बिजनेस स्टैंडर्ड - दीर्घकालिक वैश्विक आर्थिक परिदृश्य
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दीर्घकालिक वैश्विक आर्थिक परिदृश्य

आकाश प्रकाश /  January 31, 2019

भारत को जननांकीय लाभांश का फायदा मिलना तय है जबकि चीन के प्रदर्शन में काफी धीमापन आ सकता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
अत्यंत प्रतिष्ठित और स्वतंत्र आर्थिक शोध करने वाली सलाहकार संस्था कैपिटल इकनॉमिक्स ने हाल ही में आगामी 20 वर्षों के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर अपने अनुमान जाहिर किए। इनमें समग्र विश्व अर्थव्यवस्था, उभरते बाजारों और भारत समेत 10 प्रमुख देशों के लिए जताए गए अनुमान शामिल हैं। ये अनुमान दिलचस्प हैं क्योंकि वे इस आम धारणा को नहीं मानते कि भविष्य चीन का है। इसके उलट उनका दांव अमेरिका और भारत पर है। इसकी वजह जरूर अलग-अलग हैं। 
 
उनके अध्ययन के कुछ दिलचस्प नतीजे इस प्रकार हैं:
 
आगामी 20 वर्ष में (2040 तक) वैश्विक जीडीपी की औसत वृद्घि दर करीब 3 फीसदी रहेगी जबकि बीते 20 वर्ष में यह तकरीबन 3.5 फीसदी रही है। क्रय शक्ति समता (पीपीपी) विनिमय दर के आधार पर विश्व अर्थव्यवस्था 80 प्रतिशत तक विकसित होगी। पश्चिम के विकसित देशों का जीडीपी करीब 50 फीसदी बढ़ेगा जबकि उभरते बाजारों में 100 फीसदी बढ़ोतरी होगी। सन 2040 तक उभरते बाजार विश्व अर्थव्यवस्था के 70 फीसदी के लिए जिम्मेदार होंगे जबकि आज यह स्तर केवल 60 फीसदी है। वैश्विक वृद्घि में इनका योगदान 80 फीसदी होगा।
 
उभरते बाजार समग्र रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अच्छा खासा योगदान रखेंगे लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर उनके आर्थिक प्रदर्शन में काफी अंतर होगा। चीन सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था होगा लेकिन आगामी 20 वर्ष में उसमें काफी मंदी आएगी। कैपिटल इकनॉमिक्स के मुताबिक चीन को कई ढांचागत चुनौतियों का सामना करना होगा। उसकी कामगार आबादी अगले 20 साल में 12 फीसदी कम होगी और पूंजी संग्रह में कमी आएगी। देश में प्रतिव्यक्ति सार्वजनिक पूंजी शेयर का स्तर ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। वहां ढांचागत सुधारों को लेकर कोई उत्सुकता नहीं दिख रही जबकि इससे पूंजी आवंटन में सुधार हो सकता है, सरकार की भूमिका कम हो सकती है और इस प्रकार उत्पादकता में इजाफा हो सकता है। अनुमान यह भी है कि चीन की स्थायी विकास दर उक्त अवधि में गिरकर करीब 2 फीसदी रह जाएगी जबकि फिलहाल यह 6 फीसदी है। कामगार उम्र वाले श्रमिकों की आबादी में कमी और उत्पादकता में सुधार कम होगा। ऐसे में वृद्घि दर में कमी आनी तय है। अध्ययन के मुताबिक वैश्विक जीडीपी में चीन की हिस्सेदारी मौजूदा 19 फीसदी से गिरकर 2040 तक 17 फीसदी रह जाएगी। यह बात मौजूदा समझ के विपरीत है। अधिकांश जगह मौजूदा सदी को चीन की सदी बताया जा रहा है। आगामी 20 वर्ष में चीन के प्रति व्यक्ति जीडीपी में 70 फीसदी का इजाफा, बीते 20 वर्ष में हुए पांच गुना इजाफे से काफी कम है। अध्ययन के मुताबिक चीन के लिए प्रतिव्यक्ति जीडीपी अमेरिका के स्तर के एक तिहाई होगा।
 
भारत को लेकर इसके अनुमान और उत्साहजनक हैं। लेखकों का अनुमान है कि अगले 20 वर्ष में भारत 5 से 7 फीसदी की वृद्घि दर हासिल करेगा। यह अन्य देशों के मुकाबले बहुत ऊंची दर होगी। इन अनुमानों के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार तीन गुना हो जाएगा और जीडीपी पीपीपी आधार पर आज के 8 फीसदी से बढ़कर 15 फीसदी पहुंच जाएगी। बाजार विनिमय दर पर भी भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा। देश का प्रति व्यक्ति जीडीपी अमेरिका के 10 फीसदी के स्तर से सुधरकर 25 फीसदी हो जाएगा। यह उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में सबसे अधिक स्तर होगा। 
 
