बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंक बोर्ड को नहीं मिले थे अपराध के सबूत
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बैंक बोर्ड को नहीं मिले थे अपराध के सबूत

सोमेश झा / नई दिल्ली January 27, 2019

केंद्र सरकार ने पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) के कार्यकारी निदेशकों केवी ब्रह्माजी राव और संजीव शरण को हटाने का फैसला किया था। उसके कई महीने पहले बैंक के बोर्ड ने जांच में पाया था कि इन दोनों की कोई 'आपराधिक मंशा' नहीं थी और सिर्फ 'लापरवाही के कारण चूक' का मामला बनता है।  देश के सबसे बड़े बैंक धोखाधड़ी के करीब एक साल बाद बिजनेस स्टैंडर्ड ने इस मामले से जुड़े तमाम दस्तावेजों को देखा, जिसके बाद यह तथ्य उभरकर सामने आया है। दिल्ली के इस बैंक में जनवरी 2018 में 14,000 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया था। 
 
वित्त मंत्रालय ने 18 जनवरी को एक असाधारण कदम उठाते हुए राव और शरण को हटाने का आदेश जारी दिया था, जो पीएनबी में कार्यकारी निदेशक के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले थे। वित्त मंत्रालय द्वारा दोनों कार्यकारी निदशकोंं को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के 6 महीने बाद कार्रवाई की गई, इसके साथ ही पीएनबी की पूर्व प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी उषा अनंतसुब्रमण्यन से संभावित चूक के बारे में राय ली गई। इसके पहले मंत्रालय ने अनंतसुब्रमण्यन को  इलाहाबाद बैंक के मुख्य कार्यकारी के रूप में उनके कार्यकाल के आखिरी दिन पिछले साल अगस्त में हटाने का फैसला किया था। 
 
वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) ने भी पिछले साल पीएनबी के बोर्ड से प्रतिक्रिया मांगी थी, जिसने जुलाई 2018 में कानूनी प्रक्रिया के तहत कारण बताओ नोटिस को लेकर बैठक की थी। एमडी और सीईओ सुनील मेहता की अध्यक्षता में पिछले साल 26 जुलाई को हुई बैठक के मिनट्स के मुताबिक, 'डीएफएस ने कोई ऐसी अहम सूचना मुहैया नहीं कराई है, जिससे पता चलता हो कि दो कार्यकारी निदेशकों के खिलाफ आपराधिक मामला या आपराधिक मंशा की जानकारी मिलती हो।' सीबीआई द्वारा आपराधिक मामला दर्ज करने की सरकार की ओर से मंजूरी के बाद राव और शरण दोनों ने ही पिछले साल दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण ली। 
 
बोर्ड का मानना था कि यह 'लापरवाही के कारण चूक' का मामला था, साथ में यह भी कहा कि दो शीर्ष अधिकारी 'पूरी तरह सावधान नहीं थे और उन्हें ज्यादा नियंत्रण के अपने अधिकार' का इस्तेमाल करना चाहिए था। बैठक के मिनट्स के मुताबिक, 'बोर्ड ने पाया कि 2014 और 2016 में पदभार संभालने वाले दो ईडी के खिलाफ डीएफएस की ओर से बोर्ड को मुहैया कराई गई सूचना के आधार पर मौजूदा व्यवस्था में नियंत्रण, अनुपानल या रिपोर्टिंग की चूक के पर्याप्त साक्ष्य नजर नहीं आते।' इसके पहले पिछले साल मई में बोर्ड न केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा नामित किए जाने और मुंबई न्यायालय में अनंतसुब्रमण्यन के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए जाने के बाद राव और शरण के अधिकार वापस ले लिए थे। सीबीआई ने दो आरोपपत्र दाखिल किए थे, जिनमें राव, शरण, अनंतसुब्रमण्यन के अलावा पंजाब नैशनल बैंंक के अन्य अधिकारियों को नामित किया था, जिन्होंने कथित रूप से धोखाधड़ी में अपने 'कार्यों व चूक' के माध्यम से साथ दिया। 
 
पीएनबी का बोर्ड इन कार्यकारियों के अधिकार छीने जाने को लेकर भी अनिच्छुक था।  सरकार की ओर से नामित एके मित्तल का मानना था कि अगर बैंक के बोर्ड की तरफ से उन्हें सूचना दी गई होती तो यह कार्रवाई ज्यादा सम्मानजनक होती। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'हां, हमें पीएनबी बोर्ड के संकल्प की जानकारी थी। हमारी भूमिका थी कि कानून के मुताबिक मह बैंक से सलाह लें, हमने वह किया। यह जरूरी नहींं है कि सरकार बैैंक के विचार से सहमत हो।' सरकार ने रिजर्व बैंक की ओर से भेजी गई प्रतिक्रिया को अपने तर्क का आधार बनाया, जो उसने वित्त मंत्रालय को मार्च 2018 में भेजी थी। इसमें बैंक की ओर से 'अनुपालन संबंधी चूक' और 'बैंंक की कार्यप्रणाली पर उचित नियंत्रण रखने की पीएनबी के प्रबंधन की विफलता'  की बात कही गई थी, जिसकी वजह से कई साल तक धोखाधड़ी चलती रही और बड़ी राशि की हेराफेरी हुई। 
 
बहरहाल पीएनबी बोर्ड ने कहा कि 'यह बाद में समझ में आया कि 2010-11 से मजबूत परिचालन संबंधी आंतरिक नियंत्रण होना चाहिए था, जिसकी वजह से शुरुआती स्तर पर ही धोखाधड़ी का पता लगाया जा सकता था।' इसमें कहा गया है कि कड़ा नियंत्रण और समाधान की व्यवस्था व प्रभावी रिपोर्र्टिंग और अनुपालन प्रमाणन का काम शाखा या क्षेत्रीय कार्यालयों के स्तर पर होना चाहिए, जिससे रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुपालन न होने पर जानकारी मिल सके। बोर्ड ने यह भी कहा है कि रिजर्व बैंक की अगस्त 2016 की अधिसूचना की पीएनबी प्रबंधन द्वारा गहराई से समीक्षा करनी चाहिए थी, लेकिन आरोप लगाया गया कि अधिकारियोंं द्वारा शाखा और क्षेत्रीय स्तर पर अपर्याप्त अनुपालन प्रमाणन हुआ और उच्च स्तर पर धोखाधड़ी को पकड़ा नहींं जा सका। आखिर मेंं बोर्ड ने निष्कर्ष में कहा कि बैंक को संगठनात्मक ढांचे, भूमिका में स्पष्टता और हर स्तर पर जवाबदेही, रिपोर्टिंग लाइन, व्यवस्था, प्रक्रिया, नियंत्रण, अनुपालन प्रमाणन और नियामकीय रिपोर्र्टिंग की समीक्षा करने की जरूरत है, जिससे इस तरह की धोखाधड़ी से बचा जा सके। पीएनबी के चेयरमैन द्वारा हस्ताक्षरित बैठक के मिनट्स में कहा गया है, 'इसके अलावा डीएफएस पूर्णकालिक निदेशकों की भूमिका व दायित्वों को लेकर उनकी भूमिका की स्पष्टता पर भी विचार कर सकता है।' 
 
मुंबई के ब्रैडी हाउस शाखा के कर्मचारियों के सहयोग से नीरव मोदी और मेहुल चौकसे से जुड़ी कंपनियों को लेटर आफ अंडरटेकिंग (एलओयू) का इस्तेमाल कर गलत तरीके से 14,000 करोड़ रुपये कर्ज दिए गए थे। दोनों को सरकार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया है। 
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