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वास्तविक सवालों से है दूरी: अभिजित बनर्जी

अनूप रॉय /  January 20, 2019

व्यवहारवादी अर्थशास्त्री प्रोफेसर अभिजित बनर्जी का मानना है कि नेता आरक्षण और कर्जमाफी का इस्तेमाल प्रमुख आर्थिक सवालों की उपेक्षा करने के लिए करते हैं ताकि वे किसानों के गुस्से से बच सकें। बनर्जी मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अर्थशास्त्र के फोर्ड फाउंडेशन इंटरनैशनल प्रोफेसर हैं। इसके अलावा वह जे-पीएएल के सह संस्थापक भी हैं। उन्होंने विभिन्न मसलों पर अनूप रॉय से बात की जिनमें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास की जल्दबाजी में की गई नियुक्ति भी शामिल है

 
आपने आरबीआई गवर्नर की नियुक्ति को स्वीकार नहीं किया। क्या आपका मानना है कि इससे संस्थान को नुकसान पहुंचा है?
 
हां। 24 घंटे के भीतर उनकी नियुक्ति करने की कोई वजह नहीं थी। ऐसा लगता है कि इसकी पूरी योजना बनाई गई थी। आप लोगों से बात करें तो वे कहेंगे कि आरबीआई अब तीन लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण करने वाली है क्योंकि उनके पास कोई स्वतंत्रता नहीं बची है। यह आरबीआई के लिए काफी महंगा भी है। इस प्रक्रिया से अंदाजा मिलता है कि वह (दास) सरकार के आदमी हैं। अगर उन्होंने एक हफ्ते का वक्त इसके बारे में सोचने पर बिताया है तो मुमकिन है कि उन्हें संदेह का लाभ मिले। 
 
प्रधानमंत्री ने कहा है कि पटेल पहले ही इस्तीफा देने की इच्छा जता चुके थे....
 
मुमकिन है कि ऐसा हो लेकिन आरबीआई गवर्नर का चयन करने के लिए एक समिति की प्रक्रिया होती है। इस समिति की प्रक्रिया 24 घंटे में पूरी नहीं हो सकती है। 
 
आरक्षण की राजनीति को लेकर आपका क्या विचार है?
 
आरक्षण की राजनीति की एक खराब बात कोटा को लेकर होने वाली लड़ाई है। हमारा राजनीतिक तंत्र हमेशा से कोटा के इस खेल को खेलता रहा है। हमें करना यह चाहिए कि कोटा में बने रहने की महत्त्वाकांक्षा ही न हो बल्कि सरकार से पूछा जाना चाहिए कि सरकारी क्षेत्र से इतर रोजगार के मौके बनाने के लिए आपने क्या किया है? सरकारी नौकरियों के बजाय हमारी दिलचस्पी यह जानने में होनी चाहिए कि हम अर्थव्यवस्था में कैसे वृद्धि करेंगे, हम रोजगार के ज्यादा मौके कैसे तैयार करेंगे, सबके लिए घर दिलाने के साथ ही बुनियादी ढांचा और पर्यावरण में सुधार कैसे किया जा सकता है...
 
आप यह कैसे सोचते हैं कि  इन चीजों की  मांग नहीं होती?
 
लोगों का यह सोचना है कि एक सरकारी नौकरी मिलने के साथ ही उन्हें कड़ी मेहनत करने की जरूरत नहीं होगी। सरकारी नौकरी में निचले स्तर पर अच्छा पैसा मिलता है जो उच्च स्तर पर नहीं है। यह फायदेमंद भी है। मिसाल के तौर पर विकसित देशों के मुकाबले हमारे सरकारी शिक्षकों को जीडीपी के मुकाबले अच्छा भुगतान होता है। 
 
कृषि कर्जमाफी को लेकर आपका क्या विचार है?
 
किसानों में काफी गुस्सा है और कर्जमाफी एक त्वरित समाधान है। हमारी नीतियां इस गुस्से के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि किसानों की क्षतिपूॢत नहीं होनी चाहिए। लेकिन क्या यह क्षतिपूर्ति का बेहतर तरीका है? नहीं ऐसा नहीं है। यह बेहद अनुचित है क्योंकि अगर मैं कर्ज नहीं लेता हूं और अपनी पूरी बचत खर्च कर लेता हूं तो मुझे कर्जमाफी नहीं मिलेगी। 
 
आपके हिसाब से हमारे नेता त्वरित समाधान को क्यों तरजीह देते हैं?
 
हमारे देश में नेताओं की कार्यशैली बेहद खराब है। उन्हें चुनाव जीतने के लिए पैसे खर्च करना होता है। लेकिन उनके पास फंडिंग का कोई वैधानिक स्रोत नहीं होता है। अगर हमें भ्रष्टाचार खत्म करना है तो हमें यह सोचना शुरू करना होगा कि ये लोग बिना किसी तिकड़म के साथ पैसे लिए बगैर अपना काम कैसे कर सकते हैं। 
 
आखिर आपके हिसाब से क्या होना चाहिए? क्या चुनाव प्रचार की फंडिंग को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए?
 
