बिजनेस स्टैंडर्ड - नीतियों में अनपेक्षित बदलाव
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नीतियों में अनपेक्षित बदलाव

संपादकीय /  January 21, 2019

अर्थव्यवस्था का सूक्ष्म प्रबंधन कभी-कभी प्रतिकूल परिणाम लेकर आता है। उस हालत में यह बात खासकर सही साबित होती है जब नीति में निरंतरता का अभाव होता है। दुख की बात है कि भारत भी इससे अछूता नहीं है। उदाहरण के लिए आम तौर पर आयात की जाने वाली इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं, खासकर मोबाइल फोन, के स्थानीय स्तर पर विनिर्माण के लिए हुए प्रयासों पर गौर करें। इसके लिए सरकार ने चरणबद्ध विनिर्माण कार्यक्रम (पीएमपी) शुरू किया जिसके तहत वित्त वर्ष 2019 -20 में मोबाइल फोन के कल-पुर्जों के स्थानीय स्तर पर विनिर्माण करने पर कंपनियों पर दबाव डाला गया था। हालांकि इसी महीने एक आदेश जारी कर इसमें बदलाव किया गया है। आदेश में कहा गया है कि मोबाइल फोन कंपनियों को इस साल फरवरी तक इसका अनुपालन करना चाहिए और ऐसा नहीं करने पर आयात पर कम से कम 10 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। इसका नतीजा यह हुआ कि सैमसंग जैसी जिन कंपनियों ने शुरू में पीएमपी का अनुपालन करने का मन बनाया था, वे अब नीति में बदलाव के बाद भारत में विनिर्माण कम करने पर विचार कर रही हैं। 

 
बीच में नीति में बदलाव अनुचित ही नहीं है बल्कि इससे दीर्घ अवधि में निवेश भी प्रभावित होता है। नीति स्पष्ट नहीं होने और सरकार के ऐसे कदमों के खिलाफ अपील की गुंजाइश नहीं होने से भारत को निवेश के लिहाज से एक जोखिम भरा बाजार समझा जाता है। नीति में आए इस अनपेक्षित बदलाव के बाद शायद सैमसंग उन सभी निवेश पर रुख ढीला कर सकती है, जो अब तक उसने किए हैं। दूसरी कंपनियां भी इस अनुभव से सीखेंगी और भारत सरकार पर भरोसा करने से हिचकेंगी। उन्हें हमेशा यह चिंता सताएगी कि निवेश करने के बाद नीतियों में अचानक बदलाव से उनकी मेहनत और रकम दोनों पर  खतरा मंडरा सकता है। 
 
मोबाइल फोन विनिर्माण ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र नहीं है, जो बीच में ही नीति में अचानक बदलाव का शिकार हुआ है। ई-वाणिज्य क्षेत्र में पहले से अनावश्यक और परेशान करने वाले सरकारी नियमन की तलवार लटकती रहती है। हाल में ही सरकार ने इसे और कड़ा कर दिया। इस महीने सरकार ने कहा कि ऑनलाइन माध्यम से कारोबार करने वाली कंपनियां जैसे एमेजॉन, जिसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिये रकम लगाई जाती है, खरीदार और बिकवाल को जोडऩे के अलावा दूसरी भूमिका नहीं निभा सकती। खासकर वे भंडार प्रबंधन में मदद नहीं कर सकती हैं। 
 
विदेशी निवेश को केवल मार्केट प्लेस तक सीमित रखना आवश्यकता से अधिक कठोर निर्णय था। यह उपभोक्ता और आपूर्तिकर्ता दोनों के लिए फायदे पर चोट पहुंचाने वाला था। अब सरकार ने बीच में ही नियम और कड़े कर दिए हैं। सरकार ने विशेष कारोबारी सौदा करने से भी ऑनलाइन कंपनियों को रोक दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो एमेजॉन इंडिया कोई खास स्मार्टफोन बेचने के लिए समझौता नहीं कर सकती है। यहां एक बार फिर सरकार ने नियमों में बदलाव करने से पहले मोटा निवेश आने का इंतजार किया। दरअसल सरकार ने पूंजी पर प्रतिफल में बदलाव किए और निवेशकों को ठगा महसूस कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उदाहरण के लिए वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट में अरबों रुपये निवेश किए हैं। नीति में बदलाव किए जाने की सरकार की घोषणा के कुछ दिन बाद ही रिलायंस रिटेल और जियो ने कह डाला कि वे ई-वाणिज्य उद्यम शुरू करेंगी। इससे स्वाभाविक तौर पर सरकार पर भेदभाव करने का आरोप लगने की गुंजाइश प्रबल हो जाती है। पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने जैसे आरोपों से बचने के लिए सरकार को अपरिपक्व प्रयासों पर पुनर्विचार करना चाहिए और नियमों में अनुचित बदलाव नहीं करने चाहिए। 
Keyword: india, economy, MAP, PMP, mobile,,
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