बिजनेस स?टैंडर?ड - फर्नांडिस के निधन से हुआ समाजवादी युग का अवसान
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फर्नांडिस के निधन से हुआ समाजवादी युग का अवसान

अर्चिस मोहन /  01 29, 2019

स्‍मृति शेष

बिजनेस स?टैंडर?ड फर्नांडिस के निधन से हुआ समाजवादी युग का अवसानवर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में एक समय ऐसा था जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का स्वास्थ्य गिर रहा था और जॉर्ज फर्नांडिस के दोस्त तथा समर्थकों का मानना था कि वह वाजपेयी की जगह ले सकते हैं। अगर इस तरह की स्थिति आती तो यह एक विडंबना होती। ऐसा इसलिए है क्योंकि फर्नांडिस का जन्म मंगलूर के एक कैथलिक परिवार में हुआ था और उन्होंने बाकायदा पादरी बनने की शिक्षा ली थी। लेकिन नियति को शायद कुछ और मंजूर था। वह मजदूर आंदोलन से जुड़े, समाजवादी आंदोलन का हिस्सा बने और ताउम्र नास्तिक रहे। यही वजह है कि अगर वह हिंदुत्व की विचारधारा के झंडाबरदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से प्रधानमंत्री बनते तो इसे विडंबना ही कहा जाता। वाजपेयी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार को 2004 के आम चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। 

इसके कुछ साल बाद पहले वाजपेयी और फिर फर्नांडिस अलजाइमर्स के कारण सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। वर्ष 2004 के बाद वाजपेयी ने प्रधानमंत्री आवास खाली कर दिया और 6ए, कृष्ण मेनन मार्ग चले गए। वहां अगले छह साल तक फर्नांडिस उनके पड़ोसी रहे जो 3, कृष्ण मेनन मार्ग पर रहते थे। लेकिन इतने करीब रहने के बावजूद अक्सर दोनों मित्रों का मिलना जुलना नहीं हो पाता था। उनकी देखरेख एक ही एजेंसी संभाल रही थी और उसके कर्मचारी ही दोनों मित्रों तक एकदूसरे की कुशलक्षेम पहुंचाते थे। वाजपेयी का पिछले साल 16 अगस्त को निधन हो गया था जबकि अभी छह महीने भी नहीं बीते थे कि फर्नांडिस भी मंगलवार को चल बसे। 

फर्नांडिस अपनी पीढ़ी के सबसे करिश्माई समाजवादी नेताओं में से एक थे और उन्होंने खुद को आदर्श राम मनोहर लोहिया के अनुरूप ढाला था। वह शुरुआत में श्रमिक संगठन से जुड़े थे लेकिन जल्दी ही वह 1960 के दशक में लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के अहम नेता बनकर उभरे। फर्नांडिस 19 साल की उम्र में मुंबई आए थे। मजदूर संघ के नेता पी डिमैलो और वकील रंजीत भानू के संपर्क में आने से पहले उन्हें फुटपाथ पर सोना पड़ा था।

शुरुआत में फर्नांडिस ने होटल में काम करने वाले वेटरों और हॉकरों को संगठित किया। वह 1960 के दशक में बंबई नगर निगम में सदस्य रहे। फर्नांडिस मुंबई में कामगारों को संगठित करने में जुटे थे और इस दौरान उन्होंने 1967 के आम चुनावों में बंबई दक्षिण सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता एस के पाटिल को शिकस्त दी। यही से उनकी पहचान 'जायंट किलर' के रूप में उभरी। उस दौर में फर्नांडिस के एक आह्वान पर बंबई शहर ठहर जाया करता था और लोकप्रियता के मामले में केवल बाल ठाकरे ही उनकी टक्कर के नेता थे। इन दोनों नेताओं की विचारधारा में काफी अंतर था लेकिन वे एकदूसरे का बेहद सम्मान करते थे।

1967 में राम मनोहर लोहिया के निधन के बाद फर्नांडिस एसएसपी के प्रमुख नेता बनकर उभरे और 1973 में फिर से एकजुट हुई सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष बने। इस तरह उन्होंने कांग्रेस विरोध मोर्चा बनाने के लोहिया के सपने को आगे बढ़ाया। 1974 में उन्होंने रेलवे की देशव्यापी हड़ताल की अगुआई की। तब वह ऑल इंडिया रेलवेमैंस फेडरेशन के अध्यक्ष थे। रेलकर्मियों ने अपनी शिकायतों के कारण यह हड़ताल की थी। फर्नांडिस ने बिजली और परिवहन विभाग के कर्मचारियों तथा टैक्सी चालकों को भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया। यह हड़ताल 8 मई, 1974 को शुरू हुई। इंदिरा गांधी की सरकार ने कार्रवाई करते हुए हजारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया या हिरासत में लिया। 

श्रमिक संगठनों ने 27 मई, 1974 को अपनी हड़ताल खत्म कर दी। सरकार ने फर्नांडिस और श्रमिक संगठनों के दूसरे नेताओं को रिहा कर दिया लेकिन हजारों कार्यकर्ता हिरासत में रहे। हड़ताल से निपटने के लिए इंदिरा गांधी सरकार की ज्यादती और देश में कामकाज ठप होने से सरकार के खिलाफ रोष बढ़ा और 13 महीने बाद देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।

