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देश के ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी बहाली

नीलकंठ मिश्रा /  January 30, 2019

कमजोर खाद्य कीमतें, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी की उपलब्धता को नुकसान पहुंचाती हैं और कर्जमाफी जैसी घटनाएं हालात को और अधिक खराब करने का काम करती हैं। बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
वितरकों और थोक विक्रेताओं से बात करें तो एक साझा बयान सुनने को मिलता है, 'बाजार में पैसा नहीं है।' खासतौर पर कृषि बाजारों में यह बात अवश्य सुनने को मिलती है। यह बात पहली नजर में बेतुकी लगती है। बिक्री का संबंध तो मांग और आपूर्ति से होना चाहिए, इसमें पैसे का क्या काम? परंतु लेनदेन के लिए पैसे चाहिए और असंगठित अर्थव्यवस्था जो देश के जीडीपी के 40 फीसदी के लिए उत्तरदायी है, वह तो केवल नकदी से संचालित होती है। देश का कृषि क्षेत्र लगभग पूरी तरह असंगठित है और वह नकदी पर निर्भर है। सैद्घांतिक तौर पर देखें तो अगर गतिशीलता अधिक हो तो उतनी ही नकदी कहीं अधिक आर्थिक गतिविधियों को अंजाम दे सकती है। यानी एक साल में किसी नकद नोट का जितनी अधिक बार इस्तेमाल होगा आर्थिक गतिविधि उतनी ही अधिक होगी। परंतु यह बदलाव जल्दी नहीं आता है और असंगठित अर्थव्यवस्था में औसतन 10 फीसदी वृद्घि के लिए उपलब्ध नकदी में भी इतना ही इजाफा होना चाहिए। 
 
नकदी की इतनी तंगी क्यों है? कुछ लोग इसे नोटबंदी से जोड़कर देखते हैं जबकि हकीकत में अब नोटबंदी के पहले की तुलना में 14 फीसदी अधिक नकदी चलन में है। हालांकि अभी भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जो नकदी की कमी से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं। मौजूद आंकड़ों के आधार पर गहन अध्ययन कर पाना मुश्किल है। परंतु ऐसा लगता है इसकी अन्य वजह भी हो सकती हैं। नकदी की शुरुआत संगठित अर्थव्यवस्था से होती है: केंद्रीय बैंक नकदी छाप कर बैंकों को देता है। एक बार बैंक से निकासी के बाद उसकी गतिविधि का पता लगाना मुश्किल होता है। परंतु मोटे तौर पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि नकदी किन रास्तों से होकर असंगठित क्षेत्र में जाती है। पहली अनाज खरीद: गैर कृषि कामगार (विशुद्घ उपभोक्ता) किसानों (विशुद्घ उत्पादक) से हर वर्ष करीब 15 लाख करोड़ रुपये का अनाज खरीदते हैं। जब किसान के खाते में ऋण की राशि आ जाती है तो वह इसे निकालकर श्रम, बीज, उर्वरक आदि के लिए भुगतान करता है। भूमि खरीद के मामलों में भी काफी पैसा नकद अर्थव्यवस्था में आता है। बीते कुछ वर्ष में ये सारी संभावनाएं सीमित हुई हैं। कृषि उपज की कमजोर कीमतों के कारण बेहतर माली हालत वाले विशुद्घ उपभोक्ताओं से कमजोर किसानों की ओर स्थानांतरण धीमा होता है लेकिन इसका असर कृषि अर्थव्यवस्था में नकदी की उपलब्धता पर भी पड़ता है। ऋण में भी ठहराव है। पांच वर्ष पहले कृषि ऋण में शुद्घ सालाना इजाफा एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हुआ करता था जबकि आज यह काफी कम है। इसी प्रकार नई परियोजनाओं की घोषणा भी नहीं हो रही, अचल संपत्ति कारोबार में रुकावट है और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में भी गिरावट आई है। 
 
कमजोर प्रबंधन वाली कृषि ऋण माफी योजनाओं ने इस समस्या को और जटिल किया है। सरकारें जल्दबाजी में घोषणा कर देती हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन में वर्षों लग जाते हैं। किसानों पर से कर्ज का बोझ तो कम होता है लेकिन नकदी की उपलब्धता के रूप में होने वाला लाभ केवल बकाया ब्याज के रूप में सामने आता है। अधिकांश मामलों में यह 7 फीसदी सालाना है। दिक्कत यह है कि क्रियान्वयन की लंबी प्रक्रिया के दौरान बैंक नए ऋण देने के इच्छुक नहीं दिखते। इन क्षेत्रों में नकदीकी आवक धीमी हो जाती है और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है।
 
