बिजनेस स्टैंडर्ड - विकास नीति और बजट के बीच का सामंजस्य
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विकास नीति और बजट के बीच का सामंजस्य

नितिन देसाई /  January 24, 2019

राजकोषीय नीति निर्माण में राजकोषीय विवेक, अनुपालन और उसे सहज बनाना चाहे जितना वांछित हो लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई 

 
एक फरवरी, 2019 को वित्त मंत्री इस सरकार का अंतिम बजट पेश करेंगे जो संभवत: अंतरिम बजट होगा क्योंकि यह चुनावी वर्ष है। नियमित बजट आम चुनाव के बाद प्रस्तुत किया जाएगा। अरुण जेटली इस अवसर का इस्तेमाल बीते पांच वर्ष में अपनी सरकार के राजकोषीय नीति प्रबंधन का रिपोर्ट कार्ड पेश करने में करेंगे। हाल की घोषणाओं में जहां चुनाव पूर्व प्रस्तुत किए जाने वाले बजट के रास्ते से विचलन नजर आया है, वहीं वह इस मौके का इस्तेमाल कुछ व्यय प्रस्तावों और चुनावी जीत दिलाने वाली नीतियों की घोषणा करने में भी किया जाएगा। 
 
राजकोषीय नीति का रिपोर्ट कार्ड मध्यावधि की राजकोषीय नीति को लेकर जारी किए गए दो नीतिगत वक्तव्यों में उल्लिखित वक्तव्यों पर केंद्रित होगा। उक्त नीति बजट का एक हिस्सा तैयार करता है। बीते कुछ वर्षों के दौरान इन वक्तव्यों की भाषा पर गौर करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि राजकोषीय नीति का प्राथमिक लक्ष्य जीडीपी की तुलना में राजकोषीय घाटे में कमी करना, कर/जीडीपी अनुपात में सुधार करना, कर ढांचे को सहज बनाना और अनुपालन बेहतर करना है। इस वर्ष के बजट में आंकड़ों का इस्तेमाल यह जताने के लिए किया जाएगा कि वित्त मंत्री के पिछले बजट इन लक्ष्यों को हासिल करने में किस हद तक कामयाब रहे। परंतु यह सवाल पूछा जाएगा कि क्या ये लक्ष्य पर्याप्त हैं?
 
कर/जीडीपी अनुपात व्यापक विकास नीति का अहम घटक है। परंतु इस अनुपात के बढऩे की गति को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही। सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और शहरी बुनियादी ढांचे पर होने वाला व्यय बढ़ेगा क्योंकि आर्थिक औद्योगीकरण और शहरीकरण तथा बढ़ती समृद्धि लोगों की आकांक्षाएं भी बढ़ा रहे हैं। सार्वजनिक व्यय के वांछित स्तर का मध्यम से दीर्घकालिक आकलन हमारी सार्वजनिक राजकोषीय नीति का अंग होना चाहिए। इस व्यय का दायित्व केंद्र, राज्य तथा स्थानीय प्रशासन पर होता है। 
 
सार्वजनिक व्यय की दीर्घकालिक दृष्टि से देखें तो भी अल्पावधि की राजकोषीय अनिवार्यताओं का सकारात्मक प्रयोग संभव है। वृहद आर्थिक कारणों से जरूरी राजकोषीय प्रोत्साहन दीर्घावधि की विकास नीति के लिए मददगार हो सकता है। मिसाल के तौर पर 2008 के वैश्विक संकट के बाद जब राजकोषीय प्रोत्साहन की आवश्यकता थी तब चीन ने व्यय में जीडीपी के 3 फीसदी के बराबर और दक्षिण कोरिया ने 5 फीसदी इजाफा किया ताकि कृत्रिम मेधा, स्मार्ट फोन, सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक कार और विंड टर्बाइन जैसे उद्योगों के शोध और विकास पर खर्च किया जा सके। इनकी बदौलत अब वे तकनीकी जगत में पश्चिम के दबदबे को चुनौती दे रहे हैं। वहीं हमने 2008 के वित्तीय प्रोत्साहन का प्रयोग कल्याण योजनाओं में इजाफा करने में किया।
 
