बिजनेस स्टैंडर्ड - विधायिका के कार्यकाल में बदलाव का विचारणीय सवाल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, June 27, 2019 06:12 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

विधायिका के कार्यकाल में बदलाव का विचारणीय सवाल

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  January 22, 2019

देश में लोकसभा चुनाव की दस्तक अब जोर से सुनाई देने लगी है। ऐसे में देश में हुए और होने वाले चुनावों को लेकर मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। मसलन, मेरे मन में एक प्रश्न यह है कि पिछले 30 सालों में कौन सा ऐसा चुनाव रहा है, जिसके बारे में अनुमान लगाना सर्वाधिक मुश्किल रहा है? इस सवाल का जवाब जानने की लालसा मुझे एक ऐसे विचार के करीब लाई है, जो दो हिस्से में विभक्त है। पहली बात तो यह कि आप जैसे-जैसे एक आम चुनाव के नजदीक पहुंचते हैं, वैसे ही अगले चुनाव नतीजे का अनुमान लगाना आसान हो जाता है। उदाहरण के लिए वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए 2019 के चुनाव में 275 सीटों का अनुमान लगाना आसान था। दूसरा हिस्सा यह कहता है कि अगला आम चुनाव जैसे ही नजदीक आता है, वैसे ही नतीजों के बारे में कुछ कह पाना हवा में लाठी भांजने की तरह प्रतीत होता है। मिसाल के तौर पर क्या कोई यह बात पुख्ता तौर पर कह सकता है कि अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा कितनी सीटें जीतेगी या कितनी सीटों का इसे नुकसान होगा? 

 
दूसरे शब्दों में कहें तो लोगों की राजनीतिक पसंद और नापसंद के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है। इसमें भी कोई शक नहीं कि कुछ लोगों की राजनीतिक पसंद तय होती है और वे उसी हिसाब से चुनाव के संदर्भ में लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि मतदाताओं की संख्या एक समान नहीं रहती और इसमें बढ़ोतरी होती रहती है, इसलिए ऐसे मतदाताओं की संख्या भी बढ़ती है, जिनकी पसंद एक दल या नेता को लेकर स्थिर नहीं रहती है। विस्मित करने वाली बात यह है कि इस सीमा तक अस्थिरता किसी दूसरे क्षेत्र में बर्दाश्त नहीं की जाएगी और ना ही की जाती है। राजनीति में ऐसी अस्थिरता आराम से देखी जा सकती है। अगर अस्थिर राजनीतिक पसंद को एक समस्या के तौर पर देखें तो इसका प्रभाव कम करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? इसके लिए मेरे पास ऐसे दो सुझाव हैं, जो संविधान के दो प्रावधानों को देखते हुए मेरे मन में आए हैं। पहले प्रावधान में प्रधानमंत्री का कार्यकाल केवल एक बार ही सीमित नहीं किया गया है। दूसरे प्रावधान के तहत लोकसभा का कार्यकाल पांच वर्ष तक सीमित किया गया है, हां, आपातकाल एक अपवाद हो सकता है। पांच साल की समय सीमा तर्क से परे है और इसकानिर्धारणव्यावहारिक ढंग से नहीं हुआ है। कई देशों में यह अवधि इससे कम या ज्यादा होती है। कई देशों में सरकार के मुखिया का कार्यकाल भी निश्चित कर दिया गया है। उदाहरण के लिए अमेरिका में 1940 के मध्य तक कोई व्यक्ति कितनी बार भी राष्ट्रपति बनाया जा सकता था, लेकिन अब ऐसी बात नहीं है। 
 
