बिजनेस स्टैंडर्ड - बिना किसी दूल्हे के शिवजी की बारात
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बिना किसी दूल्हे के शिवजी की बारात

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 20, 2019

मैंने द इंडियन एक्सप्रेस में अपनी दो पारियों के दौरान 25 वर्ष से अधिक समय तक काम किया। उस संस्थान का एक मशहूर किस्सा आज आपसे साझा कर रहा हूं। एक प्रतिष्ठित साथी ने स्वर्गीय रामनाथ गोयनका से पूछा कि वह अपने संपादक के अनुबंध का विस्तार क्यों नहीं कर रहे हैं? उस साथी ने कहा, 'वह संत व्यक्ति हैं। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि आप उन्हें आगे काम पर जारी नहीं रखना चाहते।' गोयनका ने जवाब दिया, 'भाई, मैं मानता हूं कि वे संत जॉर्ज वर्गीज हैं। परंतु मेरा इंडियन एक्सप्रेस भी शिवजी की बारात है, वह किसी संत से नहीं संभलने वाला।'

 
शिवजी की बारात सदियों पुराना रूपक है जिसका इस्तेमाल तमाम भूत-प्रेतों, औघड़-डायनों के जमावड़े के लिए किया जाता है जो अपने पसंदीदा नशे का सेवन करके मस्त हों। आप ही बताइए क्या आज भाजपा विरोधी विपक्षी दल ऐसे ही नहीं नजर आ रहे? इसके बावजूद अगर शिवजी की बारात कायदे और काबू में रही तो उसकी वजह थी भावी दूल्हे यानी भगवान शिव का कद और उनकी नेतृत्व क्षमता। इस आधुनिक संस्करण में हर बाराती भावी दूल्हा है। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी और उनके रणनीतिकार हालिया राज्य चुनावों में हार के बावजूद मुस्करा रहे हैं। 
 
आइए गिनती करते हैं। इनमें सबसे पहले कांग्रेस है, जिसका नेतृत्व नए-नए शिवभक्त बने राहुल गांधी के पास है। उसके बाद शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा), एम के स्टालिन की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक), लालू प्रसाद का राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और एचडी देवेगौड़ा का जनता दल सेक्युलर हैं। अगर राजग को पहला मोर्चा मान लें तो इसे दूसरा मोर्चा कह सकते हैं। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा अलग गठबंधन में लड़ रही हैं। लोकसभा चुनाव में वे भाजपा और कांग्रेस दोनों पर हमले करेंगी। सुविधा के लिए हम इन्हें तीसरा मोर्चा कह सकते हैं। अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी अपनी ताकत दिखाई है। इस जुटान में कांग्रेस, सपा, बसपा तथा द्रमुक के अलावा चंद्रबाबू नायडू की तेदेपा और अरविंद केजरीवाल की आप समेत कई क्षेत्रीय नेता शामिल हैं। इसे चौथा मोर्चा माना जा सकता है।
 
इसके बाद नवीन पटनायक की बीजद, के चंद्रशेखर राव की टीआरएस और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी हैं, जो इन तमाम गुटों से बाहर हैं और अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में हैं। अंत में नंबर आता है वाम दलों का जिन्हें कोई नहीं चाहता। आज देश में भाजपा विरोधी दलों की यही स्थिति है। मानो, शिवजी की बारात, वह भी बिना दूल्हे के। ममता बनर्जी के मंच पर कांग्रेस और आप दोनों थे जबकि दिल्ली और पंजाब में उनमें जबरदस्त आपसी लड़ाई है। तेदेपा ने अब तक कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया है क्योंकि तेलंगाना में पराजय के बाद मत स्थानांतरण को लेकर अनिश्चितता है। सपा और बसपा उत्तर प्रदेश में एक बार फिर कांग्रेस को शर्मिंदा करेंगी। पटनायक ने हमेशा की तरह अपने विकल्प खुले रखे हैं। क्षेत्रीय दलों में वही सबसे कमजोर वैचारिक रुझान वाले हैं। वह ऐसा कर सकते हैं क्योंकि उनकी मुस्लिम मतों पर निर्भरता नहीं है।
 
केसीआर खुद को प्रधानमंत्री पद का सबसे काबिल दावेदार मानते हैं। केरल में कांग्रेस और वाम के बीच प्रतिद्वंद्विता है। इन सभी दलों को केवल भाजपा विरोध ही एकजुट करता है। उनके बीच वैचारिक सामंजस्य नहीं है। कांग्रेस के अलावा इनमें से किसी दल के पास अपने दम पर 50 सीट जीतने का माद्दा भी नहीं है। वे ज्यादा से ज्यादा यही आशा कर सकते हैं कि भाजपा 170 से कम सीटें जीते और कांग्रेस 100 के करीब। इसके बाद वे एक गठजोड़ बनाकर कांग्रेस से बाहरी समर्थन हासिल करेंगे। पिछली बार हमने ऐसा तब देखा था जब संयुक्त मोर्चे में देवेगौड़ा की सरकार बनी थी। अगर ऐसे चुनाव हुए तो इनमें से हर नेता अपने प्रधानमंत्री बनने की संभावना तलाशेगा, भले ही चंद रोज के लिए ही सही। आखिरकार भूतपूर्व प्रधानमंत्री होना हर लिहाज से भूतपूर्व मुख्यमंत्री कहलाने से बेहतर होगा। सन 1996 में दिवंगत कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत देवेगौड़ा को लाए थे, आज ऐसे संभावितों की पूरी फेहरिस्त तैयार है।
 