विकास नीति आय की असमानता कम करने का प्रयास करती है। राजकोषीय नीति, प्रत्यक्ष कर दर ढांचे और बजट में सब्सिडी आदि के जरिये आय के वितरण को प्रभावित करती है। प्रत्यक्ष कर मामले में घोषित नीति कर दायरे को व्यापक बनाने और कर दर को हल्का बनाए रखते हुए रियायतों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की है। आयकर की 10-20-30 प्रतिशत की दर का ढांचा दो दशक से चल रहा है और उसने उदारीकरण के पहले के अपेक्षाकृत प्रगतिशील कर ढांचे को प्रतिस्थापित किया है। इस अवधि में गैर कृषि जीडीपी के प्रतिशत के रूप में व्यक्तिगत आयकर संग्रह 2003-04 के 2 फीसदी से बढ़कर 2013-14 में 3 फीसदी और 2013-14 में 3.5 फीसदी हो गया। 
 
नोटबंदी के कारण अनुपालन में किसी बड़े सुधार का संकेत नहीं निकलता है। अगर तमाम आय कर संग्रह गरीबों को हस्तांतरित करने के लिए उपलब्ध हो तब भी आय के पुनर्वितरण का असर सीमित होगा। करदाताओं को दी जाने वाली रियायत, लाभांश और पूंजीगत लाभ के साथ बरती जाने वाली उदारता और विरासती कर की अनुपस्थिति बताती है कि न तो यह और न ही इससे पिछले प्रशासन ने कर व्यवस्था का प्रयोग पुनर्वितरण के लिए किया। इसके लिए केवल मूल्य सब्सिडी और कल्याण योजनाओं का इस्तेमाल किया गया। 
 
नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) के सुदीप्त मंडल और शताद्रु सरकार  ने अनुमान लगाया है कि 2015-16 में जीडीपी के 6 फीसदी के बराबर सब्सिडी और जीडीपी के 4 से 5 फीसदी के बराबर कर रियायत ऐसी रहीं जिनका औचित्य साबित करना मुश्किल है। खाद्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, जलापूर्ति और सफाई पर दी जाने वाली सब्सिडी जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर रही। अब उत्पाद और सेवा विशेष की सब्सिडी के स्थान पर प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण की बात सुनने को मिल रही है और हमें इस बजट में इस दिशा में शुरुआत देखने को मिल सकती है। परंतु इससे आय के वितरण में तब तक कोई अंतर नहीं आएगा जब तक कि अवांछित सब्सिडी और प्रत्यक्ष कर रियायत में नाटकीय अंदाज में कमी नहीं आती और आय का पूरकीकरण जीडीपी के 2 फीसदी के ऊपर नहीं जाता। करों और सब्सिडी के सामाजिक और निजी लाभ और लागत को अलग-अलग करके देखना भी आवश्यक है। इसका एक उदाहरण संचारी रोगों का नि:शुल्क टीकाकरण भी है जिसे उचित ठहराया जा सकता है क्योंकि संक्रमण से होने वाले लाभ भविष्य में सामने आते हैं। 400 रुपये प्रति टन का कोयला उपकर भी इसका उदाहरण है जिसे कार्बन उत्सर्जन की सामाजिक लागत के रूप में उचित ठहराया जा सकता है। 
 
नकारात्मक बाह्यता निर्मित करने वाले कर और सब्सिडी प्रतिस्पर्धी उत्पादों के कराधान में अंतर पैदा करते हैं। एकल जीएसटी के प्रति प्रतिबद्धता के सामने ये नहीं ठहरेंगे। ऐसे में निजी और सामाजिक लागत और लाभ के अंतर के व्यवस्थित आकलन पर आधारित उपकर और सब्सिडी से बात बन सकती है। राजकोषीय विवेक, अनुपालन और सामान्यीकरण वांछित हैं लेकिन नीतिगत डिजाइन के केंद्र में नहीं हैं। राजकोषीय नीति और विकास की नीति के बीच का संबंध इस सिलसिले में खो सा गया है। हमें आय के वितरण, खपत और उत्पादन चयन पर राजकोषीय नीति के असर पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। ये वे कारक हैं जो पर्यावरण, संसाधनों के प्रयोग के स्थायित्व और स्वास्थ्य आदि कारकों को प्रभावित करते हैं।
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