देश की वृद्घि को लेकर यह सकारात्मकता कामगार उम्र की आबादी में इजाफे से है। वर्ष 2025 तक भारत श्रम शक्ति आबादी में चीन को पीछे छोड़ देगा। उत्पादकता को लेकर भी सकारात्मक अनुमान हैं। भारत के पूंजी बाजार में गहराई आ रही है और उसके श्रमिक उच्च उत्पादकता वाले रोजगार अपना रहे हैं। धीमे ढांचागत सुधार प्रक्रियाधीन हैं और ये पूंजी आवंटन और अर्थव्यवस्था की उत्पादकता में सुधार करेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक भारत सभी उभरते बाजारों के बीच शानदार प्रदर्शन करने वाला देश होगा।
 
रिपोर्ट अमेरिका को लेकर भी सकारात्मक है। लेखकों का अनुमान है कि तमाम विकसित देशों में उत्पादकता बढ़ेगी लेकिन अमेरिका शीर्ष पर होगा। कृत्रिम मेधा, रोबोटिक्स जैसी नई तकनीक श्रम की उत्पादकता पर व्यापक असर डालेंगी। अपने खुले और प्रतिस्पर्धी श्रम और उत्पाद बाजारों की बदौलत अमेरिका बढ़त बनाएगा। यह बढ़त बढ़ती उम्र वाली आबादी की कमी की भरपाई करेगी। 
 
वर्ष 2005 से ही अमेरिका में उत्पादकता वृद्घि में धीमापन आया है और यह बमुश्किल एक फीसदी रह गई है। सन 1990 के दशक के मध्य में यह दर 2.3 फीसदी थी। रिपोर्ट में लेखकों ने कहा है कि अमेरिकी उत्पादकता एक बार फिर बढ़ेगी और यह 2030 तक 2 फीसदी हो सकती है। 
 
उत्पादकता में वृद्घि से अमेरिकी जीडीपी वृद्घि को गति मिलेगी और वह 1.5 फीसदी से बढ़कर 2030 तक 2.6 फीसदी हो सकती है। अमेरिका में इस स्तर पर सुधार की उम्मीद किसी को नहीं है। कैपिटल इकनॉमिक्स का अनुमान है कि यह वृद्घि नई तकनीक को अपनाने के कारण आ सकती है। उनका कहना है कि वृद्घि दर के मामले में 2030 तक अमेरिका, चीन से आगे निकल जाएगा। यह बात फिलहाल पर्याप्त विवाद पैदा कर सकती है। 
 
अगर उनके अनुमान सही हैं तो न केवल अमेरिका प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में दुनिया का सबसे अमीर देश बना रहेगा बल्कि अन्य विकसित देशों के साथ उसका अंतर भी बढ़ेगा।  यूरोक्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं को देखें तो इटली को लेकर अत्यंत नकारात्मक अनुमान जताए गए हैं। यूरोप में उसका जननांकीय प्रोफाइल सबसे खराब है और उत्पादकता के मामले में भी उसका प्रदर्शन कोई खास नहीं। इसकी अर्थव्यवस्था ठहरी रहेगी और पूरे यूरो क्षेत्र के लिए समस्या बनेगी। फ्रांस और जर्मनी में उत्पादकता वृद्घि सुधरेगी। 
 
ऐसी किसी भी रिपोर्ट पर गौर किया जाए तो दीर्घावधि में भारत के लिए सकारात्मक बात सहज सुस्पष्ट लगती है। देश का जननांकीय ढांचा सही है, उत्पादकता के मामले में हम आगे बढ़ रहे हैं और युवाओं में उद्यमिता और आकांक्षा बढ़ रही है। ढांचागत सुधारों की बात करें तो धीमे होने के बावजूद इनको अंजाम दिया गया है। आर्थिक वृद्घि और कारोबारी आय में भी गति आनी चाहिए। अगले कुछ दशकों में आगे बढ़ते हुए हमें इन बातों पर ध्यान देना चाहिए। आगामी चुनाव में राजनीतिक दल कई आर्थिक वादे करेंगे। तमाम दल कई लोकलुभावन वादे कर सकते हैं। हमेशा की तरह निवेशकों को जुबान पर नहीं बल्कि वास्तविक कदमों पर ध्यान देना होगा। तमाम निवेशकों को देश की लंबी अवधि की संभावनाओं पर ध्यान देना होगा, न कि आगामी चुनाव से जुड़ी नारेबाजी पर।
Keyword: india, china, economy,,
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