दो समस्याएं
 
जब संविधान के इन दोनों प्रावधानों पर गौर करें तो प्रधानमंत्री के कार्यकाल की कोई सीमा तय नहीं होने और लोकसभा का कार्यकाल तय होने से राजनीति और सरकार/प्रशासन दोनों के लिए समस्याएं खड़ी होती हैं। राजनीतिक समस्या ज्यादातर उन दलों को पेश आती हैं, जिनमें वंशवाद का चलन नहीं है। भाजपा और माकपा दो बड़े विचारधारा आधारित दल हैं, जो इस श्रेणी में आते हैं। बड़े क्षेत्रीय दल जैसे अन्नाद्रमुक, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और तृणमूल कांग्रेस भी इसी श्रेणी में आते हैं। हमने देखा है कि इन दलों के संस्थापक या वास्तविक नेताओं के जाने के बाद इनके लिए जवाबदेही के साथ आगे बढऩा कितना मुश्किलों भरा रहा है। इस चलन का कोई अपवाद भी नहीं हैं, क्योंकि नए नेता लोगों में अपना समर्थन एकजुट बनाए रखने के लिए अतिवादी बन जाते हैं। इसके उलट वंशवाद आधारित दलों के लिए चीजें अलग हैं। इनके साथ लचर प्रशासन की समस्या जुड़ी होती है, क्योंकि इन दलोंनेता का प्रदर्शन कितना भी खराब क्यों ना हो पार्टी के अंदर कोई चुनौती देने वाला नहीं होता है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और राज्य स्तर पर सपा, द्रमुक और दूसरे कई अन्य दल इसी श्रेणी में आते हैं। क्या कोई व्यक्ति दूसरों को बता सकता है कि नवीन पटनायक के बाद बीजू जनता दल का क्या होगा?
 
क्या किया जा सकता है?
 
भारत के बारे में विभिन्न पक्षों पर विचार करने के बाद मेरा मानना है कि संविधान के इन दोनों प्रावधानों की समीक्षा होनी चाहिए। इनसे कुछ खास हासिल नहीं हुआ है। लिहाजा, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को एक कार्यकाल मिलना चाहिए और लोकसभा एवं विधानसभा का कार्यकाल छह या सात वर्षों का किया जाना चाहिए। 130 करोड़ लोगों के देश का शासन ऐसे कायदे-कानून से नहीं चलाया जा सकता, जिसका साक्षी इंगलैंड 17वीं शताब्दी में रहा था। लंबा कार्यकाल मिलने से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोबारा सत्ता में आने या नहीं आने की बात से ऊपर उठकर वे सभी चीजें आराम से कर सकते हैं, जो उनके उनकी समझ में आवश्यक हैं। वास्तव में सात साल का कार्यकाल मिलने से उन पर उनकी पार्टी के दबावों का भी असर नहीं होगा। 
 
मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों ही इसके पक्ष में आवाज उठा सकते हैं, क्योंकि दोनों को उनके दलों से भारी दबाव का सामना करना पड़ा है। इस वजह से उन्हें उनसे गलतियां होती गईं। कुछ ही लोग जानते हैं कि 1947 और 1955 के बीच पार्टी के दबाव के कारण जवाहर लाल नेहरू ने भी कई गलतियां कीं थीं। उनमें सबसे खराब आर्थिक नीतियां रहीं, जिनकी नींव 1955 में तमिलनाडु के आवडी में कांग्रेस के अधिवेशन में पड़ी थी। मौजूदा समय में लोकसभा/विधानसभाओं के लिए पांच साल के कार्यकाल का प्रावधान हैं। इनमें पहले चार साल तो सरकार अपनी तरफ से कुछ ना कुछ करने की कोशिश करती है, लेकिन पांचवां साल लोकलुभाव नीतियों और निष्क्रियता की भेंट चढ़ जाता है। इस तरह, प्रभावी कार्यकाल मात्र चार साल का होता है। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का कार्यकाल सीमित करने का एक फायदा यह होगा कि सरकार बीच में नहीं गिराई जा सकती। वैसे इस बारे में एक सीमा से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। 
Keyword: parliament, narendra modi, BJP, session, election,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या भारत को कॉर्पोरेट कर में करनी चाहिए कमी?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.