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कोटलर के मानदंडों पर खरा नहीं उतर पाएंगे भारतीय नेता

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  January 24, 2019

प्रबंधन गुरुओं के बीच जो स्थान पीटर ड्रकर का था, वही स्थान मार्केटिंग पेशेवरों के बीच फिलिप कोटलर का है। इसी वजह से अपने नाम पर एक पुरस्कार नरेंद्र मोदी को देने के कोटलर के फैसले को अजीब कहा जा सकता है। इतना अजीब कि इससे मीडिया हाउस इस फैसले की तह में जाने को लेकर प्रोत्साहित हुए। द वायर ने पूरी सतर्कता से शोध कर एक लेख प्रकाशित किया है, जिसमें इस पुरस्कार का संबंध सऊदी सरकार के स्वामित्व वाले पेट्रोरसायन समूह से जोड़ा है। इस समूह की एक इकाई गुजरात में है और यह भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है। यह बात भी सामने आई है कि निर्णायक मंडल के दो सदस्य- विज्ञापन उद्योग के दिग्गज वाल्टर वियरा और गौतम महाजन ने पुरस्कार के फैसले की प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया। 

 
इसके बाद इस मुद्दे को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया और कोटलर को मार्केटिंग जनरल के संपादक क्रिश्चियन सरकार को एक 'साक्षात्कार' के जरिये सफाई देनी पड़ी। उनका इस सवाल का जवाब जरूर कुछ अहमियत रखता है कि उनकी परिभाषा के मुताबिक राजनीतिक नेतृत्व का सबसे अच्छा उदाहरण कौन है। असल में तीसरे सवाल से पूरा साक्षात्कार मनोरंजक है, जिसे न कोटलर और न ही सरकार नकार सकते हैं।  उन्होंने कहा, 'इस पुरस्कार के पीछे सोच एक प्रमुख जन नेता को सम्मानित करना है, जिसने उस देश में लोकतंत्र और आर्थिक वृद्धि को एक नया जीवन दिया है।' कोटलर नेतृत्वकर्ता पुस्कार के लिए वह नेता पात्र है, जो प्रतिनिधि सरकार और सामाजिक न्याय में भरोसा रखता है। वह यह मानता है कि एक अच्छा समाज स्वस्थ कारोबारी माहौल बनाएगा। जो उद्यमों को अपनी चर्चा के केंद्र में तीन तथ्यों- संतुलित लाभ, लोगों और ग्रह को रखने के लिए प्रोत्साहित करता है। जो लोकहित के लिए पूरी ईमानदारी और मनोयोग से काम करता है। 
 
इन मानदंडों पर प्रधानमंत्री सबसे आगे रहे। उन्होंने वैश्विक मंच पर देश की छवि और पहचान सुधारी है। डब्ल्यूएमएस में एक समिति ने उपर्युक्त मानदंडों के आधार पर संभावित नेताओं पर मतदान किया था। उन्होंने न अन्य नेता चिह्नित किए और न ही उनसे प्रतिस्पर्धा में शामिल अन्य नेताओं के नाम बताने के लिए कहा गया। उन्होंने कहा, 'अंतिम फैसला मेरा था।' ये सब बातें सीधे मोदी के लिए हैं, जो कॉरपोरेट शब्दावली (जैसे देश का नेता राष्ट्र के ब्रांड का संरक्षक) में आनंदित होते हैं और चंद्रबाबू नायडू की तरह खुद को सीईओ के प्रकार का राजनेता मानना पसंद करते हैं। इस अवधारणा के जोखिम डॉनल्ड ट्रंप में देखे जा सकते हैं। ट्रंप दावा करते हैं कि उनका कारोबारी कौशल उन्हें विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को चलाने में मदद करता है। 
 
कोटलर के चार मापदंडों को सरसरी पढऩे से न केवल इस मार्केटिंग गुरु के तर्कों की कमजोरी बल्कि फैसले के कॉरपोरेट मानकों को राजनीति और राजनेताओं पर लागू करने के जोखिम का भी पता चलता है। यह जोखिम तब और बढ़ जाता है कि जब इन मानदंडों को भारत जैसी अत्यधिक जटिल और विविधतापूर्ण राजनीति पर लागू किया जाता है। कोटलर ने ऊपर जिन मानदंडों का उल्लेख किया है, उन्हें पूरा करने का दावा किसी भी लोकतंत्र का राजनेता कर सकता है। इसी तरह भारत जैसे देश में राजनीतिक पर बड़े वाद-विवाद जारी रहते हैं। ऐसे देश में इन चार मानदंडों को लेकर आसानी से सवाल उठाए जा सकते हैं। इन चार मानदंडों में चौथे पर सबसे पहले विचार करते हैं। 'ईमानदारी और मनोयोग से जनहित के लिए काम करते हैं।' ऐसे बहुत से लोग हैं, जो इस तर्क को खारिज कर सकते हैं। वे इसके लिए किसानों, लघु एवं मझोले उद्योगों, नोटबंदी के दौरान नौकरी गंवाने वालों, भीड़ की हिंसा के शिकार लोगों के परिवारों, मुस्लिम समुदाय और दलितों का उदाहरण देते हैं। 
 
दूसरे मानदंड 'यह मानते हैं कि अच्छा समाज स्वस्थ कारोबारी माहौल बनाएगा' के बारे में क्या कहेंगे? कारोबार से बहुत से लोग इस फैसले से सहमत हो सकते हैं, लेकिन नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को हड़बड़ी में लागू करने, आयात बिल बढऩे आदि के कारण बहुत से लोग इस फैसले से सहमत नहीं होंगे। तीसरा मानदंड है-'उद्यमों को तीन तथ्यों- संतुलित लाभ, लोगों और ग्रह को अपनी बातचीत के केंद्र में रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।' लेकिन मोदी के कंपनी समूहों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करने के साक्ष्य बहुत कम नजर आते हैं। असल में पूर्व सरकार ने कंपनी सामाजिक उत्तरदायित्व खर्च को लेकर अतार्किक फैसला देने के बावजूद इस मोर्चे पर बेहतर स्थिति में होगी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ही वरिष्ठ प्रबंधन से अपने वेतन-भत्तों में कटौती करने का आग्रह किया था, लेकिन इस बयान को लेकर उन्हें कारोबारी समुदाय से कोई प्रशंसा नहीं मिली। 
 
कोटलर की इस धारणा को लेकर भी सवाल उठाए जा सकते हैं कि मोदी ने वैश्विक मंच पर देश की छवि और पहचान सुधारी है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के ताजा आंकड़े विपरीत तस्वीर पेश करते हैं। क्या उनका इशारा विश्व योग दिवस की तरफ है या उनकी सरकार के शुरुआती वर्षों में जुटाए गए एनआरआई प्रशंसकों की तरफ है? इसमें जॉर्ज बुश के साथ डॉ. सिंह की बहुत सतर्कता से किए गए परमाणु समझौते की अनदेखी की गई है। सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में बड़ी भूमिका अदा की है। 
 
मोदी के प्रति निष्पक्ष रहें तो कोई भी अन्य भारतीय राजनेता कोटलर द्वारा सम्मान के लिए तय किए गए मानदंडों पर खरा नहीं उतर पाएगा। लेकिन ये मानदंड पहली बार लागू किए गए हैं, इसलिए आप यह जानने को उत्सुक होंगे कि दूसरा फिलिप कोटलर प्रेसिडेंशियल पुरस्कार कौन जीतेगा।
Keyword: Philip Kotler, marketing, politics, narendra modi,,
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