बिजनेस स्टैंडर्ड - कर वंचना के मामलों में अनावश्यक अतिरंजना
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कर वंचना के मामलों में अनावश्यक अतिरंजना

कराधान
सुकुमार मुखोपाध्याय /  January 20, 2019

एक जमाने में मैं भी इस व्यवस्था का हिस्सा रह चुका हूं इसलिए मुझे अच्छी तरह पता है कि विभागीय अधिकारी कर वंचना के मामलों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करते हैं। दरअसल उनको ऐसे मामलों को बढ़ाकर प्रस्तुत करने का फायदा मिलता है। ऐसे चुनिंदा मामले ही सफल हो पाते हैं। फिलहाल मैं केवल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बारे में लिख रहा हूं और जिस हालिया घटना ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए उकसाया है वह है समाचार पत्रों में हाल ही में सामने आई चंद रिपोर्ट जिनमें कहा गया है कि कई स्थानों पर कर वंचना के मामले पकड़े गए हैं। 

 
हाल ही में सेवानिवृत्त हुए एक वित्त सचिव ने 10 दिसंबर, 2018 को टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक आलेख में लिखा था कि एक लाख करोड़ रुपये के राजस्व संग्रह के लिए 4 लाख करोड़ रुपये मूल्य के इनपुट क्रेडिट का निपटान किया जाता है। अगर इनपुट क्रेडिट की 10 फीसदी की लीकेज को रोक दिया जाए तो संग्रह एक लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 1.4 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। 40 फीसदी कर वंचना का यह गणित दिलचस्प लेकिन खतरनाक अतिरंजना है। इनपुट क्रेडिट का समायोजन कभी 80 फीसदी नहीं होता बल्कि यह अधिकतम 50 प्रतिशत है। एशिया पैसिफिक टैक्स बुलेटिन  5 (1996) के पृष्ठ क्रमांक 143 के मुताबिक सन 1986 में यह प्रतिशत 11.72 फीसदी था जबकि 1995 में यह 36.66 फीसदी हो गया। ऐसे में यह वक्तव्य कि अगर इनपुट क्रेडिट के दुरुपयोग को रोक दिया जाए तो राजस्व में 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो जाएगी, सीधे तौर पर बढ़ाचढ़ाकर किया गया है। 
 
वित्त राज्य मंत्री द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत जानकारी (19 दिसंबर, 2018 को द हिंदू में प्रकाशित खबर) के अनुसार अप्रैल से नवंबर 2018 के बीच 12,766 करोड़ रुपये के करवंचना के 3,196 मामले दर्ज किए गए। हमें यह समझना होगा कि ये मामले दरअसल हैं क्या। इनमें से अधिकांश मामले रिटर्न दाखिल करने में हुई गलतियों, रिटर्न न दाखिल करने आदि के कारण घटित हुए हैं। जीएसटी के नएपन और करदाताओं के रिटर्न फॉर्म के अभ्यस्त न होने के कारण ये दिक्कत पैदा हो रही थी। सूचना प्रौद्योगिकी आधारित मसलों के कारण इनपुट टैक्स क्रेडिट में कंप्यूटर आधारित अंतर आया। ऐसे में क्रेडिट का आकलन पहले स्वआकलन के आधार पर करने की इजाजत दी गई है। हालांकि बाहरी आपूर्ति के मामलों में जीएसटीआर1 फार्म में इनवॉइस आधारित ब्योरे भरना जरूरी होता है। सिस्टम आधारित मिलान का क्रियान्वयन अभी होना बाकी है। ऐसे में अब पुरानी व्यवस्था का अनुसरण किया जा रहा है। जैसा कि हम जानते हैं रिटर्न की व्यवस्था को नए सिरे से डिजाइन किया जा रहा है। मैंने कुछ वर्ष पहले यूरोप में ब्रिटेन और नीदरलैंड की यात्रा की थी। इसके अलावा मैंने कनाडा की यात्रा की तो देखा कि वहां इनवॉइस मिलान की प्रक्रिया ऐसी नहीं है जैसी हमारे यहां। जिन्होंने इसे छोडऩे की कोशिश की उन्होंने खुफिया जानकारी आधारित धरपकड़ की प्रक्रिया अपनाई। इनपुट और आउटपुट के आंकड़ों का व्यवस्थित विश्लेषण पुराना और आजमाया हुआ तरीका है। इसकी सहायता से आसानी से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी उद्योग में किस हद तक कर वंचना हो सकती है। ऐसे कई उद्योग हैं जिनमें इनपुट-आउटपुट का संबंध तयशुदा है। मोटर वाहन, वातानुकूलक, रेफ्रिजरेटर आदि ऐसे ही उद्योग हैं। ऐसे कई उत्पादन क्षेत्र हैं जिनका आसानी से प्रमाणन हो सकता है और जहां कर वंचना की कोई गुंजाइश नहीं है।
 
तत्कालीन राज्यमंत्री ने 5 सितंबर, 2012 को लोकसभा को बताया था कि वर्ष 2008 के बाद से करीब 18 प्रतिशत मामले पंचाट में सफल साबित होते हैं, करीब 30 फीसदी को उच्च न्यायालय में कामयाबी मिलती है और 9 प्रतिशत मामले सर्वोच्च न्यायालय में कामयाब होते हैं। परंतु लगता नहीं कि इससे कोई बड़ा अंतर आएगा। यह बात सबको पता है कि पंजीकृत करदाताओं में से 3.67 फीसदी (एक लाख से भी कम) करीब 79.52 प्रतिशत कर चुकाते हैं। गहन अंकेक्षण से इनकी पहचान करना आसान है। एक अन्य तथ्य जो प्रासंगिक है, वह यह कि करीब 20 फीसदी कर सरकारी उपक्रमों द्वारा चुकाया जाता है। कई बड़ी और प्रतिष्ठित निजी कंपनियां मसलन टाटा, आदित्य बिड़ला, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, हिंदुस्तान यूनिलीवर, सुंदरम क्लेटन, इन्फोसिस और विप्रो आदि ने कभी इनवॉइस में छेड़छाड़ नहीं की। मुझे यह बात इसलिए पता है क्योंकि मैं लंबे समय तक विभाग में रहा हूं। ऐसे में कहा जा सकता है कि कर वंचना वास्तव में उससे काफी कम है जितना कि उसके होने का शोर मचाया जाता है। कर वंचना के आंकड़ों को इतना बढ़ाचढ़ाकर पेश करना इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करता है। अगर यह मान लिया जाए कि इतनी अधिक कर वंचना होती है, जबकि वह सच नहीं है तो विभाग इनवॉइस के मिलान पर अनावश्यक जोर देने लगता है। यह अव्यावहारिक और अनावश्यक कदम है। इससे जीएसटी की किफायत पर बुरा असर पड़ता है।
 
निष्कर्ष: कर वंचना को बहुत बढ़ाचढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। यह जोखिम भरा है क्योंकि यह नीतियों पर गलत असर डालता है। अनावश्यक रूप से कड़े उपाय अपनाए जाते हैं। इसके लिए समझदारी से जांच और बेहतर अंकेक्षण पर्याप्त है। मेरा सुझाव है कि नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी को यह परियोजना दी जाए ताकि वह सही मायनों में पता लगा सके कि कितनी कर वंचना होती है।
 
(लेखक केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के सेवानिवृत्त सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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