बिजनेस स्टैंडर्ड - कायम रहा अनुशासन!
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, April 20, 2019 12:09 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कायम रहा अनुशासन!

संपादकीय /  February 01, 2019

चुनाव पूर्व के बजट की दृष्टि से देखा जाए तो पीयूष गोयल का बजट बहुत बुरा नहीं है। वोट दिलाने वाली घोषणाओं पर करीब एक लाख करोड़ रुपये (अगले वर्ष के जीडीपी के एक फीसदी का करीब आधा) व्यय करने की घोषणा की गई है लेकिन राजकोषीय घाटा इस वर्ष के जीडीपी के 3.4 फीसदी के संशोधित आंकड़े से अपरिवर्तित रहेगा। राजकोषीय सुधार में ठहराव सहन किया जा सकता है। अगर इसमें नकारात्मक बदलाव आता तब जरूर गड़बड़ होती। अगर मूलभूत न्यूनतम आय जैसी अन्य घोषणाएं होतीं तब जरूर इसे नकारात्मक कहा जा सकता था। इसके बावजूद अगर महत्त्वाकांक्षी संशोधित आंकड़े अमल में नहीं आए तो चालू वर्ष का घाटा बढ़ सकता है। खासतौर पर निगम कर राजस्व और विनिवेश प्रक्रिया के मामले में। सरकार के ऋण कार्यक्रम के आकार ने पहले ही बॉन्ड बाजार में ब्याज दरों को रोक रखा है जबकि सरकार का ऋण-जीडीपी अनुपात गिरने के बजाय बढ़ता जा रहा है।

 
पांच वर्ष में सरकार ने कर-जीडीपी अनुपात को 2013-14 के 10.1 फीसदी से बढ़ाकर चालू वर्ष के संशोधित आंकड़ों में 11.9 फीसदी तक पहुंचा दिया है। यह उल्लेखनीय सुधार है। अगर आयकर चुकता करने वालों की तादाद के हिसाब से देखा जाए तो कर अनुपालन में भी सुधार हुआ है। इस अवधि में राजकोषीय समायोजन 1.1 फीसदी रहा जो काफी बेहतर है। प्राथमिक घाटा नाम मात्र का है। ऐसे में पूरा घाटा अतीत की गलतियों का परिणाम है। परंतु 3 फीसदी का लक्ष्य शाश्वत है। अगले वर्ष राज्यों के साथ संसाधन साझा करने की वित्त आयोग की अनुशंसा लागू होने के बाद अतिरिक्त दबाव उत्पन्न हो सकता है। हकीकत में मौजूदा वर्ष के आंकड़ों को राज्यों को अनुमानित हस्तांतरण में कमी से भी समर्थन मिला है। 
 
चुनावी घोषणाओं की बात करें तो सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों को आय समर्थन के लिए करीब 75,000 करोड़ रुपये की योजना की घोषणा की है। इसके बचाव में कहा जा रहा है कि यह कृषि उपज के मूल्य में कमी की भरपाई करेगी। यानी यह एक तरह से कारोबारी नुकसान के हर्जाने के रूप में दी जाने वाली राशि है। बात तार्किक है लेकिन अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों के पास इतनी उपज नहीं होती कि वे उसे मंडी में बेच सकें। सच तो यही है कि सरकार का यह कदम न्यूनतम लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना की दिशा में ही एक कदम है। यह एक राजनीतिक कदम है और राज्यों द्वारा की गई ऐसी ही अन्य घोषणाओं को देखते हुए किया गया है। केंद्र सरकार राजनीतिक श्रेय चाहती है। 
 
दूसरी कल्याण योजना असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पेंशन की योजना है जहां सरकार आधी लागत चुकाएगी। यह योजना तमाम अन्य खुली कल्याणकारी योजनाओं की तरह भविष्य में बोझ बन सकती है। अमीर देशों में भी ऐसा देखने को मिल चुका है। आयुष्मान भारत की बात करें तो यह यकीन करना मुश्किल है कि 6,000 करोड़ रुपये का बजट दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम के लिए पर्याप्त होगी। राज्यों के योगदान देने के बावजूद और अगर एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में कम से कम कुछ बार अस्पताल होने की जरूरत पड़े तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 50 करोड़ की बीमित आबादी में से करीब 1.5 करोड़ लोगों को हर साल इलाज की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में यह मानना उचित होगा कि 50 करोड़ की बीमित आबादी का करीब दो फीसदी हर वर्ष अस्पताल में भर्ती हों। संयुक्त रूप से  10,000 करोड़ रुपये के आवंटन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले साल कवरेज बहुत कम होगा या अस्पताल में भर्ती होने की औसत लागत करीब 6,000 रुपये होगी। यह कितना वास्तविक है? 
 
निहायत असमानता भरे समाज में गरीबों या वंचित वर्ग के लोगों के कल्याण पर किए जाने वाले खर्च के खिलाफ दलील देना काफी मुश्किल है। खासतौर पर तब जबकि मध्य वर्ग के लिए निरंतर कर संबंधी राहत की घोषणा की जा रही हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कल्याण योजनाओं पर इस खर्च के लिए राजकोषीय गुंजाइश मौजूदा कार्यक्रमों की फंडिंग कम करके ही तैयार की गई है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अगले वर्ष के आवंटन में इस वर्ष की तुलना में कमी की गई है। इसके अलावा इसमें उज्ज्वला (गरीब परिवारों के लिए एलपीजी कनेक्शन), कर्मचारी पेंशन योजना, अनुसूचित जातियों के विकास के लिए योजना, अन्य वंचित समूहों के लिए ऐसी ही योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत अभियान, श्वेत क्रांति, पोषण आधारित सब्सिडी आदि शामिल हैं। अन्य आवंटन चालू वर्ष के बजट आवंटन से कम हैं। इनमें हरित क्रांति, नीली (मत्स्य) क्रांति, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम और शहरी मिशन आदि। शायद सरकार ने इस बात को अमल में लाना शुरू कर दिया है कि नई कल्याण योजना की आंशिक फंडिंग अन्य मदों में कटौती से की जाए। आयकरदाताओं के सबसे निचले स्लैब को राहत देना तो राजनीतिक दृष्टि से समझ में आ सकता है लेकिन मुद्रास्फीति को देखते हुए कर दायरे को कम करके 3.50 लाख रुपये किया जा सकता था। आखिरी बार 2014 में करमुक्त आयकर का दायरा 2.5 लाख रुपये तय किया गया था। परंतु ऐसा करने से शायद लोकसभा में मोदी मोदी के नारों के बीच मेज थपथपाने का सिलसिला वैसा न चलता जैसा कि देखने को मिला।
Keyword: parliament, narendra modi, BJP, session, interim budget, piyush goel, farmer, industry, GST, income tax, real estate, GDP, fiscal deficit, company, petrol, oil, gas,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या भर्र्तियों में आएगा तेजी का दौर?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.