाकर 2020-21 कर दिया। इसके तहत सरकार को इस साल यह घाटा जीडीपी के 3.3 फीसदी के दायरे में रखना था, जबकि अगले वित्त वर्ष के लिए 3.1 फीसदी की सीमा निर्धारित की गई थी। अब सरकार ने इन दोनों वर्षों ने इस सीमा को बढ़ाकर 3.4 फीसदी कर दिया है। इसीलिए अब वित्त वर्ष 2020-21 तक इस लक्ष्य को हासिल करना टेढ़ी खीर नजर आती है। 
 
अब एफआरबीएम के लक्ष्य पर गहराई से नजर डालने का समय आ गया है। दरअसल, बजट से इतर वित्तीय प्रबंधनों से इन लक्ष्यों की अहमियत ही खत्म हो जाती है। इस बारे में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने एफआरबीएम पर 2016-17 की अपनी रिपोर्ट में भी जिक्र किया है। सीएजी ने इस बारे में सरकार से बजट से अलग वित्तीय प्रबंधनों का पूरा ब्योरा देने के लिए कहा था। इसके बाद ही हम राजकोषीय घाटे की असल स्थिति जान पाएंगे और फिर एक तर्कसंगत लक्ष्य निर्धारित कर सकेंगे। 
 
जीडीपी की तुलना में करों का बढ़ता अनुपात और कम होते खर्च भी सरकारी खजाने की सेहत के लिए काफी जरूरी हैं। चालू वित्त वर्ष के बजट में इन दोनों बातों का ध्यान रखा गया था। चालू वित्त वर्ष में जीडीपी की तुलना में करों का अनुपात करीब 12.1 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि इससे पहले 2010-15 में यह 10.2 फीसदी रहा था। सरकार ने अगले वित्त वर्ष में यह 12.4 और 2020-21 में 12.7 फीसदी रहने की उम्मीद जताई थी। हालांकि, इस बजट ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इसके मुताबिक 2018-19 में कर-जीडीपी का अनुपात 11.9 फीसदी रहेगा, जबकि अगले दो वित्त वर्षों में यह 12.1 फीसदी के आंकड़े पर स्थिर रहेगा। 
 
हालांकि, सबसे बुरी खबर तो व्यय के मामले में आ रही है। घरेलू उत्पाद की तुलना में सरकार का कुल खर्च 2010-15 के 14.3 फीसदी के मुकाबले इस साल घटकर 13 फीसदी तक आ गया था। लेकिन अगले वित्त वर्ष में इसके 13.3 फीसदी के स्तर तक चढऩे की संभावना है। यह तो बस शुरुआत है। किसानों के लिए नकदी हस्तांतरण योजना का खर्च आने वाले वर्षों में बढ़ता जाएगा। साथ ही, आने वाले वर्षों में सब्सिडी में भी किसी प्रकार की गिरावट की उम्मीद नहीं है, जिन पर सरकार इस वक्त जीडीपी का 1.4 फीसदी खर्च करती है। 
 
राजकोषीय घाटे में अगर गिरावट आती है, तो समझा जाता है कि निजी निवेश बढ़ रहा है और इससे विकास की उम्मीदें को पर मिलते हैं। हालांकि, अब इन संभावनाओं पर संदेह के काले बादल मंडराने लगे हैं। दोहरी बैलेंस शीट की समस्या के निपटारे में देरी का खमियाजा अब निजी निवेश के आंकड़ों पर दिखने लगा है। चालू वित्त वर्ष के लिए संशोधित बजट आंकड़ों में सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में पूंजी निवेश के वास्ते अतिरिक्त आवंटन का कोई जिक्र नहीं हैं और नए वित्त वर्ष में तो इसके लिए कोई आवंटन ही नहीं किया गया है। 
 
राजनीतिक गलियारों में यह बात घर करने लगी है कि तेज विकास से रोजगार नहीं पैदा होंगे और इसीलिए राजनेता अब लोकलुभावन और कल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा खर्च करने लगे हैं। यह सबसे बड़ा खतरा है। इसी वजह से देश के लिए कम से कम निकट भविष्य में 3.5 फीसदी के राजकोषीय घाटे और 7.5 फीसदी की विकास दर का कोई तोड़ नहीं नजर आ रहा। 
 
(लेखक आईआईएम, अहमदाबाद में प्राध्यापक हैं)
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