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व्यक्तिगत कर संग्रह में संप्रग से बेहतर राजग

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  January 29, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार द्वारा प्रस्तुत पांच बजट और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दो कार्यकाल के बजट की तुलना दिलचस्प बातें सामने लाती हैं। संप्रग-1 के पांच बजट पलनिअप्पन चिदंबरम ने और संप्रग-2 के चार बजट प्रणव मुखर्जी ने तथा एक चिदंबरम ने पेश किए थे। मोदी सरकार के पांचों बजट अरुण जेटली ने पेश किए। उनके पांचवें बजट के संशोधित आंकड़े अभी भी हमारे समक्ष नहीं हैं। 

 
दोनों सरकारों के वित्त मंत्री घाटे को लगाम लगाने के प्रयास में लगे रहे। सब्सिडी के मामले में 2004 से 2008 के बीच चिदंबरम का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। जसवंत सिंह ने 2003-04 में जीडीपी के 1.6 फीसदी के बराबर सब्सिडी व्यय छोड़ा था जिसे चिदंबरम 2007-08 तक घटाकर 1.4 फीसदी पर ले आए। परंतु यह कमी काफी हद तक लेखा की कवायद की करामात थी। जब फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने तथा आयातित उर्वरकों की जरूरत आन पड़ी तो 2008-09 में जीडीपी में सब्सिडी की हिस्सेदारी बढ़कर 2.35 फीसदी हो गई।
 
वर्ष 2008-09 के बजट भाषण में चिदंबरम ने कहा, 'मैं स्वीकार करता हूं कि तेल, खाद्य एवं उर्वरक बॉन्ड के मोर्चे पर सरकार की देनदारी फिलहाल सीमा से नीचे है। अंकेक्षण की यह प्रक्रिया पुराने व्यवहार के अनुरूप ही है। ' मुखर्जी सब्सिडी व्यय बढ़ाने को लेकर पारदर्शी थे। जब उन्होंने 2012-13 में अपना अंतिम बजट पेश किया उस वक्त तक जीडीपी में सब्सिडी की हिस्सेदारी बढ़कर 2.59 फीसदी हो चुकी थी। फरवरी 2013 में संप्रग-2 का आखिरी बजट फिर चिदंबरम ने पेश किया और सब्सिडी व्यय को घटाकर जीडीपी के 2.27 फीसदी के स्तर पर ला दिया।
 
जेटली के पांच बजट में सब्सिडी व्यय में धीमी लेकिन स्थिर गिरावट आई। यह 2014-15 में जीडीपी के 2.07 फीसदी से गिरकर 2018-19 में 1.5 फीसदी पर आ गया। हालांकि 2018-19 के आंकड़ों में संशोधन हो सकता है और कई वजहों से इसमें फिसलन दर्ज की जा सकती है। पिछले 15 वर्ष में कोई भी सरकार सब्सिडी को स्थायी रूप से कम करने में सफल नहीं रही। रक्षा क्षेत्र में जीडीपी के प्रतिशत व्यय में पिछले डेढ़ दशक में चरणबद्ध गिरावट आई। 2003-04 में जीडीपी के 2.18 फीसदी से कम होकर यह 2018-19 में 1.5 फीसदी रह गया। चिदंबरम और मुखर्जी ने रक्षा व्यय को अपने अपने बजट में क्रमश: 2.4 और 1.8 फीसदी रखा। परंतु जेटली के पांच बजट में इसमें लगभग हर वर्ष कमी आई और यह 1.75 फीसदी से शुरू होकर 1.5 फीसदी तक आ गया। इस मोर्चे पर व्यय को लेकर सरकारों ने कोई तेजी नहीं दिखाई।
 
