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सोशल मीडिया मंचों के लिए परीक्षा की घड़ी होंगे चुनाव

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  January 31, 2019

फेसबुक, गूगल और ट्विटर राजनीतिक विज्ञापनों में पारदर्शिता लाने के लिए नए उपाय अपना रहे हैं। ऐसे में आगामी आम चुनाव के दौरान भारत इस परीक्षण के लिहाज से अहम होगा। ये तीनों वैश्विक स्तर पर समाचार प्रसारित करने वाले सबसे बड़े मंच हैं। कम से कम 200 करोड़ लोग समाचार प्राप्ति के प्राथमिक माध्यम के रूप में इनका इस्तेमाल करते हैं। ऑनलाइन विज्ञापन के क्षेत्र में भी इनका बहुत तगड़ा दखल है। गूगल और फेसबुक के पास कुछ खास क्षेत्रों में जबरदस्त बाजार हिस्सेदारी है जबकि ट्विटर तीसरे स्थान पर है। गूगल के पास यूट्यूब के रूप में वीडियो सामग्री का एक बड़ा मंच है और फेसबुक के पास इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप हैं। 

 
वर्ष 2008 में बराक ओबामा ने जब पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा था तब वह सोशल मीडिया के प्रभावी इस्तेमाल का शुरुआती उदाहरण था। वर्ष 2016 में उस समय विवाद उत्पन्न हुआ जब ब्रेक्सिट अभियान (जून 2016) सफल हुआ और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डॉनल्ड ट्रंप को जीत हासिल हुई। उक्त दोनों अभियानों के दौरान सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग (ऑनलाइन गलतबयानी, गाली गलौज आदि करने वाले) करने वालों ने गलत सूचनाएं फैलाईं और वोटिंग के रुख को प्रभावित करने में सफल रहे। इसी अवधि में कैंब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक के निजी यूजर डेटा तक पहुंच बनाई। 
 
वर्ष 2019 में सभी राजनीतिक समूह सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह इस्तेमाल काफी हद तक वैध भी है। परंतु सोशल मीडिया नेटवर्क फेक न्यूज (झूठी खबरों) के भी प्रमुख वाहक हैं। ये झूठी खबरें जनमत बदलने के लिए प्रसारित की जाती हैं। फेसबुक फरवरी में भारत को लेकर खास उपाय जारी करने जा रहा है। इनमें पहला कदम है बेनामी रहने की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करना। कंपनी ने अपने विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों से कहा है कि वे अपने पते और पहचान के दस्तावेज की स्कैन कॉपी मुहैया कराएं जिनका प्रमाणन फेसबुक करेगा। फेसबुक ने राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ भी एक दिशानिर्देश साझा किया है। इसमें सभी सांसद, मुख्यमंत्री और निर्वाचन आयोग के निर्वाचन अधिकारी शामिल हैं। राजनीतिक विज्ञापनों को राजनीतिक व्यक्तित्वों, पार्टियों, चुनावों और विधानों के रूप में अलग-अलग संदर्भित किया जाएगा। राजनीतिक विषयवस्तु वाले पन्नों के एडमिनिस्ट्रेटरों और राजनीतिक विज्ञापकों को प्रमाणिम पहचान और अपने काम करने की जगह बतानी होगी। भारत के बाहर से आने वाली सामग्री को प्रतिबंधित किया जा सकता है।
 
