बिजनेस स्टैंडर्ड - असल रोजगार का संकट
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असल रोजगार का संकट

संपादकीय /  January 31, 2019

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के दो वरिष्ठ सदस्यों के इस्तीफा देने के एक दिन बाद गुरुवार को बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा किए गए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार 2017-18 में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही, जो 45 साल में सबसे अधिक है। आयोग के सदस्यों का आरोप था कि सरकार ने देश में बेरोजगारी की स्थिति पर एक सर्वेक्षण जारी करने से रोक दिया है।  युवाओं में बेरोजगारी की दर पिछले वर्षों की तुलना में काफी ऊंचे स्तर पर थी। रिपोर्ट में कहा गया है, 'कुल आबादी की तुलना में काफी अधिक।Ó उदाहरण के लिए 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग वाले ग्रामीण पुरुषों में बेरोजगारी की दर 2017-18 में 17.4 फीसदी पर पहुंच गई, जो 2011-12 में 5 फीसदी थी। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में युवा महिलाओं में बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 में 13.6 फीसदी थी। यह 2011-12 में 4.8 फीसदी थी। शहरी इलाकों में स्थिति और विकराल हुई है, जहां पुरुषों में बेरोजगारी की दर 18.7 फीसदी और महिलाओं में 27.2 फीसदी रही। रोजगार की दर के मामले में भारत विश्व में सबसे कम दर वाले देशों में से एक है। रोजगार की दर में भारी गिरावट वास्तविक संकट को दर्शाती है। इससे पता चलता है कि अगर लोग श्रम बल में शामिल नहीं हैं तो भारत की विशाल आबादी का कोई फायदा नहीं है। एनएसएसओ ने पहली बार पीएलएफएस किया है, जो बेरोजगारी को मापने वाला सालाना सर्वेक्षण है। इससे पहले एनएसएसओ पांच साल में सर्वेक्षण करता था। सरकार ने इस सर्वेक्षण को समाप्त कर पीएलएफएस को चुना था। यह एक अच्छा कदम है क्योंकि सालाना सर्वेक्षण से बेरोजगारी पर बारीक नजर रखी जा सकती है। इतना ही नहीं, पांच वर्ष के सर्वेक्षण एक या दो साल की देरी से आते थे, जिससे उनका समय पर विश्लेषण नहीं हो पाता था। 

 
सरकार ने गुरुवार को कहा कि यह महज एक प्रारूप रिपोर्ट है और इसे जारी करने से पहले और काम करना जरूरी है। लेकिन मुख्य बिंदु यह है कि अवधि में बदलाव के बावजूद पीएलएफएस में इस्तेमाल की गई बेरोजगारी की अवधारणा वही है, जो पिछले सभी पंचवर्षीय सर्वेक्षणों में थी। यही वजह यह है कि प्रारूप रिपोर्ट में पीएलएफएस और सभी पंचवर्षीय दौरों की बेरोजगारी की दर 1972-73 तक दी गई हैं।  शहरी और ग्रामीण पुरुषों तथा महिलाओं में सामान्य स्थिति (मुख्य स्थिति + सहायक स्थिति) पर आधारित बेरोजगारी की दर दर्शाती है कि 2017-18 में इसमें अचानक बढ़ोतरी हुई है। यह सही है कि पूरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है, इसलिए यह साफ नहीं है कि क्या नमूने के आकार और नमूने के डिजाइन जैसे पद्धति कारकों से तुलना करने की क्षमता कम हो गई है। उदाहरण के लिए पंचवर्षीय ईयूएस में पूरे देश का एक नमूना होता था, जिसमें एक लाख परिवार शामिल होते थे। पीएलएफएस एक सालाना सर्वेक्षण है, इसलिए संभव है कि इसमें नमूना छोटा रखा गया हो। वास्तव में आधिकारिक वेबसाइट से यह पता चलता है कि पीएलएफएस में दो अलग-अलग नमूने होंगे। एक ग्रामीण और दूसरा शहरी क्षेत्रों के लिए। इन नमूनों को अलग-अलग समय पर अद्यतन बनाया जाएगा। 
 
सरकार एनएसएसओ के सर्वेक्षण के प्रकाशन को रोक रही है, लेकिन यह बाहर आ रहा है। यह भारत में बेरोजगारी की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। इस सर्वेक्षण में डेटा के संग्रहण का काम जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच किया गया। इसलिए ये नतीजे अहम है क्योंकि ये उन सबूतों की पुष्टि करते हैं कि नवंबर 2016 में नोटबंदी की वजह से आर्थिक गतिविधियां बड़े स्तर पर प्रभावित हुई थीं। केवल ऐसा नहीं है कि 2017-18 में बेरोजगारी का स्तर ऊंचा था, बल्कि बेरोजगारी में भी भारी बढ़ोतरी हुई। 
Keyword: employment, BJP, narendra modi, NSSO,,
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