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जो घर संभालें उनका भी सही जीवन बीमा करा लें

संजय कुमार सिंह /  January 27, 2019

वित्त वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा बताती है कि देश में महज 3.49 फीसदी लोगों ने जीवन बीमा कराया है। इसमें भी अहम बात यह है कि जीवन बीमा पॉलिसी खरीदने में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले बहुत पीछे हैं। उनका अनुपात 1:2 है यानी प्रति 2 पुरुषों के जीवन बीमा खरीदने के बाद 1 महिला बीमा पॉलिसी खरीदती है। बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) की रिपोर्ट कहती है कि 2017-18 में 2.82 करोड़ जीवन बीमा पॉलिसी बेची गईं और पहले साल इनसे 92,135 करोड़ रुपये प्रीमियम इक_ïा किया गया। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक पॉलिसियों की संख्या और प्रीमियम संग्रह में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 32 फीसदी रही। ये आंकड़े पढऩे के बाद तो यही लगता है कि बीमा पॉलिसी खरीदने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बहुत जरूरत है।

 
गृहिणियों के लिए जरूरी
 
जीवन बीमा पॉलिसियों की खरीदारी में महिलाओं की भागीदारी कम रहने की एक वजह यह है कि कई परिवार ऐसे हैं जो उन महिलाओं के लिए बीमा पॉलिसी खरीदने की जरूरत नहीं समझते, जो घर संभालती हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि गृहिणियों के लिए भी जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी जानी चाहिए क्योंकि अगर उनकी अचानक मृत्यु हो जाए तो पति को घर के कामकाज में ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ सकती है। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार कंपनी पर्सनलफाइनैंस प्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'घर की आमदनी पर भले ही कोई असर नहीं पड़े, लेकिन गृहिणी के नहीं रहने पर घरेलू खर्च जरूर बढ़ जाएंगे।' भारत में जीवन बीमा पॉलिसियां सुरक्षा के बजाय कर बचत के मकसद से अधिक खरीदी जाती हैं। प्लानअहेड वेल्थ एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय अधिकारी विशाल धवन कहते हैं, 'जब कोई आय नहीं रहती है तो कर बचाने की जरूरत भी महसूस नहीं होती। इसीलिए गृहिणियों के लिए जीवन बीमा पॉलिसी नहीं खरीदी जातीं।'
 
कई बार बीमा कंपनियां उन महिलाओं को टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी देने में हिचकिचाती हैं, जो कामकाजी नहीं होतीं। वे इसके बजाय उन्हें पारंपरिक या यूनिट लिंक्ड बीमा योजना (यूलिप) अधिक आसानी से दे सकती हैं।  हलाांकि निवेश और बीमा दोनों के उद्देश्य अलग-अलग होते हैं। राघव कहते हैं, 'जिन घरेलू महिलाओं को टर्म इंश्योरेंस लेने में दिक्कत आ रही है, उन्हें सबसे पहले पति के साथ संयुक्त टर्म इंश्योरेंस लेने की कोशिश करनी चाहिए।' कामकाजी महिलाओं को प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी आय की भरपाई के लिए जीवन बीमा पॉलिसी जरूर खरीदनी चाहिए। कुछ ही मामलों में ऐसी महिलाओं को बीमा पॉलिसियां नहीं खरीदनी पड़तीं।
 
पर्याप्त हो बीमा कवर
 
कई लोग पुराने ढर्रे पर चलते हैं और अपनी सालाना आय के 8 से 10 गुना तक बीमा कवर खरीद लेते हैं। लेकिन इस लीक से हटने की सलाह दी जानी चाहिए। राघव कहते हैं, 'उचित तो यह होना चाहिए कि परिवार की शुद्ध हैसियत और जीवन बीमा की बीमित रकम इतनी होनी चाहिए, जो वित्तीय लक्ष्य पूरा करने के लिए, देनदारी निपटाने और खर्चों की भरपाई के लिए पर्याप्त हो।' एक बार बीमित रकम तय किए जाने के बाद पत्नी एवं पति द्वारा ली गई बीमित रकम उनके वेतन के हिसाब से विभाजित की जा सकती है। किसी गृहिणी के लिए इतनी बीमित रकम ली जानी चाहिए, जो उसकेआर्थिक योगदानों के मूल्यांकन के लिहाज से पर्याप्त हो। 
 