इस अवधि में पूंजीगत व्यय में कमी चिंताजनक रही। जसवंत सिंह ने 2003-04 में इसे बढ़ाकर जीडीपी का 3.96 फीसदी कर दिया था। चिदंबरम ने 2004-05 में अपने पहले बजट में इसे 3.6 फीसदी के उच्च स्तर पर रखा लेकिन बाद के बजट में यह कम होकर 2 फीसदी तक आ गया। केवल 2007-08 में यह बढ़कर 2.4 फीसदी हुआ था। मुखर्जी भी पूंजीगत व्यय को केवल एक बार 2010-11 में 2 फीसदी के ऊपर ले जा सके, उनके शेष सभी बजट में यह 1.7 फीसदी रहा। जेटली का मामला भी अलग नहीं था और उनके पांच बजट में पूंजीगत व्यय 1.6 और 1.9 फीसदी के बीच रहा। 
 
कराधान के प्रयास की बात करें तो चिदंबरम ने संप्रग-1 के पहले चार बजट में अच्छा प्रदर्शन किया और सकल कर राजस्व 2003-04 के 9.57 फीसदी से बढ़कर 2007-08 तक 12.11 फीसदी हो गया। वैश्विक वित्तीय संकट के चलते कर रियायत देने के कारण ही संप्रग-1 के अंतिम बजट में चिदंबरम केवल 10.98 फीसदी कर राजस्व जुटा पाए। संप्रग के दूसरे कार्यकाल में यह 10 फीसदी के आसपास रहा। परंतु राजग के अंतिम चार वर्ष में इसमें तेज उछाल आई और इस वर्ष यह 12 फीसदी का आंकड़ा पार कर सकता है। यह बढ़ोतरी मोटे तौर पर प्रत्यक्ष कर में इजाफे की वजह से हुई। बीते 15 साल में कर राजस्व में इसकी हिस्स्ेदारी 4 फीसदी से बढ़कर 6 फीसदी हो गई जबकि अप्रत्यक्ष कर स्थिर बना रहा। 
 
ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि सीमा शुल्क का योगदान घटा है। संप्रग-1 में यह जीडीपी के 1.8 से 2.1 फीसदी के बीच था। संप्रग के दूसरे कार्यकाल में यह 1.3 फीसदी से 1.8 फीसदी रह गया। जेटली के कार्यकाल में यह 1.5 फीसदी से कम होता हुआ 0.8 फीसदी पर आ गया। अनुमान है कि 2018-19 में यह केवल 0.6 फीसदी रह जाएगा। निगम कर और व्यक्तिगत आयकर राजस्व के मामले में भी संप्रग के के बजट राजग से अलग थे। जीडीपी में निगम कर राजस्व की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है और वह 2003-04 के 2.31 फीसदी से बढ़कर 2008-09 में 3.9 फीसदी हो गई, 2013-14 में चिदंबरम के दौर में यह पुन: घटकर 3.5 फीसदी हुई। जबकि जेटली के पांच बजट में यह अनुपात निरंतर घटा और 2018-19 में यह 3.3 फीसदी रह गया। 
 
व्यक्तिगत आयकर का मामला इससे अलग है। संप्रग के दोनों कार्यकालों में जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी 2 फीसदी से कम रही। केवल दो वर्षों में 2007-08 में यह 2.1 और 2013-14 में 2.12 फीसदी रहा। परंतु राजग के सभी बजट में यह उत्तरोत्तर बढ़ा। 2014-15 के 2.1 फीसदी से बढ़कर यह 2017-18 में 2.62 फीसदी हुआ और 2018-19 में इसके 2.81 फीसदी होने की उम्मीद है। इससे यही लगता है कि राजग के कार्यकाल में उद्यमी जगत का राजकोष में योगदान संप्रग के कार्यकाल की तुलना में कम हुआ है जबकि आयकर राजस्व ने राजग के कार्यकाल में प्रत्यक्ष कर संग्रह बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। यह बेहतर कर अनुपालन और दायरे में विस्तार की बदौलत हुआ। परंतु क्या केवल इतने स्थायित्व से आने वाले वर्षों में सरकार की राजस्व जरूरतें पूरी हो जाएंगी?
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