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जादू, गणित और मायावती में उलझी मोदी की तकदीर

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 27, 2019

यह एक स्वीकार्य सत्य है कि चुनावी पूर्वानुमान के मामले में पत्रकार अक्सर गलत साबित होते हैं। उस पर भी अगर सभी पत्रकार एक सी बात कहने लगें तो इस बात की गारंटी होती है कि नतीजा एकदम उलट आएगा। ओपिनियन पोल भी कुछ खास सही नहीं होते लेकिन हम पत्रकारों से तो ठीक ही होते हैं। ऐसे में अगर ये सब मिलकर एक सा नतीजा होने की बात कहें तो? हाल ही में कई ओपिनियन पोल आए। लगभग सबका कहना था कि अगर आज चुनाव करा दिए जाएं तो त्रिशंकु संसद की स्थिति देखने को मिलेगी। भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी, कांग्रेस को दूसरा स्थान मिलेगा लेकिन  उसकी सीटें भाजपा से आधी रहेंगी और एक बार फिर गठबंधन सरकार बनेगी।
 
आम चुनाव में अभी तीन महीने का वक्त है और राजनीति में हालात कभी एक से नहीं रहते। फिर भी हम कुछ अहम रुझान पकड़ सकते हैं और इन चुनावों को लेकर कुछ व्यापक निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इनमें से क्या अच्छा या बुरा है, उसका निर्णय मैं आपकी प्राथमिकता पर छोड़ता हूं।
 
सबसे बड़ा संकेतक यह है कि भाजपा भले ही 2014 के बहुमत से दूर रहे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता मोटे तौर पर अक्षुण्ण है। इंडिया टुडे का पोल दिखाता है कि भाजपा का मत प्रतिशत 2014 के 31 फीसदी से केवल एक प्रतिशत कम होगा। यह बात महत्त्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि उनके मूल मतदाताओं का काफी मोहभंग हुआ है लेकिन पहली बार मतदान करने जा रहे करीब 13 करोड़ लोग इसकी भरपाई करेंगे। 
 
इनमें से अधिकांश सन 1996 के बाद पैदा हुए हैं और उनमें और बाकियों में फर्क यही है कि वे अभी तक नौकरी की तलाश में नहीं भटके हैं। जैसा कि मैंने राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान दौरों में देखा, वे अभी भी मोदी की ताकत और करिश्मे के प्रभाव में हैं। उन्हें स्वच्छ भारत, स्किल इंडिया, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग और भारत के बढ़ते वैश्विक कद जैसे प्रचार पर यकीन है। वे न तो बेरोजगारी को लेकर निराश हैं, न उनके समक्ष कोई प्रतिकथन है। यह बात मोदी और भाजपा के लिए मददगार साबित होगी।
 
राजनीतिक मिजाज का ज्यादा संबंध वर्तमान से नहीं बल्कि गतिशीलता से होता है। अगर आप नोटबंदी के बाद जनवरी 2017 के मोदी के चरम उभार से अब तक देखें तो गिरावट साफ है। उस वक्त इंडिया टुडे ने भाजपा को 305 और राजग को 360 सीट दी थीं। दो साल में इसमें एक तिहाई की गिरावट आई है। अगर ऐसा ही जारी रहा तो भाजपा के आंकड़ों में 25-40 की और गिरावट आ सकती है। क्या मोदी इसे बदल पाएंगे। भारतीय जनमानस के बारे में सोचिए। तमाम विविधता और जटिलता के बावजूद यह अत्यंत प्रभावशाली बुलडोजर की तरह है। विशाल, पुरातन, तकनीक सक्षम और चरमराता हुआ, सबकुछ एक साथ। अनगिनत लोगों की शक्ति से यह भीमकाय ढांचा धीमी गति से चल रहा है। एक बार चलायमान होने के बाद इसे उलटी दिशा में मोडऩा मुश्किल है। याद रहे यह अनगिनत लोगों से मिली गति है, मोदी इसे जानते हैं।
 
यही वजह है कि उच्च वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण, सभी निजी संस्थानों में कोटा से लेकर भ्रष्ट और शक्तिशाली लोगों पर सीबीआई छापों जैसे असंभव लगते लोकलुभावन कदमों का सिलसिला चल निकला है। इस सप्ताह बजट के पिटारे में भी कुछ अवश्य होगा। मोदी और अमित शाह को पता है कि अगर आंकड़ा 180 सीटों से नीचे आया तो बहुत मुश्किल होने वाली है। अगर वे अगले 100 दिनों में इस महारथ की दिशा बदल सके तो यह बड़ी बात होगी। यानी आने वाले दिनों में और बड़ी घोषणाएं हो सकती हैं। याद रहे, अभी भी बड़ा काम होगा 13 करोड़ पहली बार मतदान करने वालों को अपने साथ लेना।
 
अगर आप उत्तर प्रदेश और सपा-बसपा गठबंधन को निकाल दें तो देश के बाकी हिस्सों में भाजपा की सीटें लगभग पहले जैसी रहने वाली हैं। कई पोल दिखा रहे हैं कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में 45 से 55 सीटों का नुकसान हो सकता है। यानी 282 में से करीब इतना ही नुकसान उसे होगा। मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में पार्टी विधानसभा चुनाव में भले ही हार गई हो लेकिन लोकसभा चुनाव में एकतरफा जीत भले न हासिल करे लेकिन अपनी पकड़ बनाए रखेगी। उत्तर में हार की कुछ भरपाई पूर्व और पूर्वोत्तर से हो जाएगी। हां, उत्तर प्रदेश उसे बहुमत से अवश्य दूर रखेगा। क्या वह इसकी काट खोज पाएगी? मसलन क्या वह जातियों से परे हिंदू वोट अपील को एकजुट कर पाएगी?
 