राजनीतिक विज्ञापनदाताओं से कहा जाएगा कि वे अपनी विषयवस्तु और सामग्री के बारे में कहीं अधिक ब्योरा मुहैया कराएं। उनसे भुगतान का ब्योरा भी मांगा जाएगा। फेसबुक इन मामलों में चुनाव आयोग के मानकों का पालन करेगी। इसके तहत मतदान के 48 घंटे पहले प्रचार अभियान बंद होने पर फेसबुक पर भी सामग्री को अवरुद्घ कर दिया जाएगा।  इसके लिए फेसबुक न्यूजफीड को चलाने वाले अल्गोरिद्म में बदलाव किया जाएगा। राजनीतिक दल एक कमी का फायदा उठाते हैं। वह यह कि फेसबुक न्यूजफीड की टाइमलाइन क्रमबद्घ नहीं है। राजनीतिक दल सामग्री अवरुद्घ करने के ऐन पहले उस सामग्री की भरमार कर देते हैं। इससे होता यह है कि बाद में बंदी के समय भी यह सामग्री फेसबुक पर नजर आती रहती है क्योंकि इसकी तादाद में इजाफा हो चुका होता है।
 
सभी विज्ञापनों में यह जानकारी स्पष्ट रूप से दी जाएगी कि उसके लिए भुगतान किसने किया है। उपयोगकर्ता चाहें तो किसी भी ऐसे विज्ञापन को रिपोर्ट कर सकते हैं जिसमें यह जानकारी न दी गई हो। ऐसे में फेसबुक तत्काल कार्रवाई करेगा।  हर प्रकार के राजनीतिक विज्ञापनों को एक ऐसी ऑनलाइन लाइब्रेरी में रखा जाएगा जिसे आसानी से तलाश किया जा सके। वहां विज्ञापन खरीदने वालों की पूरी जानकारी नियामकीय प्रमाणपत्रों आदि के साथ मौजूद रहेगी। ऐसी तमाम जानकारी को कम से कम सात वर्ष तक सुरक्षित रखा जाएगा। अमेरिका और ब्रिटेन में यह व्यवस्था पहले से लागू है। वहां का उदाहरण लें तो इसमें विज्ञापन का बजट, दर्शकों की संख्या और उम्र, लिंग और दर्शकों के स्थान की जानकारी होगी। 
 
गूगल भी ऐसे ही मिलते जुलते उपाय अपनाने पर विचार कर रहा है। गूगल ने तो अमेरिका में राजनीतिक विज्ञापनों का एक ऐसा आर्काइव बना भी लिया है जिसमें खोज की जा सकती है। इन आर्काइव में प्रत्याशी के नाम, विज्ञापनदाता, लागत, समयसीमा, दर्शकों आदि का डेटा आसानी से तलाश किया जा सकता है। भारत में भी वह ऐसा ही एक आर्काइव तैयार करने का प्रयास कर रही है। उसका इरादा आईडी के प्रमाणन शुरू करने का है। उसके विज्ञापनों में भी लेबल लगाकर जानकारी दी जाएगी कि वे भुगतान वाले विज्ञापन हैं। वह भारत के लिए खासतौर पर राजनीतिक विज्ञापनों की पारदर्शिता संबंधी रिपोर्ट तैयार करेगी। 
 
ट्विटर का कहना है कि वह राजनीतिक दलों के खर्च की जानकारी वाला नया डैशबोर्ड प्रस्तुत करेगा। वह चुनाव आयोग के साथ मिलकर यह तय करेगा कि विज्ञापनदाताओं की पहचान सुनिश्चित हो।  अनुमान लगाया जा रहा है कि अकेले चुनाव में ही ऑनलाइन विज्ञापन में 100-120 प्रतिशत उछाल आएगी। राजनीतिक विज्ञापनों की राशि के 12,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर जाने की उम्मीद है। गत वर्ष कुल ऑनलाइन विज्ञापनों पर 11,000 करोड़ रुपये व्यय किए गए थे।  ये कंपनियां फेक न्यूज खत्म करने के लिए सलाहकारों के साथ काम पर लग चुकी हैं। ये मंच राजस्व के इतने बड़े स्रोत को गंवाना नहीं चाहेंगे लेकिन साथ ही उन्हें निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों और आईटी नियमों में प्रस्तावित नए प्रतिबंधों का भय भी होगा। 
Keyword: social media, twitter, facebook,,
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