बिजनेस स्टैंडर्ड - जनसंख्या, जीडीपी और गरीबी का अंतर्संबंध
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, April 18, 2019 08:16 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

जनसंख्या, जीडीपी और गरीबी का अंतर्संबंध

पार्थसारथि शोम /  January 21, 2019

विकास और गरीबी के बीच के रिश्ते को समझने के लिए जनसंख्या नीति की अहमियत पर गौर करना तात्कालिक महत्त्व का मुद्दा है। बता रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
जनसंख्या, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और गरीबी को जोडऩे वाला मार्ग दो दिशाओं में जा सकता है। समाज वैज्ञानिकों की व्यापक स्वीकृति वाली पहली दिशा यह है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी आंकड़ा बढऩे के साथ गरीबी की दर घटती है और उससे जनसंख्या वृद्धि दर भी कम होती जाती है। हालांकि इसकी उलटी दिशा के पक्ष में अधिक तर्क दिए जाते रहे हैं: जनसंख्या वृद्धि दर पर काबू पाते ही प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि बढऩी चाहिए लेकिन इससे क्या गरीबी दर भी कम होती है? माल्थस ने यही परिकल्पना की थी कि उच्च जनसंख्या वृद्धि दर से गरीबी, अकाल एवं महामारी उपजेगी। वास्तविकता यह है कि जनसंख्या वृद्धि, जीडीपी वृद्धि और गरीबी दोनों दिशाओं में ही जुड़े हुए हैं और दोनों ही एक-दूसरे को बाध्य करती हैं। 
 
भारत के लिए करीब आधी सदी से यह समस्या काफी अहम बनी हुई है। 1970 के दशक में जबरन जनसंख्या नियंत्रण नीति नाकाम होने के बाद भारत की कोई जनसंख्या नीति ही नहीं रही है। 1970 के दशक में 'निरोध' के साहसिक विज्ञापन और दो-तीन बच्चों की वकालत करने वाले नारे चर्चा में होते थे। सही दिशा में उठाए गए ये कदम भी जबरन नसबंदी किए जाने से राह से भटक गए। इसका नतीजा यह हुआ कि सियासी दलों ने जनसंख्या के मुद्दे को छूने से परहेज किया और इस आबादी को अपने वोटबैंक में ही तब्दील कर दिया। देश भर के आंकड़ों से इसके नतीजे देखे भी जा सकते हैं। हम जनसंख्या वृद्धि और प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि के बीच के संबंध की दिशा और गरीबी से इसके ताल्लुक की व्याख्या करेंगे।
 
करीब दो दशक बाद हाल में दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों की यात्रा के दौरान वहां अर्थव्यवस्थाओं की जबरदस्त वृद्धि, जीवन का स्तर एवं गुणवत्ता और सैकड़ों की संख्या में चीनी मेहमानों के झुंड देखने के बाद मुझे यही अहसास हुआ कि जनसंख्या, राष्ट्रीय आय एवं गरीबी के अंतर्संबंध की प्रकृति बहाल करने की जरूरत है। ब्राजील, चीन और भारत की तुलना से एक रोचक आकलन उभरता है। शुरुआत करते हैं पहली तालिका से। यह तालिका 1950 से लेकर वर्ष 2100 तक कुल जनसंख्या की अनुमानित तस्वीर दिखाती है। यह देखा जा सकता है कि 2020 के दशक में भारत की कुल आबादी चीन से आगे निकल जाएगी और इस सदी के अंत तक ऐसी ही स्थिति रहेगी। दूसरी तालिका इस परिघटना के पीछे की वजह दिखाती है। 1960 के दशक में चीन की जनसंख्या वृद्धि दर भारत से अधिक हुआ करती थी लेकिन उसने कड़ाई बरतते हुए इस पर काबू पाने की कोशिश शुरू की। इसका असर यह हुआ कि 1970 के दशक की शुरुआत से ही चीन की जनसंख्या वृद्धि दर भारत से कम हो गई और उसके बाद से यही स्थिति बनी हुई है। इस दौरान भारत की जनसंख्या वृद्धि भले ही अनवरत ह्रासोन्मुख रही लेकिन चीन की जनसंख्या वृद्धि दर बड़ी गिरावट के साथ भारत के नीचे आ गई और फासला बढ़ता गया। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में चीन की जनसंख्या वृद्धि दर एक बार फिर रफ्तार पकड़ रही है लेकिन अब भी वह भारत से कम ही है।
 
जनसंख्या वृद्धि के साथ आय वृद्धि का संबंध रेखांकित करने वाली तीसरी तालिका 1968-69 से लेकर 2016-17 तक देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि दर के बारे में बताती है। चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि भारत से आगे ही रही है लेकिन अंतिम दो वर्षों में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है। यह चीन में आधी सदी तक सख्त जनसंख्या नियंत्रण नीति में दी गई कुछ रियायत का असर दर्शाता है। कुल मिलाकर जनसंख्या वृद्धि और प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि के बीच नजदीकी संबंध का पता चलता है। मसलन, भारत की जीडीपी वृद्धि में स्थायी रूप से बढ़ोतरी हुई है और 2000 के दशक से यह दर धीमी दर से कम हो रही जनसंख्या वृद्धि दर से आगे निकल चुकी है।
 
प्रति महिला जन्म लेने वाले जीवित बच्चों की औसत संख्या यानी प्रजनन दर का विभेद अलग जनसंख्या रुझान को दिखाता है। चौथी तालिका बताती है कि 2020 तक भारत की प्रजनन दर में गिरावट ब्राजील के समान होगी लेकिन भारत का आधार प्रजनन स्तर काफी ऊंचा रहा है जो भारत में उच्च जनसंख्या वृद्धि को दर्शाता है। चीन ने अपनी प्रजनन दर भारत और ब्राजील दोनों से ही कम स्तर पर बनाए रखा। आगे चलकर इन तीनों ही देशों की प्रजनन दर वैश्विक औसत से काफी कम हो जाएगी। फिर भी, भारत की आधार जनसंख्या अधिक होने से इसकी आबादी 2060 के दशक में करीब 1.6 अरब पहुंच जाएगी। इसी में भारत की बुनियादी चुनौती छिपी हुई है। इतनी बड़ी आबादी के बीच आय वितरण और गरीबी नियंत्रण कर पाना जनांकिकी लाभांश के लिए चुनौती होगी। 
Keyword: GDP, fiscal deficit, population,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या जेट के बंद होने से हवाई किराये में होगा तेज इजाफा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.