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जेटली का बजट

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  January 25, 2019

अगले सप्ताह मोदी सरकार राजस्व एवं व्यय से जुड़े आंकड़ों का अंतिम लेखा-जोखा संसद में पेश करेगी। उसमें यह बात निश्चित तौर पर नजर आएगी कि अरुण जेटली के वित्तीय कमान संभालने के बाद पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकार की वित्तीय स्थिति सुधरी है। यह पिछली सरकार के 2013-14 के दौरान दर्ज आंकड़ों के संदर्भ में है। कर राजस्व में ऐसे समय में 81 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है जब सकल घरेलू उत्पाद (महंगाई सहित चालू कीमतों पर) में संभवत: 67 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई होगी। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए बजट अनुमान में कुछ कमी भी आती है तो भी जीडीपी वृद्धि के मुकाबले कर राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार ने बेहतर प्रयास किए होंगे। हालांकि गैर-राजस्व वृद्धि के संबंध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। पांच साल के दौरान कुल राजस्व में 57 प्रतिशत वृद्धि होने का अनुमान है, जिनमें उधारी में मात्र 24 प्रतिशत वृद्धि हुई है। निश्चित तौर पर यह प्रदर्शन सराहनीय है। 

 
व्यय के मोर्चे पर सड़क एवं रेल तंत्रों के लिए सर्वाधिक रकम आवंटित हुई है। आधार वर्ष से तुलना करें तो सड़क तंत्र के लिए आवंटन 150 प्रतिशत अधिक रहा है। दूसरी तरफ रेल ढांचे में भी निवेश तिगुना हो गया है। रेलवे के आवंटन में तेजी का अंदाजा 2013-14 और मौजूदा साल के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए पटरी का दोहरीकरण और तिहरीकरण दर 750 किलोमीटर से बढ़कर 18,000 किलोमीटर और अमान परिवर्तन 450 किलोमीटर से बढ़कर 5,000 किलोमीटर तक पहुंच गया है। रेलवे का राजस्व जरूर धीमी रफ्तार से बढ़ा है। विशिष्ट माल गलियारे जैसी प्रमुख परियोजनाओं की शुरुआत नहीं होना मोटे तौर पर इसकी वजह मानी जा सकती है। रेलवे के संचयी राजस्व में 43 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। 
 
इन मदों में गई मोटी रकम की भरपाई के लिए सब्सिडी पर खर्च होने वाली रकम नियंत्रित की गई है और पिछले पांच साल के दौरान इसमें  4 प्रतिशत से भी कम इजाफा हुआ है। हालांकि खाद्य सब्सिडी के मद में जबरदस्त वृद्धि हुई है और यह आंकड़ा 90 प्रतिशत उछला है। उर्वरक पर सब्सिडी में लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है और पेट्रोलियम पर सब्सिडी में कमी आई है। ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम के लिए अधिक रकम मिली है और आवंटन 33,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर बजट में 55,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। ऐसी खबरें हैं कि इस मद में अतिरिक्त रकम भी आवंटित की जा सकती है। ज्यादातर बढ़ोतरी पारिश्रमिक की ऊंची दर हो सकती है, लिहाजा यह स्पष्ट नहीं है कि रोजगार के दिन बढ़े हैं या नहीं। केंद्र एवं राज्य के बीच की वित्तीय व्यवस्थाओं में बदलाव के कारण तुलना करना आसान भी नहीं है। तब भी इतना तो कहा जा सकता है कि विद्यालय शिक्षा के मद में आवंटन स्थिर रहा है, वहीं उच्च शिक्षा के लिए आवंटन में 40 प्रतिशत इजाफा हुआ है। रक्षा क्षेत्र के लिए आवंटन कम किया गया है, खासकर पूंजीगत व्यय मात्र 19 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा है। इसकी तुलना में रक्षा राजस्व व्यय में 48 प्रतिशत इजाफा हुआ है, जबकि पेंशन के मद में होने वाली रकम खासी बढ़ी है और यह अब पूंजीगत व्यय से अधिक हो गई है। एक ओर जब देश की सुरक्षा व्यवस्था कम चुस्त-दुरस्त लग रही है, ऐसे में यह आंकड़ा माथे पर शिकन डालने वाला है। व्यापक परिदृश्य में देखें तो सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन के मद में जाने वाली रकम नियंत्रण से बाहर हो सकती है। 
 
पिछले साल बजट में हुई बढ़ोतरी का लाभ कृषि मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा, दूरसंचार, पेयजल, स्वास्थ्य, शहरी विकास एवं आवास, ग्रामीण विकास एवं जल संसाधन आदि विभागों को मिला है। सरकार भारतनेट, ग्राम सड़क योजना, आवास योजना (गरीबों के लिए आवास), स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत, कृषि सिंचाई योजना (फसल बीमा) और नमामि गंगे जैसे कुछ अहम कार्यक्रमों को वरीयता क्रम में ऊपर रख रही है। यह स्पष्ट है कि एक तरफ आवंटन बढ़ेगा तो कहीं न कहीं दूसरे क्षेत्रों को कम रकम से संतोष करना होगा। उदाहरण के तौर पर नागरिक विमानन मंत्रालय के लिए आवंटन कम हुआ है। भौतिक ढांचे पर अधिक जोर के मद्देनजर यही अपेक्षा रही होगी कि कुल व्यय संतुलन पूंजीगत व्यय की तरफ गया होगा। ऐसा नहीं है, क्योंकि सब्सिडी पर खर्च नियंत्रित होने के बावजूद राजस्व (मौजूदा) व्यय पूंजीगत व्यय की रफ्तार से ही बढ़ा है। सरकार पर किसानों को राहत देने का भी दबाव है, बुनियादी आय की व्यवस्था किए जाने की भी चर्चा चल रही है। ऐसे में रुझान पलट सकता है और राजस्व व्यय के तहत अधिक रकम खर्च की जा सकती है।  
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