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चिंता का विषय

संपादकीय /  January 30, 2019

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) के दो गैर आधिकारिक सदस्यों ने बुधवार को त्यागपत्र दे दिया। ये इस्तीफे इस बात को लेकर कई सवाल पैदा करते हैं कि सरकार असहज करने वाले आर्थिक आंकड़ों को लेकर कैसा बरताव करती है। एनएससी एक स्वायत्त संस्था है जिसका गठन 2006 में किया गया था। उसका काम है सांख्यिकी से जुड़े मामलों में नीतियां तैयार करना, प्राथमिकता तय करना और मानक निर्धारित करना। एनएससी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान (एनएसएसओ) द्वारा तैयार की गई सांख्यिकीय रिपोर्ट को भी स्वीकृत करता है। कार्यकारी अध्यक्ष पी सी मोहनन और जे वी मीनाक्षी के इस्तीफों का अर्थ यह है कि एनएससी में अब केवल दो ही कार्यकारी सदस्य रह गए हैं जबकि इसमें सात सदस्यों की व्यवस्था है। इन इस्तीफों से भी पहले दो सदस्यों के पद खाली थे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इन इस्तीफों के बाद अब एनएससी प्रभावी तौर पर एक निष्क्रिय संस्थान में तब्दील हो गया है। ऐसा इसलिए कि अब इसमें केवल सरकार द्वारा नामित व्यक्ति-मुख्य सांख्यिकीविद प्रवीण श्रीवास्तव और नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी अमिताभ कांत हैं। मोहनन और मीनाक्षी, जिनका कार्यकाल जून 2020 में समाप्त होना था, उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्हें ऐसा लग रहा था कि उनको हाशिये पर कर दिया गया है और गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। 

 
हालांकि तात्कालिक वजह रही एनएसएसओ के घरेलू सर्वेक्षण की पहली सीरीज की रिपोर्ट जारी करने में देरी। इसे 2017-18 का पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएसओ) कहा जाता है। सदस्य सकल घरेलू उत्पाद की बैक सीरीज के आंकड़ों को जारी किए जाने से भी नाराज थे। यह सही है कि सरकार ने जब गत नवंबर में जीडीपी बैक सीरीज के आंकड़े जारी किए थे, तो उसने आंकड़ों को नीति आयोग के जरिये जारी कर एक परंपरा को तोड़ा था। परंपरा के मुताबिक इन आंकड़ों को एनएससी के साथ मशविरा करके जारी किया जाता था। एनएससी के सदस्यों को यह बात रास नहीं आई क्योंकि जीडीपी के बैक सीरीज आंकड़ों को लेकर उसने भी एक रिपोर्ट बनाई थी जिसके आंकड़े सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से मेल नहीं खाते थे। सरकार ने इस रिपोर्ट को 'बस एक और सांख्यिकीय कवायद' कहकर खारिज कर दिया। हालांकि मुख्य सांख्यिकीविद ने यह कहकर सरकार का बचाव किया था कि एनएससी के सदस्यों ने पिछले कुछ महीनों में किसी बैठक में कोई चिंता नहीं जताई। वहीं सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने कहा कि एनएसएसओ का सर्वे रोजगार और बेरोजगारी पर श्रम शक्ति के सालाना अनुमान पर आधारित रहा है, साथ ही इसमें शहरी क्षेत्रों के तिमाही अनुमान शामिल रहते हैं। यह भी कहा गया कि एनएसएसओ जुलाई 2017 से दिसंबर 2018 के तिमाही आंकड़ों का प्रसंस्करण कर रहा है और रिपोर्ट इसके बाद जारी की जाएगी। सच चाहे जो भी हो, एक बात तय है कि देश के अहम आर्थिक आंकड़ों की निर्माण प्रक्रिया में काफी विसंगति है। 
 
दुनिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्था के लिए यह अनावश्यक बाधा साबित हो सकता है। देश के वृहद आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता निवेशकों की दृष्टि से काफी अहम है। फिर चाहे वे रोजगार के आंकड़े हों, जीडीपी वृद्घि के, राजकोषीय घाटे के या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के। इतना ही नहीं, चाहे किसी की भी सरकार को, इन बातों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। देश के वृहद आर्थिक आंकड़ों और उनका विश्लेषण करने वाले संस्थान की प्रतिष्ठा तत्काल बहाल की जानी चाहिए। न केवल इसके तरीके पारदर्शी होने चाहिए बल्कि इनके लिए नियमित, समयबद्घ व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए।
Keyword: NSC, NSSO, resign,,
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