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धीमी वृद्धि का डर, मगर भारत बेहतर

अभिषेक वाघमारे /  01 22, 2019

कैसी है धारणा

भारत में निवेश पर बेहतर रिटर्न की उम्मीद करने वाले सीईओ हैं कम
8 फीसदी सीईओ के मुताबिक भारत उनके संगठन की वृद्धि के लिए अहम
लेकिन 15 फीसदी सीईओ यह नहीं जानते कि कहां निवेश करना ठीक है

बिजनेस स्टैंडर्ड धीमी वृद्धि का डर, मगर भारत बेहतर दुनिया के करीब 29 फीसदी मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) का मानना है कि 2018 के मुकाबले 2019 में वृद्धि की रफ्तार धीमी होगी। प्राइसवॉटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) के वैश्विक सीईओ के एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। इन सीईओ का मानना है कि 2012 के बाद सबसे धीमी वृद्धि होगी। वर्ष 2018 में 48 फीसदी सीईओ ने मंदी के आसार जताए थे। धीमी वृद्धि के आसार सभी क्षेत्रों में हैं लेकिन उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के सीईओ में सबसे ज्यादा निराशाजनक स्थिति है।

हालांकि करीब 42 फीसदी सीईओ का मानना है कि 2019 में वृद्धि में सुधार हो सकता है लेकिन यह 2018 के 57 फीसदी के मुकाबले काफी कम होगा। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) ने वर्ष 2011 से ही 4 फीसदी के आंकड़े को पार नहीं किया है। वर्ष 2008-09 की आर्थिक मंदी के बाद से ही मध्यम अवधि (तीन वर्ष) में वृद्धि का भरोसा स्तर सबसे निचले स्तर पर चला गया है। वैश्विक स्तर पर महज 36 फीसदी सीईओ ही अगले तीन सालों में अच्छी वृद्धि की संभावनाओं को लेकर ज्यादा आश्वस्त हैं जबकि 2009 में 34 फीसदी सीईओ को ऐसा भरोसा था। इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है क्योंकि भारत में निवेश पर बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद करने वाले सीईओ की तादाद कम है जबकि 2019 में कहां निवेश किया जाए इसको लेकर अनिश्चितता की स्थिति में रहने वाले सीईओ की तादाद ज्यादा है।

करीब 8 फीसदी सीईओ का मानना है कि भारत उनके संगठन की संपूर्ण वृद्धि के लिए अहम है जबकि 15 फीसदी सीईओ यह नहीं जानते कि कहां निवेश किया जाए। सर्वे की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बेहतर निवेश बाजार के तौर पर भारत अब जापान और ब्रिटेन से आगे निकल गया है। इसमें कहा गया है कि 'ज्यादातर निवेश बाजारों की सूची में भारत एक उभरता हुआ सितारा है।'

पीडब्ल्यूसी ने 90 से अधिक देशों में सितंबर-अक्टूबर 2018 के दौरान 1,378 वैश्विक सीईओ का सालाना सर्वे किया। इस सर्वे को दावोस में विश्व आर्थिक मंच में सोमवार को पेश किया गया। एशिया प्रशांत क्षेत्र में जहां भारत, चीन और जापान जैसे देश हैं वहां वृद्धि की राह में तीन सबसे बड़ा खतरा 'व्यापार युद्ध', 'प्रमुख कौशल की उपलब्धता' और 'संरक्षणवाद' है। उत्तरी अमेरिका के करीब 31 फीसदी सीईओ का मानना है कि शिक्षा और रोजगार के बीच में सीधी कड़ी तैयार करना अहम है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में महज 11 फीसदी सीईओ ही इस तरह सोचते हैं।

