बिजनेस स्टैंडर्ड - अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करना ही नहीं काफी
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अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करना ही नहीं काफी

सुनीता नारायण /  January 28, 2019

पांच साल पहले सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट (सीएसई) ने अक्षय ऊर्जा की स्थिति को लेकर अपनी पहली रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उस समय यह क्षेत्र शुरुआती अवस्था में था। तब हम सीएसई के पर्यावरण शोध एवं परामर्श समूह का हिस्सा थे। इस समूह का पूरी तरह यह मानना था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिमों के कारण विश्व को जैविक ईंधनों का इस्तेमाल बंद करने की जरूरत है। 

पांच साल बाद 2019 में हमने अक्षय ऊर्जा की स्थिति की रिपोर्ट प्रकाशित की है। अब काफी कुछ बदल गया है, लेकिन फिर भी बहुत कुछ पहले जैसा ही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक 175 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। अब अक्षय ऊर्जा आने को लेकर कोई सवाल नहीं है। कोई भी व्यक्ति इसकी जरूरत और व्यवहार्यता को लेकर सवाल नहीं उठाता है। अब यह उद्योग भी परिपक्व हो चुका है। अब ऐसी बहुत सी अक्षय ऊर्जा कंपनियां मौजूद हैं, जो सौर पैनल, सौर ऊर्जा संयंत्रों और विंड टर्बाइनों की आपूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धी बोली लगा सकती हैं। 

अक्षय ऊर्जा एक ऐसा उद्योग है, जिसमें चमकते कार्यालय, नए दौर की कंपनियों और उत्साही नेतृत्वकर्ताओं की मौजूदगी है। अब इसका दायरा वैज्ञानिकों और कार्यकर्ता एनजीओ तक ही सीमित नहीं है। यह निश्चित रूप से गांवों में छोटी परियोजनाओं पर काम करने वाले सामुदायिक समूहों की दुनिया से बाहर निकल चुका है। यह बड़ा उद्योग बन चुका है। अक्षय ऊर्जा संयंत्र कोयला आधारित संयंत्रों से मुकाबला कर रहे हैं। अब अक्षय ऊर्जा विद्युत मंत्रालय के अधीन है। अक्षय ऊर्जा ऐसा गौण वैज्ञानिक क्षेत्र नहीं रह गया है, जो अहम क्षेत्रों से मुकाबला नहीं कर पा रहा है। 

इस उद्योग के आंकड़े इसकी वृद्धि के गवाह हैं। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का कहना है कि अब देश में अक्षय ऊर्जा की स्थापित क्षमता बढ़कर 73,000 मेगावाट पर पहुंच गई है। यह देश में बिजली उत्पादन की कुल स्थापित क्षमता की करीब 20 फीसदी है। अच्छे दिनों यानी जब सूर्य खूब चमकता है और हवा बहती है तो अक्षय ऊर्जा क्षेत्र देश की करीब 12.5 फीसदी बिजली की मांग पूरी करती है। बाकी के समय यह करीब 7 फीसदी मांग पूरी करती है। यह योगदान कम नहीं है, लेकिन यह बहुत बड़ा भी नहीं है। 

इसलिए यह अब तक हुए काम को लेकर संतुष्ट होने या अपनी पीठ थपथपाने का वक्त नहीं है। अक्षय ऊर्जा क्षेत्र बढ़ा है, लेकिन भारत के समक्ष खड़ी चुनौतियां भी बढ़ी हैं। असल में ये चुनौतियां ज्यादा जटिल हो गई हैं। हमें इन चुनौतियों पर चर्चा करनी चाहिए। 