ऐसा लगता नहीं कि 2019 में देश वही दोहराएगा जो उसने 1996 में किया था। भाजपा नेताओं के चेहरे पर जो मुस्कान है, उसके पीछे यही भरोसा है। मोदी और उनके नीतिकार मानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव, हाल के विधानसभा चुनाव परिणामों या उपचुनाव नतीजों से एकदम अलग होंगे। विपक्ष में एकता का अभाव है, वहां महत्त्वाकांक्षाओं का टकराव है, व्यक्तिगत अहम है और सामने केवल मोदी हैं। इन बातों ने भाजपा में यह भरोसा पैदा किया है कि यह चुनाव सन 1971 के इंदिरा बनाम अन्य की तरह होने वाला है। उस वक्त सभी का मानना था कि इंदिरा हार जाएंगी लेकिन इंदिरा हटाओ के खिलाफ गरीबी हटाओ के नारे  के साथ उन्हें जबरदस्त जीत हासिल हुई थी।
 
मध्य प्रदेश, राजस्थान या छत्तीसगढ़ की तरह विधानसभा चुनावों में आप बिना मुख्यमंत्री पद के दावेदार के मैदान में उतर सकते हैं। मतदाताओं को पता होता है कि आपके दल में दो या तीन दावेदार हैं निजी वफादारी के क्षेत्र में कोई धु्रवीकरण नहीं है। राष्ट्रीय चुनाव में यह कहना कठिन है कि हम मोदी से राज्य दर राज्य लड़ेंगे और साथ में आपस में भी उलझे रहेंगे। मोदी पलटकर पूछेंगे कि इनमें से आप का नया गौड़ा कौन है? वह ऐसा करने में सफल होंगे। भाजपा जहां 2019 की तुलना 1971 से कर रही है, वहीं सच तो यह है कि उनके लिए दो वजहों से और अधिक बेहतर साबित हो सकता है। पहला, सन 1971 के उलट आज बहुत बड़ी तादाद में सीटें क्षेत्रीय दलों को जाएंगी। उनमें से कई, मसलन दक्षिण के दलों से लेकर मायावती और ममता तक, की कोई वैचारिक धुरी नहीं है और वे कांग्रेस और भाजपा दोनों का विरोध भी कर चुके हैं और उनके साथ गठबंधन भी। उनके विकल्प खुले रहेंगे। भाजपा और कांग्रेस दोनों को कुल मिलाकर 543 में से अधिकतम 350 सीट मिलेंगी। 300 से कम सीटों के साथ ही संभावनाओं की तलाश शुरू हो जाएगी। अगर सीटें 275 से कम रहीं तो ये दल खुलकर सामने आ जाएंगे। वे भाजपा के साथ भी जा सकते हैं।
 
दूसरा, सन 1971 में बड़े विपक्षी दलों के लिए कांग्रेस विरोध के नाम  पर एकजुट होना संभव था, खासतौर पर हिंदीभाषी क्षेत्र में। आज, भाजपा विरोध है लेकिन कांग्रेस विरोधी भावनाएं भी हैं। खंडित जनादेश की स्थिति में 50 से कम सीट पाने वाले नेता भी गैर भाजपा, गैर कांग्रेस बनने का स्वप्न देख रहे हैं। इनमें सबसे मुखर हैं तेलंगाना के नेता केसीआर।
 
क्या कहता है गणित?
 
अगर भाजपा और कांग्रेस दोनों मिलकर 250 से कम सीट पाती हैं तो इनमें से किसी एक के समर्थन के बिना अन्य दल 272 तक नहीं पहुंच सकेंगे। यानी हमें वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल जैसा अस्थिर प्रधानमंत्री मिलेगा। चूंकि मोदी या राहुल गांधी के अलावा कोई नेता 50 सीट पाने की हालत में भी नहीं है इसलिए किसी गैर भाजपा, गैर कांग्रेस नेता को पांच साल क्या साल भर भी बरदाश्त शायद ही किया जाए। बिना नेता की शिवजी के बारात जैसी यह सरकार जल्दी गिर जाएगी। याद रहे कि जयप्रकाश नारायण जैसे संत भी सन 1979 में ऐसे जमावड़े को एकजुट नहीं रख पाए थे।
 
अगर विपक्ष बिना नेता के आगे बढऩे पर जोर देता है तो मोदी को यही किस्सा दोहराना होगा और मतदाता उनको सुनेंगे। अगर वे नहीं भी सुनते तो भी खंडित जनादेश वाली सरकार ज्यादा दिन नहीं टिकेगी और अमित शाह बढ़चढ़कर दोहरा सकेंगे कि भाजपा 50 साल शासन करेगी। 
Keyword: narendra modi, BJP, alliance,,
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