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केबल में अंतिम छोर पर स्वामित्व एक बड़ा मसला

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  January 30, 2019

यह शुक्रवार क्या लेकर आएगा? यह भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के मार्च 2017 के शुल्क आदेश को लागू करने का अंतिम दिन है। सैटेलाइट ऐंड केबल टीवी पत्रिका के संपादक और कार्यकारी निदेशक दिन्यार कॉन्ट्रैक्टर का कहना है, 'इससे बहुत ज्यादा बखेड़ा पैदा होगा। यह ग्राहकों के लिए बहुत अधिक व्यापक और पेचीदा है।' हर किसी का मानना है कि इस आदेश को लागू करने का पहला तात्कालिक असर यही होगा। इस आदेश में ज़ी जैसे प्रसारकों और टीवी सिग्नलों वितरकों के जटिल संबंधों के प्रत्येक पहलू के बारे में नियम तय किए गए हैं। इन वितरकों में हैथवे जैसे मल्टी सिस्टम ऑपरेटर (एमएसओ), केबल ऑपरेटर और टाटा स्काई जैसी डीटीएच कंपनियां शामिल हो सकती हैं। ट्राई के आदेश में प्रसारकों और वितरकों के बीच राजस्व के बंटवारे (45:55) से लेकर एक बुके में किसी चैनल की अधिकतम कीमत (19 रुपये) तक छोटी से छोटी चीजों का भी ब्योरा दिया गया है। 

 
यह आदेश लागू होने के बाद ग्राहक को 100 चैनल प्राप्त करने के लिए नेटवर्क कपैसिटी फीस के रूप में 130 रुपये और उस पर 18 फीसदी जीएसटी का भुगतान करना होगा। इस तरह यह राशि करीब 154 रुपये होगी। इसमें से 24 दूरदर्शन चैनल अनिवार्य हैं, इसलिए आप यह पैसा 76 चैनलों के लिए चुकाएंगे। अगर वे चैनल फ्री-टू-एयर हैं तो यह राशि 154 रुपये ही रहेगी। अगर वे एचबीओ जैसे भुगतान चैनल हैं तो आपको ऐसे प्रत्येक चैनल की कीमत चुकानी होगी। कॉन्ट्रैक्टर का कहना है कि देश में लगभग 850 लाइसेंस प्राप्त चैनलों में करीब 400 भुगतान चैनल हैं। पहले 100 चैनलों के अलावा अन्य 20 चैनल लेने पर 25 रुपये की नेटवर्क कपैसिटी फीस लगेगी। यह फीस एमएसओ और केबल ऑपरेटर के बीच बंटेगी। ट्राई के चेयरमैन आर एस शर्मा का कहना है कि इसके पीछे मकसद चैनलों के बंडल बनाने को हतोत्साहित करना और पारदर्शिता लाना है। 
 
भारत का टीवी उद्योग 66,000 करोड़ रुपये का है, जिसे 39,300 करोड़ रुपये की कमाई भुगतान राजस्व से होती है। ईवाई के मुताबिक इसमें से केवल 9,900 करोड़ रुपये या 20 फीसदी रकम ही प्रसारकों के पास पहुंचती है। यह आंकड़ा ज्यादातर भुगतान टीवी बाजारों में 70 फीसदी के आसपास है। पहले विचार यह था कि डिजिटलीकरण से ग्राहकों को अलग-अलग चैनल को चुनने का विकल्प मिलेगा और केबल ऑपरेटरों को अपने वास्तविक आंकड़े दिखाने के लिए बाध्य करने से पारदर्शिता आएगी। हालांकि यह योजना पूरी तरह सफल नहीं रही। 
 
