बिजनेस स्टैंडर्ड - उम्मीद के मुताबिक नहीं रही वृद्धि दर
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उम्मीद के मुताबिक नहीं रही वृद्धि दर

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली 01 21, 2019

वृद्धि दर की डगर

बिजनेस स्टैंडर्ड उम्मीद के मुताबिक नहीं रही वृद्धि दरनरेंद्र मोदी सरकार ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार द्वारा छोड़ी गई वृद्धि दर में सुधार का आधिकारिक अनुमान लगाया है। हालांकि इसमें बहुत ज्यादा वृद्धि की संभावना थी। पूर्ववर्ती सरकार के काल में 2013-14 में वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत थी, जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने कामकाज संभाला। संप्रग सरकार के अंतिम वित्तीय वर्ष में 2012-13 की 5.5 प्रतिशत वृद्धि की तुलना में सुधार हुआ था। इन दो वर्षों की आलोचना संप्रग काल के नीतिगत अपंगता के साल के रूप में की गई थी। 

अग्रिम अनुमान से पता चलता है मोदी सरकार के कार्यकाल के अंतिम साल 2018-19 में वृद्धि दर सकल घरेलू उत्पाद के 7.2 प्रतिशत पर रहने वाली है। निश्चित रूप से वृद्धि दर में सुधार हुआ है। 2015-16 में वृद्धि दर 8.1 प्रतिशत पर पहुंच गई थी और उसके बाद इसमें और तेजी आने की संभावना थी, जैसा कि वित्त वर्ष 19 के लिए आधिकारिक अनुमान लगाया गया था।  संप्रग और राजग के 5 साल के कार्यकाल की आर्थिक वृद्धि दरों की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि इस समय कॉम्पलेक्स बैक सिरीज के आंकड़े हैं। 

2015-16 और 2018-19 में वृद्धि की रफ्तार सुस्त रहने की वजह पूरी तरह से बजट में नहीं खोजी जा सकती बल्कि बाहर भी देखना होगा। दरअसल इसे नीचे खींचने की दो अहम वजहें ह नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) हैं। कमोबेश बजट के प्रावधानों ने आर्थिक विस्तार पर असर डाला, लेकिन ये दो कारक सबसे ऊपर रहे।  जैसा कि चार्ट से पता चलता है कि 2017-18 में वृद्धि दर सुस्त रही है, जिसकी प्रमुख वजह नोटबंदी के शुरुआती झटके और जीएसटी की जटिलताएं रहीं। बहरहाल सरकार के पूंजीगत व्यय, जिसका इस्तेमाल संपत्तियोंं के सृजन पर किया गया, इसने 2017-18 में असर डाला। व्यय अहम था क्योंकि बैंक के खराब कर्ज, ओवरलिवरेज्ड कॉर्पोरेट कर्ज आदि जैसे वजहों से निजी क्षेत्र से निवेश सुस्त रहा। इस साल सकल नियत पूंजी सृजन की वृद्धि भी गिरकर 7.6 प्रतिशत पर आ गई, जो इसके पहले साल मेंं 10.1 प्रतिशत थी। 

बहरहाल इस दौरान राज्यों ने कुल मिलाकर बहुत ज्यादा पूंजीगत व्यय किया, जो केंद्र सरकार के व्यय की तुलना में करीब दोगुना था।  केंद्र सरकार द्वारा पूंजीगत व्यय में कटौती को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि वह राजस्व व्यय में कटौती करने मेंं सक्षम नहीं थी। 2017-18 में इसमेंं 15 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई, जिसमें इसके पहले साल 9.9 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई थी। हालांकि राजकोषीय घाटे के मामले में राजस्व व्यय मेंं कटौती करना ज्यादा गुणवत्तायुक्त माना जाता है, लेकिन ज्यादा राजस्व व्यय से खपत में बढ़ोतरी को बढ़ावा मिलता है, जो अर्थव्यवस्था की प्रमुख मांग होती है। 

इसके बावजूद अर्थव्यवस्था में निजी अंतिम खपत व्यय में वृद्धि वित्त वर्ष 18 में घटकर 6.6 प्रतिशत हो गई, जो इसके पहले साल 7.3 प्रतिशत थी।  पीडब्ल्यूसी इंडिया में पब्लिक फाइनैंस और इकोनॉमिक्स के लीडर रानेन बनर्जी ने कहा कि केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय और राजस्व व्यय आर्थिक वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। पूंजीगत व्यय का रोजगार सृजन पर बहुत ज्यादा असर होता है, और इससे खपत में बढ़ोतरी होती है। उन्होंने कहा कि इसमें कुछ गिरावट आई है।  ईवाई इंडिया में मुख्य नीति सलाहकार डीके श्रीवास्तव ने कहा कि राजस्व व्यय आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन यह कम अवधि के लिए होता है। मुख्य रूप से पूंजीगत व्यय का असर पड़चा है, जो भारत में अभी कम बना हुआ है और ऐसा मोदी के कार्यकाल में हुआ है। 

वित्त वर्ष 18 में भी पूंजीगत व्यय में कटौती की संभावना है क्योंकि  जीएसटी संग्रह एक महीने तक इसके संग्रह के तरीके की वजह से मूर्त रूप नहीं ले सका। उस साल जीएसटी 9 महीने के लिए लागू हुआ, लेकिन संग्रह सिर्फ 8 महीने का हो पाया।  वित्त वर्ष 18 में जीएसटी संग्रह की तुलना पिछले वर्ष से नहींं की जा सकती क्योंकि उस समय जीएसटी नहीं थी। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा एकत्र किए गए कुल कर की तुलना की जा सकती है. इसमें 30,776 करोड़ रुपये की कमी आई और राज्यों को बंटवारे के पहले यह 9,01,666 करोड़ रुपये रहा। इसका आरोप सिर्फ जीएसटी पर नहीं मढ़ा जा सकता है, क्योंकि कॉर्पोरेशन कर भी लक्ष्य से 32.310 करोड़ रुपये रहा। 

इस साल जीएसटी संग्रह सरकार के अनुमान से कम रहने की संभावना है। एक अनुमान के मुताबिक केंद्र के खाते में सिर्फ 58,000 करोड़ रुपये आएंगे, जिसकी वजह से सरकार को व्यय में कटौती के लिए संघर्ष करना होगा। इसके अलावा गैर कर राजस्व 52,783 करोड़ रुपये कम हुआ है।  श्रीवास्तव ने कहा कि इस स्थिति में सामान्यतया पूंजीगत व्यय पर ही कुल्हाड़ी चलती है। 
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