कांग्रेस का पुनरुत्थान हो रहा है। आधार के प्रतिशत के मुताबिक देखें तो इसको हो रहा फायदा, भाजपा को हो रहे नुकसान की तुलना में काफी बड़ा है। दिक्कत यह है कि पार्टी का आधार कम है। ऐसे में 200 फीसदी का इजाफा भी इसे 140 के आंकड़े से नीचे रखेगा। हालिया ओपिनियन पोल उसे केवल 100 से अधिक सीट दे रहे हैं। अगर आप यह मान भी लें कि मोदी माहौल नहीं बदल पाएंगे तो भी कांग्रेस में कोई खास सुधार नहीं दिखता। पार्टी की ज्यादातर आशाएं हालिया जीत वाले तीन राज्यों में भाजपा की सीटें कम से कम करने पर केंद्रित हैं। उसके लिए 150 का आंकड़ा अहम है। या तो वह इतनी सीट हासिल करे या भाजपा को इससे नीचे लाए। तीसरा तरीका संप्रग का विस्तार करके अधिक से अधिक क्षेत्रीय और जातीय दलों को साथ लाने का हो सकता है। फिलहाल तो तीनों संभावनाएं नजर नहीं आ रही हैं लेकिन भारतीय राजनीति में दूसरे ध्रुव की वापसी हो चुकी है।
 
पिछले सप्ताह अपने स्तंभ में मैंने तीसरे, चौथे और पांचवें मोर्चे की बात की थी। कांग्रेस और भाजपा दोनों से दूरी रखने वाले दलों के नेताओं को अगर 150 सीट मिलती हैं तो प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार उभर आएंगे। इसकी संभावना बहुत कम है। भाजपा और कांग्रेस के अलावा कोई दल 50 सीटों तक भी नहीं पहुंचेगा। शायद 40 भी नहीं। ऐसी कल्पना तभी साकार हो सकती है जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों मिलकर 272 से नीचे रहें। ऐसा न कभी हुआ है न होने की संभावना है। परंतु 15 से अधिक सीट वाले दल मोलतोल करने की स्थिति में होंगे। बेल्लारी बंधुओं की तर्ज पर उनको जांच और प्रवर्तन से रियायत भी मिल सकती है। उन्हें विशेष दर्जा और अहम मंत्रालय भी मिल सकते हैं।
 
अंतिम गठजोड़ इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसके साथ जा सकते हैं और किसके साथ नहीं? हमें पता है कि वाम दल और सपा कभी राजग के साथ नहीं जाएंगे। ठीक वैसे ही अकाली और शिवसेना कभी संप्रग में नहीं जाएंगे। नजर उन पर होगी जो अतीत में आवाजाही करते रहे हैं। ममता बनर्जी दोनों के साथ रही हैं लेकिन इस बार लगता नहीं कि वे राजग के साथ जाएंगी। 15 से अधिक सीट पा सकने वाले अन्य दल हैं द्रमुक, अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल, तेलुगू देशम, टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस और नीतीश कुमार का जदयू। इन दलों के बीच 100 सीट बंटेंगी और ये किसी के साथ भी जा सकते हैं।
 
यहां मायावती अहम हैं। अगर मोदी को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलता तो इसकी काफी बड़ी वजह मायावती होंगी। उनके पास मत हस्तांतरित करने की ताकत है। अतीत में वह भाजपा के साथ रह चुकी हैं। वाम या दक्षिण की वैचारिकता से वह मुक्त हैं। अगर मनुवाद विरोध ही उनकी विचारधारा है तो कांग्रेस और भाजपा समान दोषी हैं। वह दोनों में से कोई भी हलाहल पी सकती हैं। मोदी शाह को उनकी अहमियत पता है। वे किसी भी तरह उनको अपने साथ लाना चाहेंगे। चुनाव के पहले या उसके बाद। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, भले ही इसके लिए योगी आदित्यनाथ को ही शांत क्यों न करना पड़े। लब्बोलुआब यह कि मोदी की निजी लोकप्रियता और वोट बैंक मोटे तौर पर अक्षुण्ण हैं लेकिन माहौल में नकारात्मकता है। उनके दूसरे कार्यकाल को असल चुनौती उत्तर प्रदेश में हुए गठबंधन से मिल रही है। कांग्रेस में उभार है लेकिन वह अपर्याप्त है। 15 या उससे अधिक सांसदों वाला कोई भी दल प्रधानमंत्री तय करने में अहम हो सकता है लेकिन ऐसा कोई नेता प्रधानमंत्री नहीं बनेगा। करीब 100 सीटें ऐसे दलों को मिलेंगी जो विजेता के साथ जा सकते हैं। इन बातों के बीच मायावती पर करीबी निगाह रखनी होगी।
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