भारत में 19.7 करोड़ घरों में टीवी है, जिनमें से करीब 10 करोड़ घरों में केबल है। शेष में से 2 से 3 करोड़ घरों में दूरदर्शन की डीटीएच सेवा- डीडी फ्रीडिश का इस्तेमाल होता है। इसके बाद केवल 6 करोड़ घर बचते हैं, जो निजी डीटीएच ऑपरेटरों की सेवाएं ले रहे हैं। डीटीएच शुरुआत से ही डिजिटल था, इसलिए प्रत्येक के आंकड़े उपलब्ध हैं। ऑपरेटरों का कहना है कि डीटीएच कंपनियां केबल कंपनियों की तुलना में ज्यादा करों का भुगतान करती हैं और प्रसारकों के साथ ज्यादा राजस्व साझा करती हैं। 
 
भारत में औसत केबल ऑपरेटर के पास करीब 1,000 घर हैं। उनमें से कितनों ने 10 करोड़ घरों को अपने बुके या चैनल चुनने के लिए जरूरी ग्राहक प्रबंधन व्यवस्था लागू की है, इसे लेकर बड़ा सवाल है। आप यह तर्क दे सकते हैं कि एमएसओ यह निवेश कर देगा, लेकिन क्या ऑपरेटर उसे अपने प्रत्येक ग्राहक तक पहुंचने देगा। केबल में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दिए हुए तीन साल हो चुके हैं, लेकिन अब तक एक भी निवेशक नहीं आया है। अंतिम छोर पर स्वामित्व अब भी एक बड़ी बाधा है। 
 
यही वजह है कि केबल उद्योग में पारदर्शिता और ग्राहकों के पते सुनिश्चित करने का हर कदम नाकाम रहा है। इन कदमों में कंडीशनल एक्सेस संशोधन से लेकर 2002 में केबल अधिनियम और 2011 में डिजिटलीकरण तक शामिल हैं। शर्मा ने कहा, 'अंतिम छोर पर स्वामित्व को लेकर केबल ऑपरेटर और एमएसओ में झगड़ा है। वर्तमान नियमों में कार्यों को स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है और राजस्व हिस्सेदारी तय की गई है।' ट्राई के शुल्क आदेश का दूसरा दीर्घकालिक असर यह होगा कि आपका मासिक टीवी बिल बढ़ जाएगा। अलग-अलग चैनलों की बाध्यता से सैंपलिंग और वास्तविक टीवी उपभोग में कमी आएगी। कॉन्टै्रक्टर का कहना है कि इससे लोग अपने टीवी कनेक्शन को छोड़ेंगे। ऐसा हो सकता है। लेकिन यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि बिल में बढ़ोतरी के बावजूद भारत पूरे विश्व में सबसे कम टीवी दरों वाले देशों में शामिल है। भारत में टीवी में वृद्धि की भरपूर संभावनाएं हैं। देश में 26.7 करोड़ घर हैं, जिनमें से केवल 19.7 करोड़ घरों में ही टीवी है। इसलिए आधा या एक करोड़ ग्राहकों के टीवी कनेक्शन को काटने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। 
 
शर्मा यह सही कहते हैं कि चैनलों को बंडल मुक्त बनाने से बाजार ताकतें स्वतंत्र होंगी। प्रसारकों को राजस्व स्रोत के रूप में भुगतान या विज्ञापन के बीच किसी को चुनने का फैसला करना होगा। इस समय वे कमजोर चैनलों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए बंडलों का इस्तेमाल करते हैं और  ऐसे चैनल से विज्ञापन राजस्व कमाते हैं, भले ही उसे असल में बहुत कम लोग देख रहे हों।  हालांकि यह आदेश 'विचार-विमर्श की प्रक्रिया' के बाद आया है। लेकिन फिर भी इसे मुकदमेबाजी का सामना करना पड़ा है। यह अब भी बहुत जटिल है और अंतिम छोर पर स्वामित्व के बुनियादी सवाल को हल नहीं करता है। इन जटिलताओं का समाधान होने में यह पूरा साल खप जाएगा, इसलिए 2019 के समाप्त होने का इंतजार कीजिए। 
Keyword: DTH, channel, TRAI,,
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