उत्तरी अमेरिका में 31 फीसदी सीईओ कौशल विकास और दोबारा प्रशिक्षण देने को अहमियत देते हैं जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 50 फीसदी सीईओ इसे तवज्जो देते हैं। वर्ष 2018 में नीतिगत अनिश्चितता को कोई गंभीर खतरा नहीं बताया गया लेकिन 35 फीसदी सीईओ का मानना है कि इससे 2019 में वृद्धि बुरी तरह प्रभावित होगी। 2019 के सर्वे में पहली बार 'व्यापार युद्ध' के असर के बारे में भी पूछा गया था और 31 फीसदी वैश्विक सीईओ को उम्मीद थी कि इससे आने वाले साल में वृद्धि दर कम होगी।

चीन की वृद्धि के लिए अमेरिकी बाजार की अहमियत 2019 में कम होगी क्योंकि चीन के21 फीसदी सीईओ का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया 2019 में उनकी वृद्धि के लिए अहम होगा जबकि 17 फीसदी सीईओ का मानना है कि अमेरिका उनके लिए अहम होगा। वर्ष 2017-18 में 58 फीसदी सीईओ ने चीन की वृद्धि में योगदान देने वाले देशों में अमेरिका को शीर्ष स्थान दिया।

भारत सबसे भरोसेमंद देशों में

भारत कारोबार, सरकार, एनजीओ और मीडिया के मामले में दुनिया के सबसे विश्वसनीय देशों में शामिल है लेकिन देश के कारोबारी ब्रांडों की विश्वसनीयता इनमें सबसे कम है। एडलमैन की ट्रस्ट बैरोमीटर-2019 रिपोर्ट दावोस में विश्व आर्थिक मंच के सालाना सम्मेलन के शुरू होने से पहले सोमवार को जारी की गई जिसमें यह जिक्र किया गया। इसमें वैश्विक विश्वसनीयता सूचकांक 3 अंक के हल्के सुधार के साथ 52 अंक पर पहुंच गया है। चीन जागरुक जनता और सामान्य आबादी के भरोसा सूचकांक में क्रमश: 79 और 88 अंकों के साथ शीर्ष पर रहा। भारत इन दोनों श्रेणियों में दूसरे और तीसरे स्थान पर रहा। यह सूचकांक एनजीओ, कारोबार, सरकार और मीडिया में भरोसे के औसत पर आधारित है।

महिलाएं बिना वेतन करतीं अरबों डॉलर का काम

दुनिया भर में घर और बच्चों की देखभाल करते हुए महिलाएं साल भर में कुल 10 हजार अरब डॉलर के बराबर ऐसा काम करती हैं जिसका उन्हें कोई भुगतान नहीं किया जाता। यह दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी ऐपल के सालाना कारोबार का 43 गुना है। ऑक्सफैम ने सोमवार को जारी अपनी एक रिपोर्ट में यह बात कही। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महिलाएं घर और बच्चों की देखभाल जैसे बिना वेतन वाले जो काम करती है, उसका मूल्य देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.1 फीसदी के बराबर है। इस तरह के कामों में शहरी महिलाएं प्रतिदिन 312 मिनट और ग्रामीण महिलाएं 291 मिनट लगाती हैं। इसकी तुलना में शहरी क्षेत्र के पुरुष बिना भुगतान वाले कामों में सिर्फ 29 मिनट ही लगाते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले पुरुष 32 मिनट खर्च करते हैं

अमीरों की खूब बढ़ी संपत्ति, बाकी की कम

भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 2018 में प्रतिदिन 2,200 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। इस दौरान, देश के शीर्ष एक फीसदी अमीरों की संपत्ति में 39 फीसदी की वृद्धि हुई जबकि 50 फीसदी गरीब आबादी की संपत्ति में महज तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ऑक्सफैम ने अपने अध्ययन में यह बात कही। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के शीर्ष 9 अमीरों की संपत्ति 50 प्रतिशत गरीब आबादी की संपत्ति के बराबर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के अरबपतियों की संपत्ति में पिछले साल प्रतिदिन 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं दुनिया के गरीब लोगों की 50 फीसदी आबादी की संपत्ति में 11 फीसदी की गिरावट देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में रहने वाले 13.6 करोड़ लोग वर्ष 2004 से कर्जदार बने हुए हैं। यह देश की सबसे गरीब 10 फीसदी आबादी है। भाषा

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