पहली चुनौती ऊर्जा तक पहुंच की है। असल तथ्य यह है कि ग्रिड हर जगह तक पहुंचता है, लेकिन बिजली नहीं पहुंचती। भले ही वजह कुछ भी हों, लेकिन आज भी देश के करोड़ों लोग अंधेरे में हैं। दूसरी चुनौती खाना पकाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता की चुनौती है। यह विश्व की बहुत बड़ी समस्या है। अब भी विकासशील देशों की महिलाएं चूल्हे में जैव ईंधन जला रही हैं, जिससे वे इससे निकले जहरीले उत्सर्जन से प्रभावित हो रही हैं। गरीब परिवारों को एलपीजी मुहैया कराने को प्रोत्साहन देने के भारत सरकार के फैसले से रसोई गैस क्षेत्र पर असर पड़ा है। लेकिन यह भी हकीकत है कि इसके बावजूद लोग प्रदूषक जैव ईंधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। निश्चित रूप से लोगों की आमदनी और खाना पकाने में इस्तेमाल वाले ईंधन के बीच सीधा संबंध है। इसलिए लोग अपने सिलिंडर को उतनी बार नहीं भराते हैं, जितनी बार उन्हें भराना चाहिए। 'अन्य' ऊर्जा का संकट अब भी मौजूद है, भले ही अक्षय ऊर्जा का हो या नहीं। 

तीसरी चुनौती वायु प्रदूषण है। प्रदूषित वायु का स्वास्थ्य पर इतना बड़ा असर पड़ता है कि सरकारें भी इस समस्या से इनकार नहीं कर सकती हैं। स्वच्छ दहन या दूसरे शब्दों में अक्षय ऊर्जा वायु को स्वच्छ बनाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। 

निस्संदेह चौथी चुनौती जलवायु की समस्या है। विश्व और भारत जैविक ईंधनों के आदी बने हुए हैं। विकासशील देशों को अपनी जनता के एक बड़े हिस्से को किफायती ऊर्जा मुहैया कराने की जरूरत है। ये देश ऊर्जा के स्रोत के रूप में कोयले को हटाकर कैसे ऊर्जा सुरक्षा मुहैया करा सकते हैं? कैसे? यही सवाल है? इसमें अक्षय ऊर्जा की अहम भूमिका हो सकती है। 

 

इसलिए मैं इन चुनौतियों को मद्देनजर रखते हुए यह कहना चाहूंगी कि अब हमें अक्षय ऊर्जा को लेकर पूरी तरह नया संवाद शुरू करना चाहिए। हमें इसके लक्ष्य फिर से परिभाषित करने की जरूरत है ताकि यह सामाजिक जरूरतें पूरी कर सके। लक्ष्यों को हासिल करना पर्याप्त नहीं हो सकता। अक्षय ऊर्जा से गरीब की ऊर्जा, स्वच्छ वायु और जलवायु परिवर्तन की जरूरतें पूरी होनी चाहिए। सीधें कहें तो इस अक्षय ऊर्जा बाजार को सामाजिक सिद्धांतों में शामिल करने की जरूरत है। अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत बनाने और प्रोत्साहन की जरूरत है ताकि यह बदलाव ला सके। इसलिए ऐसा कैसे होगा? एक बड़े गरीब वर्ग की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक अलग ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली लाने की जरूरत है।

इसमें सस्ती मगर उन्नत एवं स्वच्छ ऊर्जा को उन घरों तक पहुंचाना होगा, जो बुनियादी ईंधन या बिजली भी खरीदने में समर्थ नहीं है। वर्ष 2019 की अक्षय ऊर्जा की स्थिति रिपोर्ट से पता चलता है कि अभी तक इन मानकों पर हमारा ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है। अक्षय ऊर्जा सभी ऊर्जा स्रोतों के समान है, जो कोयला या गैस भी हो सकते हैं। इसका उत्पादन होता है और इसे ग्रिड में पहुंचा दिया जाता है। इसकी आपूर्ति परंपरागत वितरण नेटवर्क के जरिये होती है। इसे अपने पर्यावरण और अपनी सोच के द्वारा सीमित बना दिया जाता है। हमें 2019 और आने वाले वर्षों में इस खामी को दूर करना होगा। अक्षय ऊर्जा एक स्वच्छ एवं ज्यादा समावेशी विश्व के लिए नैतिक और आर्थिक बाध्यता होनी चाहिए। इससे कम से हमें वांछित नतीजे नहीं मिल पाएंगे। इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। 

Keyword: Clean Energy, CSE, Environment, Risk, Solar Panel, Wind Turbine,
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