किसान समर्थक योजनाओं से बचना मुश्किल है। अर्थव्यवस्था के विकास के साथ हम ऐसे मोड़ पर पहुंच जाते हैं जहां कृषि से होने वाली प्रति व्यक्ति आय गैर कृषि आय से पिछड़ जाती है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में जहां प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता बहुत अधिक है, उनके अलावा अन्य स्थानों पर कृषि क्षेत्र की आय विनिर्माण या सेवा क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाती। ऐसे में कृषि क्षेत्र को सब्सिडी मिलना आम बात है। स्विट्जरलैंड में कृषि सब्सिडी कुल कृषि उत्पादन के 80 फीसदी के बराबर हैं। दुनिया के सबसे अमीर मुल्कों में से एक स्विट््जरलैंड ऐसा करके ही गोपालन कर पाता है।
 
बेहतर क्रियान्वयन के साथ आय के स्थानांतरण की योजना किसानों के लिए मददगार हो सकती है क्योंकि इससे उन्हें नकदी मिलती है। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (इसे हाल ही में स्वास्थ्य बीमा योजना और ग्रामीण आवास सब्सिडी में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया) के रूप में सरकार के पास एक तरीका है जिसकी सहायता से वह जरूरतमंदों तक नकदी पहुंचा सकती है। ज्यादा नहीं लेकिन थोड़ी बहुत राजकोषीय गुंजाइश है। बीते कुछ वर्षों के दौरान राजकोषीय सुदृढ़ीकरण में भी ठहराव रहा लेकिन इसमें मामूली सुधार हुआ है। हर 10 वर्ष में जीडीपी में सरकारी वेतन और पेंशन की हिस्सेदारी बढ़ जाती है। अगले वेतन आयोग द्वारा इजाफा करने तक यह धीरे-धीरे कम होता है। पांचवें  वेतन आयोग (1997-99) के दौरान यह इजाफा जीडीपी के 2 फीसदी था और छठे (2009-11) में यह 2.5 फीसदी था। पिछले दशकों के उलट सातवें वेतन आयोग (2017-19) के दौरान यह इजाफा बमुश्किल एक फीसदी रहा और समेकित राजकोषीय घाटा भी नहीं बदला। सरकारी वेतन और पेंशन में होने वाली वृद्घि में सन 2027 तक ठहराव आएगा। अगले वर्ष तक इस अनुपात में 0.3 फीसदी गिरावट आ सकती है जबकि 2023 तक यह 1.1 फीसदी रह सकता है। इसके चलते अगले वर्ष केंद्र और राज्यों के बीच 60,000 करोड़ रुपये से अधिक की राजकोषीय गुंजाइश पैदा करनी होगी। 
 
अगर मान लिया जाए कि ग्रामीण आबादी के निचले 30 फीसदी हिस्से को लक्षित किया जाएगा तो दूसरे दर्जे के प्रभाव सहायक हो सकते हैं। इस क्षेत्र में खपत का 60 फीसदी हिस्सा खाद्य है। यहां महंगी कैलरी वाले पदार्थों मसलन दूध, तेल, मांस और अंडों की मांग बढ़ सकती है। इससे इन प्राथमिक जिंसों की कीमत में कुछ तेजी आ सकती है। इससे आय और नकदी शुद्घ उत्पादक को मिलती है।  हालांकि ये केवल अनुमान हैं और अर्थव्यवस्था अलग तरह से भी व्यवहार कर सकती है। इस स्तर पर हस्तांतरण योजना की परख नहीं हुई है और अर्थव्यवस्था पर इसका असर क्या होगा यह कहा नहीं जा सकता। यह कृषि क्षेत्र की कम आय की समस्या का निदान नहीं है लेकिन तात्कालिक राहत दे सकता है। अधिक समृद्घ अर्थव्यवस्थाएं कृषि सब्सिडी दे सकती हैं उनके उलट देश की श्रम शक्ति का बड़ा हिस्सा कृषि से जुड़ा है। उनके लिए वैकल्पिक रोजगार की तलाश करना और कृषि निर्यात को बढ़ावा देना ही समस्या के स्थायी हल हो सकते हैं। 
Keyword: agri, farmer, crop, rural, economy,,
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