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अंतरिम बजट: अगर परंपरा टूटी तो..

आशिष आर्यन /  January 27, 2019

अगर अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल 1 फरवरी को लोक सभा में पेश होने वाले अंतरिम बजट में कर कानूनों में व्यापक बदलावों का प्रस्ताव रखते हैं तो वह संवैधानिक कानून के ऐसे क्षेत्र में प्रवेश कर जाएंगे जहां स्थिति स्पष्ट नहीं है।  संविधान के जानकारों और वकीलों का कहना है कि गोयल को ऐसा करने से रोकने के लिए संविधान में कोई कानून नहीं है लेकिन अगर सरकार कर कानूनों में वैधानिक बदलाव लाने का फैसला करती है तो उसके इस कदम के समर्थन के लिए भी कोई नियम नहीं है। 

 
यूनिवर्सिटी ऑफ पोट्र्समाउथ स्कूल ऑफ लॉ में पब्लिक लॉ ऐंड गवर्नेंस के प्रोफेसर शुभंकर दाम कहते हैं, 'सच पूछिए तो ऐसी कोई कानूनी या संवैधानिक बाधा नहीं है जो सरकार को चुनावी वर्ष में बजट पेश करते समय प्रत्यक्ष करों में संशोधन का प्रस्ताव करने से रोके। सरकार के पास ऐसा करने का पूरा अधिकार है और वह केवल बजट का प्रस्ताव रखती है। इसे पारित तो संसद करती है।' वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के मद्देनजर यह सवाल अहम हो गया है कि सरकार प्रत्यक्ष करों में बदलाव का प्रस्ताव करेगी या नहीं। जेटली ने 7 जनवरी को एक टेलीविजन चैनल से बातचीत में कहा कि अंतरिम बजट मौजूदा परंपराओं के दायरे में होगा लेकिन इसकी सामग्री आर्थिक विवशताओं और सच्चाई के मुताबिक होगी। अमेरिका में इलाज करा रहे जेटली को आराम करने की सलाह दी गई है और उनके 1 फरवरी को बजट पेश करने की संभावना नहीं है। ऐसे में बजट पेश करने की जिम्मेदारी गोयल पर आ गई है। 
 
परंपरा की मानें तो पूर्व में अधिकांश सरकारों ने अंतरिम बजट में आय कर कानून में बड़े बदलावों से परहेज किया है। कई सरकारों ने अप्रत्यक्ष करों में बदलाव किया है लेकिन अधिकांश वित्त मंत्रियों ने अंतरिम बजट में आय कर की दरों को अपरिवर्तित रखा है।  विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे नीतिगत बदलावों की घोषणा करने का तुक नहीं है जो केवल दो-तीन महीने तक ही जारी रहेगी। दाम ने कहा, 'सबसे अच्छा यही है कि नई सरकार को नई नीति बनाने का मौका दिया जाए।' संवैधानिक विशेषज्ञ और लोक सभा सचिवालय में पूर्व महानिदेशक पीडीटी आचार्य का कहना है कि चुनावी वर्ष में सरकार के पास कम समय होता है और यही वजह है कि सरकार पूर्ण बजट के बजाय अंतरिम बजट लाती है। आचार्य ने कहा, 'अगर आप केवल अनुच्छेद 112 को पढ़ें तो सरकार वित्त वर्ष के दौरान कभी भी बजट ला सकती है। अलबत्ता अगर आप अनुच्छेद 12 को अनुच्छेद 83 के साथ पढ़ें तो इससे चीजें साफ हो जाती हैं।' 
 
अनुच्छेद 112 से सरकार को सालाना वित्तीय लेखाजोखा यानी बजट पेश करने का अधिकार मिलता है। इसमें सरकार ऐसे नीतिगत फैसलों का प्रस्ताव करती है जो वह अगले वित्त वर्ष में लाना चाहती है। अलबत्ता अनुच्छेद 83 में कहा गया है कि अगर देश में आपातकाल नहीं है तो लोक सभा का कार्यकाल अनिवार्य रूप से पांच साल में पूरा होना चाहिए। आचार्य ने कहा, 'ऐसे में लोक सभा के कार्यकाल के अंत में अगर सरकार नहीं है तो पूरे साल के बजट का कोई तुक नहीं है।' अगर सरकार परंपराओं के मुताबिक नहीं चलने का फैसला करती है तो भी विशेषज्ञ आगामी अंतरिम बजट में कर कानूनों में बड़े बदलावों की उम्मीद नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि करदाताओं को कुछ राहत दी जा सकती है। 
 
शार्दूल अमरचंद मंगलदास ऐंड कंपनी में पार्टनर संदीप चिलाना कहते हैं, 'परंपरा के मुताबिक कर कानूनों को लेकर बड़े नीतिगत बदलावों की घोषणा की उम्मीद नहीं है।' विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार कर कानूनों में व्यापक बदलावों का प्रस्ताव करती है तो भी भारतीय चुनाव आयोग कुछ ज्यादा नहीं कर सकता। दाम का कहना है कि चुनाव आयोग के पास संसद को यह कहने का अधिकार नहीं है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं। अगर आदर्श चुनाव आचार संहिता भी लागू हो तब भी आयोग सरकार को सलाह दे सकता है। दाम ने कहा, 'लेकिन कानूनन आयोग सरकार को अपनी सलाह मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है।' आचार्य ने कहा कि केवल राष्ट्रपति ही ऐसे बदलावों पर आपत्ति जता सकता है क्योंकि उसकी मंजूरी से ही बजट प्रस्ताव कानून बनेंगे। 
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