बिजनेस स्टैंडर्ड - इलाके के हिसाब से मिले किसानों को राहत पैकेज
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इलाके के हिसाब से मिले किसानों को राहत पैकेज

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली 01 27, 2019

किसानों को राहत

►  नीति आयोग ने किसानों को राहत के लिए तैयार किया प्रस्ताव
►  सरकार इस सप्ताह ले सकती है इस पर निर्णय

बिजनेस स्टैंडर्ड इलाके के हिसाब से मिले किसानों को राहत पैकेजनीति आयोग ने संकट से जूझ रहे किसानों को राहत देने के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया है जिस पर सरकार विचार कर रही है। आयोग के अधिकारियों का कहना है कि इस प्रस्ताव से सरकारी खजाने पर कम से कम बोझ पड़ेगा और साथ ही इससे बाजार की व्यवस्थाओं पर भी न्यूनतम असर होगा। इस मॉडल को क्षेत्र आधारित आय मुआवजा (एबिक) नाम दिया गया है। इसमें कहा गया है कि किसानों को वास्तविक मूल्य और सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के बीच अंतर का भुगतान किया जाना चाहिए। मॉडल के मुताबिक यह मुआवजा जिला स्तर पर विपणन अधिशेष के अनुमान और फसल के मौसम में कीमतों को देखते हुए प्रति एकड़ आधार पर तय किया जाएगा। सरकार इस सप्ताह किसानों के लिए राहत पैकेज की घोषणा कर सकती है। 

नीति आयोग के प्रस्ताव के मुताबिक हर जिलों में भुगतान अलग होगा और इसे आसानी से लागू किया जा सकता है क्योंकि देशभर की 3000 से अधिक मंडियों में कीमत की जानकारी रोजाना आधार पर सरकार के पोर्टल एगमार्केट.एनआईसी.इन पर उपलब्ध रहती है। इस मॉडल को किसानों को पहले हुए नुकसान का मुआवजा देने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि एगमार्केट पोर्टल में पिछले महीनों के दौरान मंडियों में आवक और कीमतों के आंकड़े उपलब्ध हैं। यह भुगतान उन जिलों में लागू नहीं होगा जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए सरकारी खरीद चल रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे जिलों में कीमतें एमएसपी के आसपास होगी। 

नीति आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'भुगतान के इस तरीके से उत्पादकता में बदलाव और विभिन्न मंडियों में कीमतों में अंतर का ध्यान रखा जाएगा और इससे बाजार में कम से कम व्यवधान होगा।' आय अंतरण के दूसरे मॉडलों में प्रति एकड़ और पारिवारिक आधार पर भुगतान किया जा रहा है,चाहे किसानों ने कितनी फसल बेची हो या कितना उत्पादन किया हो। इनमें तेलंगाना की रैयत बंधु और ओडिशा की कालिया योजना शामिल है।

कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक कार्यक्रम में कहा था कि सरकार सीधे किसानों को एमएसपी का भुगतान करने के उपायों पर काम कर रही है। किसानों को एक विशेष पोर्टल के जरिये अपनी जोत और फसल उत्पादन की जानकारी देनी होगी और फसल की कटाई खत्म होने के बाद एमएसपी तथा वास्तविक बाजार मूल्य में अंतर की राशि का भुगतान किया जाएगा। 

नीति आयोग ने पाया कि 2017-18 में अगर कनार्टक के बेलगाम जिले में किसानों की सारी फसल एमएसपी पर बिकी होती या खरीदी गई होती किसानों को वास्तविक मूल्य से 176 करोड़ रुपये अधिक मिलते। अगर किसानों को कीमत में नुकसान के मुआवजे के तौर पर यह राशि दी जाए तो यह प्रति किसान प्रति एकड़ करीब 1,670 रुपये बैठेगी। यह मुआवजा केवल उन फसलों पर लागू होगा जिनके लिए सरकार ने एमएसपी तय किया है। एक अन्य अधिकारी ने कहा, 'इस मॉडल के जरिये किसानों को पूर्व में हुए नुकसान के लिए भी मुआवजा दिया जा सकता है और इसका सरकारी खजाने पर कम से कम बोझ पड़ेगा।' एबिक मॉडल से बाजार शक्तियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही इससे निर्यात पर भी कोई प्रभाव पडऩे की आशंका नहीं है और मुआवजा सीधे किसानों को दिया जाएगा। 

अधिकारियों का कहना है कि अल्पकालिक कृषि ऋणों के समय पर भुगतान पर किसानों को ब्याजरहित मुफ्त फसल बीमा देने का भी प्रस्ताव है। यह किसानों को मिलने वाले राहत पैकेज का हिस्सा होगा। अभी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत सरकार खरीफ की सभी फसलों पर दो फीसदी, रबी की फसलों पर 1.5 फीसदी और बागवानी पर पांच फीसदी बीमा किस्त लेती है। अल्पकालिक कृषि ऋण में ब्याज सहायता के लिए केंद्र ने 2018-19 में करीब 15,000 करोड़ रुपये खर्च किए और अगर ब्याज को पूरी तरफ माफ किया जाता है तो यह राशि 28,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। अभी किसानों को सात फीसदी ब्याज दर पर 300,000 रुपये तक का अल्पकालिक कृषि ऋण मिलता है।

त्वरित भुगतान के तौर पर किसानों को तीन फीसदी का अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जा रहा है। सरकार ने इस वित्त वर्ष में किसानों को 11 लाख करोड़ रुपये का ऋण देने का लक्ष्य रखा है। पिछले वित्त वर्ष में किसानों को 11.69 लाख करोड़ रुपये का ऋण दिया गया था जो 10 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से अधिक था। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हाल में हुए विधानभा चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा की हार के बाद किसानों को राहत देने के उपायों पर विचार किया जा रहा है। कृषि संकट को भाजपा की हार का मुख्य कारण माना जा रहा है। 

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