25 जून, 1975 को आपातकाल लागू किया तो फर्नांडिस सहित सैकड़ों नेता भूमिगत हो गए। करीब एक साल बाद फर्नांडिस को गिरफ्तार किया गया। उन पर बड़ौदा डायनामाइट मामले में मुकदमा चला। फर्नांडिस के सहयोगी नेताओं सहित समकालीन सूत्रों के मुताबिक सरकार ने उन्हें फांसी पर लटकाने की योजना बनाई थी। पश्चिम जर्मनी के समाजवादी नेता विली ब्रांड, मॉस्को और स्कैंडिनेवियाई देशों की समाजवादी सरकारों के फोन आने से इंदिरा गांधी सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।

भारतीय लोकतंत्र की एक और विडंबना यह रही कि कर्नाटक में जन्मे और पले-बढ़े फर्नांडिस का अधिकांश राजनीतिक जीवन मुंबई में गुजरा लेकिन उन्होंने 1977 में जेल में रहते बिहार के मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ा और इसमें जीत दर्ज की। फर्नांडिस सोशलिस्ट पार्टी का जनता पार्टी में विलय करने के खिलाफ थे लेकिन उन्हें जयप्रकाश नारायण की इच्छा के सामने झुकना पड़ा। जनता पार्टी की सरकार में फर्नांडिस उद्योग मंत्री बने और उन्होंने कोका कोला तथा आईबीएम जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को विदेशी विनिमय नियमन कानून (फेरा) का पालन करने को कहा। जब इन दोनों कंपनियों ने भारत में अपना कामकाज बंद किया तो जनता सरकार ने 1977 के आम चुनावों में अपनी जीत के उपलक्ष्य में देश में अपना कोला ड्रिंक 'डबल 7' शुरू किया। 

अलबत्ता फर्नांडिस और समाजवादी नेता मधु लिमये जनता सरकार पर आरएसएस विचारधारा के प्रभाव से खुश नहीं थे लेकिन विडंबना देखिए कि कुछ दशक बाद फर्नांडिस उसी पाले में चले गए। आखिरकार दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता सरकार गिर गई। वीपी सिंह की सरकार में फर्नांडिस रेल मंत्री थे। 1990 के दशक के मध्य में फर्नांडिस ने महसूस किया कि वह उस पार्टी में नहीं रह सकते जिसमें लालू प्रसाद हैं और उन्होंने बिहार में समता पार्टी का गठन किया। उन्होंने न केवल नीतीश कुमार को राजनीति में स्थापित किया बल्कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद अलग-थलग पड़ी भारतीय जनता पार्टी को भी सहारा दिया। बिहार में भाजपा और समता पार्टी का गठबंधन बना।

1998 और 1999 में केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार के गठन में फर्नांडिस ने अहम भूमिका निभाई। वह वाजपेयी सरकार में रक्षा मंत्री थे और राजग के सहयोगी दल उन्हें वाजपेयी का उत्तराधिकारी मानते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि बाबरी मस्जिद विध्वंस में भूमिका के कारण लाल कृष्ण आडवाणी सहयोगी दलों को स्वीकार नहीं थे। 

फर्नांडिस का जीवन सादगीपूर्ण था। यहां तक कि वह अपने कपड़े भी खुद ही धोते थे। एक बार वह कपड़े धोते हुए गिर गए थे और उनके सिर पर चोट लग गई थी। लेकिन सर्जरी के बावजूद वह अलजाइमर्स की चपेट में आ गए। वर्ष 2009 के लोक सभा चुनावों में नीतीश कुमार ने उन्हें पार्टी का टिकट देने से मना कर दिया जिससे दोनों के रिश्तों में कुछ खटास आ गई थी। लेकिन बाद में नीतीश उन्हें राज्य सभा में ले आए।  अपने जीवन के अंतिम दशक में फर्नांडिस अधिकांश समय बिस्तर पर ही रहे और वह लोगों को पहचान नहीं पाते थे। बाहरी लोगों को उनके बारे में उस समय जानकारी मिली जब उनकी पत्नी लैला कबीर और करीबी मित्र जया जेटली के बीच मुकदमेबाजी हुई। फर्नांडिस के अंतिम दिनों में लैला कबीर ने उनकी सेवा की। उनका बेटा शॉन विदेश में निवेश बैंकर है।

'निडर और अथक योद्धा थे फर्नांडिस'
पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के निधन पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विपक्षी नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा, 'फर्नांडिस सादा जीवन और उच्च विचार की प्रतिमूर्ति थे।' फर्नांडिस को कामगारों का 'योद्धा' करार देते हुए उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा कि उनका व्यक्तित्व बहुमुखी था।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह स्पष्टवादी तथा निडर थे, जो हमेशा अपनी विचारधारा पर अडिग़ रहे। प्रधानमंत्री ने कहा, 'एक दूरदर्शी रेल मंत्री और एक महान रक्षा मंत्री थे, जिन्होंने भारत को सुरक्षित और मजबूत बनाया। वह अपने कई वर्षों के सार्वजनिक जीवन में अपनी विचारधारा पर अडिग रहे। उन्होंने आपातकाल का जोरदार विरोध किया। उनकी सादगी और विनम्रता उल्लेखनीय थी।' कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने फेसबुक पोस्ट में कहा, 'पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के निधन के बारे में सुनकर दुख हुआ। उन्होंने कहा, 'दुख की इस घड़ी में उनके परिवार और मित्रों के प्रति मेरी संवेदना है।' बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना में शोकसभा में रो पड़े। उन्होंने कहा, 'जॉर्ज साहब के साथ मेरे आत्मीय संबंध थे। वह मेरे अभिभावक थे। उनके नेतृत्व और मार्गदर्शन में बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।' फर्नांडिस के निधन पर सरकार ने दो दिन का शोक घोषित किया है। 

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