बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन की मंदी
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चीन की मंदी

संपादकीय /  January 24, 2019

चीन में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वर्ष 2018 में घटकर 6.6 फीसदी पर आ गई। यह दर सन 1990 से अब तक की सबसे धीमी जीडीपी वृद्घि दर है। चीन के लिए यह बात काफी मायने रखती है। चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्घि दर सालाना आधार पर 6.4 फीसदी रही। इससे यह संकेत मिलता है कि अर्थव्यवस्था में  धीमापन आ रहा है। जीडीपी वृद्घि के आंकड़ों में सुधार भी सन 2017 की वृद्घि को संशोधित करके कम करने के बाद आया है। इसका अर्थ यह भी है कि आधार प्रभाव सकारात्मक रहा है। चाहे जो भी हो चीन की वृद्घि के आंकड़ों पर हमेशा सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में यह अपेक्षाकृत कमजोर आंकड़ा शीर्षक में जाहिर आंकड़ों से परे कहीं बड़ी कमियों को अपने पीछे छिपाए हुए हो सकता है। 

 
चीन की मंदी की प्रकृति चक्रीय नहीं बल्कि ढांचागत है। तीन दशक की जोरदार वृद्घि के दौरान चीन एक विशिष्टï निवेश और निर्यात आधारित मॉडल के सहारे आगे बढ़ रहा था। वित्तीय बचत और विदेशी निवेश का प्रयोग बड़ी पूंजी खपाऊ परियोजनाओं तथा निर्यातोन्मुखी विनिर्माण में किया गया। इससे रोजगार और आय में इजाफा हुआ और चीन दुनिया की फैक्टरी के रूप में सामने आया। उसका व्यापार अधिशेष दुनिया के अधिकांश देशों से अधिक था। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सरकार ने इस मॉडल पर और जोरशोर से काम करने की बात सोची। ऐसे में विभिन्न पूंजी आधारित क्षेत्रों को जमकर सस्ता ऋण मुहैया कराया गया। इस दौरान वृद्घि तो मजबूत बनी रही लेकिन पूंजी की उत्पादकता में काफी कमी आई। बीते वर्ष तीन चौथाई वृद्घि खपत से आई। इससे यह संकेत मिला कि अब खपत आधारित क्षेत्र अब विकास के वाहक बन चुके हैं। 
 
चीन इस ढांचागत समस्या से भलीभांति अवगत है और यही कारण है कि वहां काफी समय से चीन की अर्थव्यवस्था को नए सिरे से संतुलित करने की बात चल रही है। इस संतुलन को निर्यात से हटाकर नवाचार और खपत में निवेश बढ़ाकर हासिल किया जाना है। इसके पीछे एक ठोस दलील है: उच्च मध्य आय से उच्च आय के दायरे में जाने और मध्यम आय के जाल से बचने के लिए चीन को उत्पादकता बढ़ानी होगी जो मूल्यवर्धन शृंखला में ऊपर जाने और अपनी तमाम प्रक्रियाओं में नवाचार बढ़ाने से आएगी। पुनर्संतुलन की यह प्रक्रिया स्वाभाविक तौर पर बदलाव के दौर में वृद्घि को धीमा करेगी। बहरहाल, बदलाव का क्रियान्वयन उम्मीद से कहीं अधिक कठिन साबित हुआ है। मिसाल के तौर पर राजनीतिक चिंताओं ने हस्तक्षेप किया है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के लिए यह बात राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है कि वह वृद्घि दर ऊंची बनी रहे और आय बढ़ती रहे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश के लोगों के साथ पार्टी के जुड़ाव पर असर पड़ेगा। ऐसे में अर्थव्यवस्था के अनुत्पादक क्षेत्रों में ऋण की आवक को पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। इसके अलावा निजी क्षेत्र जिसकी इस पुनर्संतुलन में अहम भूमिका हो सकती थी, वह पार्टी की मौजूदा नीति से विरोधाभासी है। चीन ने शोध आदि को लेकर संसाधन झोंके हैं और इनका कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आया है। परंतु इन शोध के उत्पाद को अंतिम उत्पाद में बदलना काफी कठिन रहा है। 
 
चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन की बात की है जिस पर नजर रखनी होगी। अमेरिका के साथ कारोबारी तनाव कुछ मायनों में निर्यात की महत्ता कम करने में सहायक हो सकता है। भारत के लिए प्रश्न यह है कि यह ढांचागत मंदी वृद्घि को किस हद तक प्रभावित करेगी। एक ओर जहां इसमें भारत के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला में जगह बनाने का अवसर बना है, वहीं यह भी सच है कि बिना अहम घरेलू सुधारों के वह सपना भी अधूरा रह जाएगा।
Keyword: india, china, economy, GDP,,
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