हालात बदलें तो कवर भी बदले
 
अगर किसी महिला का परिवार आवास ऋण लेता है या बच्चे का जन्म होता है तो उसे (महिला को) अपनी बीमित राशि बढ़ानी पड़ सकती है। अगर उसकी पुत्री विदेश में शिक्षा पाना चाहती है तो परिवार को इस मद में अधिक बचत करनी होगी और अधिक बीमित रकम वाली पॉलिसी लेनी होगी। आवास ऋण पूरी तरह चुक जाने या बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद बीमित रकम कम की जा सकती है। जब कोई महिला पूर्णकालिक काम छोड़कर (बच्चे पालने या बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने के लिए) अंशकालिक काम करने का निर्णय लेती है तो उसे बीमित रकम घटानी पड़ सकती है। बीमा कंपनियां टर्म इंश्योरेंस की बीमित रकम घटाने से कतराती हैं, इसलिए एक के बजाय दो या तीन बीमा पॉलिसियां खरीदने की सलाह दी जाती है। बीमित रकम घटाने की स्थिति में एक पॉलिसी बंद कराई जा सकती है। अब यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि महिलाएं किस तरह स्वास्थ्य बीमा से जुड़ी जरूरतें पूरी कर सकती हैं। 
 
विवाह बाद बदलें रणनीति
 
विवाह से पहले किसी महिला का नाम उसके माता-पिता की फ्लोटर स्वास्थ बीमा पॉलिसी में ही जुड़ा हो सकता है। लेकिन विवाह के फौरन बाद उसे पति के परिवार के फ्लोटर कवर में शामिल हो जाना चाहिए। बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस में हेल्थ एडिमिनिस्ट्रेशन टीम के प्रमुख भास्कर नेरूरकर कहते हैं, 'आम तौर पर नई विवाहिता को पति की पॉलिसी में शामिल करने का चलन रहा है। वह नवीकरण तक अपने माता-पिता की पॉलिसी में शामिल रह सकती है और नवीकरण के समय अपने पति के साथ नई पॉलिसी ले सकती है।' विवाह के बाद पत्नी एवं पति को यह देखना चाहिए कि उनके नियोक्ता द्वारा दी गई स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में परिवार के सदस्य शामिल हैं या नहीं। इनमें पति/पत्नी का नाम बीमित व्यक्ति की सूची में जोड़ा जाना चाहिए। 
 
अस्पताल और बढ़े खर्चों पर नजर
 
स्वास्थ्य बीमा के तहत बीमित रकम तय करते वक्त उन अस्पतालों में आने वाले खर्च पर विचार करें, जिनमें भविष्य में आप इलाज कराना चाहेंगी। धवन कहते हैं, 'इलाज के लिए हम किसी भी अस्पताल में जा सकते हैं और हर अस्पताल में इलाज का खर्च अलग-अलग हो सकता है। युवा परिवार को फैमिली फ्लोटर स्वास्थ्य बीमा लेते समय उतनी बीमित रकम रखनी चाहिए, जिसमें ज्यादातर बीमारियों का इलाज हो सके। बीमित रकम पर निर्णय लेते वक्त स्वास्थ्य से जुड़ी महंगाई पर भी विचार होना चाहिए। हर पांच साल बाद बीमित रकम की समीक्षा होनी चाहिए।' उम्र और आय बढऩे के साथ परिवार को बुनियादी स्वास्थ्य बीमा कवर पर सुपर टॉप-अप और गंभीर रोग बीमा लेना चाहिए।
 
सोच-समझकर लें मातृत्व लाभ
 
इन दिनों ऐसी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी मौजूद हैं, जिनमें मातृत्व लाभ यानी प्रसव से संबंधित खर्च भी शामिल होता है। इनमें प्रसव मे होने वाले खर्च का बीमा तो होता ही है, जन्म लेते ही नवजात भी इस बीमा के दायरे में आ जाता है। ऐसा बीमा लेना फायदेमंद तो रहता है, लेकिन उसे लेने से पहले खर्च और लाभ का गणित अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। कोई भी कंपनी प्रसव लाभ वाले स्वास्थ्य बीमा के लिए सामान्य स्वास्थ्य बीमा से अधिक प्रीमियम वसूलती है और वह प्रीमियम काफी अधिक भी हो सकता है। इसमें उपलब्ध लाभ की सीमा तय होती है और यह भी निश्चित रहता है कि कितनी बार प्रसव के लिए भुगतान किया जाएगा।
 
उस सूरत में अधिक प्रीमियम देने के बजाय बेहतर यही होगा कि संतान के जन्म के बाद परिवार उसी बीमा कंपनी से नई स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदे और उस पॉलिसी में मातृत्व लाभ शामिल नहीं किए जाएं। इससे प्रीमियम कम हो सकता है। लेकिन हो सकता है कि बीमा कंपनी इसकी इजाजत ही नहीं दे। ऐसे में इकलौता विकल्प यही बचता है कि स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी को दूसरी बीमा कंपनी के पास स्थानांतारित यानी पोर्ट करा लिया जाए। लेकिन इसमें भी कुछ दिक्कतें आती हैं। इसलिए राघव की सलाह ज्यादा कारगर लगती है। वह कहते हैं, 'बेहतर यही है कि संतान के जन्म के समय होने वाले खर्च के लिए रकम पहले से ही बचाकर रख ली जाए। दूसरा विकल्प नियोक्ता की बीमा पॉलिसी पर निर्भर रहने का है, जिसमें आम तौर पर मातृत्व लाभ को शामिल किया ही जाता है।'
Keyword: women, insurance,,
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