बिजनेस स्टैंडर्ड - परंपरा का पालन
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परंपरा का पालन

संपादकीय /  January 29, 2019

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार राजकोषीय जवाबदेही को लेकर अत्यंत सावधान रही है। पिछले आम बजट में थोड़ी चूक के बावजूद वह अपने पूरे कार्यकाल के दौरान राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के अपने लक्ष्य को लेकर प्रतिबद्घ बनी रही। यह सरकार के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है और उसे कार्यकाल के अंतिम महीनों में लोकलुभावन कदम उठाकर या चुनावी दबाव के चलते अपना पुराना रिकॉर्ड खराब नहीं करना चाहिए। देश में उच्च वृद्घि का व्यापक और स्थायी आधार तैयार करने के लिए हमें देश में निजी निवेश में सुधार सुनिश्चित करना होगा। इस क्रम में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण अत्यंत अहम है। ऐसा करके ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सार्वजनिक क्षेत्र का कर्ज अन्य क्षेत्रों को बाहर न करे तथा पूंजी के अन्य उत्पादक केंद्र प्रभावित न हों। बहरहाल, बेहतर यह है कि राजकोषीय फिसलन या चूक को येनकेन प्रकारेण छिपाने के स्थान पर उसकी स्पष्ट घोषणा कर दी जाए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने इस महीने के आरंभ में संसद को जो रिपोर्ट पेश की उसमें आरोप लगाया गया कि सरकार उस व्यय को दूसरी जगह स्थानांतरित कर रही है जो पहले बजट प्रक्रिया का हिस्सा हुआ करते थे। बजट से इतर इन क्षेत्रों में सरकारी उपक्रमों की उधारी भी शामिल है। उदाहरण के लिए सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया की मदद करने में बजट सहायता का प्रयोग नहीं किया गया जबकि अतीत में ऐसा किया जाता था। इसके स्थान पर अल्प बचत फंड का इस्तेमाल किया गया। यह स्पष्ट होना चाहिए कि राजकोषीय घाटे के आंकड़ों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ के प्रयास को इस दृष्टि से देखा जाएगा। देश के राजकोषीय अंकगणित की विश्वसनीयता, राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के लक्ष्य को हासिल करने से कहीं ज्यादा अहमियत रखती है। बजट के आंकड़ों में राजकोषीय विसंगति नहीं आनी चाहिए। बल्कि इसमें वास्तविक हालात की एक स्पष्ट और पारदर्शी तस्वीर पेश की जानी चाहिए।
 
यह बात भी अहम है कि चुनाव के पहले पेश किए जाने वाले अंतरिम बजट में कोई बड़ा बदलाव लाने के बजाय उसे लेखानुदान की भांति पेश किए जाने की पुरानी परंपरा का भी ध्यान रखा जाए। चुनाव में ज्यादा वक्त नहीं बचा है, ऐसे में कुछ समय बाद संसद भंग होने के पहले बड़ा नीतिगत निर्णय करना संवैधानिक संस्थान के लिए भी संतोषप्रद नहीं होगा। यही कारण है कि पिछली सरकारों ने भी मोटे तौर पर ऐसा करके अपने उत्तराधिकारियों के हाथ बांधने से परहेज ही किया। अगर सरकार दोबारा चुनाव जीतने को लेकर आश्वस्त हो तो भी उसे ऐसे किसी भी बदलाव से परहेज करना चाहिए जिसके लिए उसे चुनाव के बाद संसद की मंजूरी लेने की आवश्यकता पड़ती हो। भले ही सरकार का पुन: निर्वाचित होना तय हो। उदाहरण के लिए वर्ष 2014 के आम चुनाव के पहले प्रस्तुत किए गए अंतरिम बजट में राजकोषीय समावेशन के लक्ष्य का कड़ाई से पालन किया गया था। उससे पहले 2009 के चुनाव में तत्कालीन वित्त मंत्री ने भी अपने भाषण में कोई भी नई घोषणा करने से परहेज किया था। हालांकि वह पहले कृषि ऋण माफी की घोषणा कर चुके थे। वर्ष 2004 के चुनाव के पहले कराधान में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया था। हालांकि कुछ प्रक्रियाओं को आसान अवश्य किया गया था। व्यय से जुड़ी किसी नई घोषणा को भी बजट भाषण में स्थान नहीं दिया गया था। हालांकि पहले से चल रहे कार्यक्रमों का दायरा बढ़ाया गया था। 
 
इस सरकार को भी द्विपक्षीय सहमति वाले इस सिद्घांत पर टिके रहना चाहिए। अगर सरकार दोबारा चुनकर आती है तो भी व्यय घोषणाओं की उचित जगह बजट नहीं बल्कि उसका चुनावी घोषणापत्र है। सरकार को अधिकार है कि वह चुनावी लाभ वाली योजनाओं के वादे करे लेकिन उसे यह काम सही मंच पर करना चाहिए। उसे देश के फंड का इस्तेमाल करने के पहले इस संबंध में जनादेश हासिल करना चाहिए।
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