बेशक। हम यह तर्क रख सकते हैं कि चुनाव  के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.2 फीसदी हिस्सा अलग कर देना चाहिए ताकि जब एक ईमानदार व्यक्ति चुनाव में हिस्सा लेना चाहे तब वह ऐसा कर पाए। कई देशों में चुनावी धन के लिए बकायदा अभियान चलाया जाता है लेकिन इसमें भी यह श्रेणी भी तय होती है कि इसका लाभ कौन उठा सकता है। 
 
सापेक्षिक और संपूर्ण निर्धनता की चर्चा खूब हो रही है। क्या एक गरीब ही गरीब है क्या फिर निर्धनता कुछ और बातों पर निर्भर करती है?
 
सापेक्षिक और संपूर्ण गरीबी दोनों ही अहम है। अमेरिका और भारत की मिसाल लें। अमेरिका के गरीबों को भी उच्च स्तर की शिक्षा मिली है और उनकी मांग भारत के गरीबों की मांग से अलग है। अगर भारत में कोई 15,000 रुपये प्रतिमाह की कमाई कर रहा है तब वह अमेरिका की गरीबी रेखा से नीचे होगा। लेकिन भारत के गांवों में इतनी कमाई के साथ वह व्यक्ति अच्छी जीवन शैली के साथ जीवन व्यतीत कर सकता है। 
 
भारत में शहरी क्षेत्रों का पलायन एक बड़ी चुनौती है, आप इस स्थिति को किस तरह देखते है?
 
शहरों की स्थिति बेहद खराब है। पूर्व में ज्यादा उद्योग नहीं हैं। ऐसे में जिन राज्यों में उद्योग हैं वे इन राज्यों की मदद करते हैं। हालांकि पश्चिम में शहर इस तरह नहीं तैयार हैं कि वहां आबादी आसानी से रह सके। पलायन करने वालों के लिए रहने की कोई जगह नहीं है ऐसे में वे कम समय के लिए पलायन करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कुछ सीखना असंभव होता है इसी वजह से कोई कुशल श्रमिक नहीं बन पाता है। यही कारण है कि हमारे यहां शहरीकरण की प्रक्रिया धीमी है। पिछले 20 सालों में हमारे गांव भी रहने लायक बन गए हैं। कमाई में सुधार हुआ है और निर्धनता के आंकड़े में भी पिछले 20 सालों के मुकाबले कमी आई है।
 
अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध को लेकर आपका क्या विचार है और यह वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर डालेगा?
 
मुझे नहीं लगता कि किसी भी अर्थव्यवस्था पर इसके कोई गंभीर नतीजे होंगे भले ही यह चीन पर ज्यादा असर डाल सकता है। ये सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और बड़ी अर्थव्यवस्थाएं व्यापार कम करती हैं। वहीं दूसरी तरफ छोटी अर्थव्यवस्थाएं ज्यादा कारोबार करती हैं।
 
क्या चीन निर्यात पर निर्भर नहीं है?
 
आप आंकड़ों पर नजर डालें। चीन के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में आयात-निर्यात की हिस्सेदारी भारत से भी कम है। चीन का जीडीपी साफतौर पर बड़ा है लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था चीनी ग्राहकों पर निर्भर है जो चीनी कंपनियों से खरीदारी करते हैं। 
 
क्या अमेरिका-चीन के व्यापार युद्ध का असर उभरते बाजार पर नहीं पड़ रहा है?
 
सामान्य विचार यह है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो रही है। चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार थोड़ी धीमी है। अगले साल अमेरिका की अर्थव्यवस्था में धीमापन दिखेगा। जब भी दुनिया में धीमी वृद्धि होती है तब डॉलर में भी गतिविधि दिखती है। अगर छोटी अर्थव्यवस्थाएं व्यापार युद्ध में फंसेंगी तो तब यह स्थिति बेहद खराब होगी। जब तक अर्थव्यवस्थाएं इस बात को महसूस नहीं करतीं कि उन्हें कुछ करने की जरूरत है और वे मुद्रा के बचाव की कोशिश करें या फिर ब्याज दरों में बढ़ोतरी करें तब तक उन्हें इसे जारी रखना चाहिए। मैं नहीं मानता कि यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आपत्तिजनक है। सबसे खराब बात यह है कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) एक शक्तिहीन संस्था है और कोई भी कुछ भी कर सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी दुनिया के साथ कुछ ऐसा ही किया था। उन्होंने डब्ल्यूटीओ को भी कमजोर कर दिया।
 
हाल में विश्व बैंक के प्रेसीडेंट जिम योंग किम ने निजी क्षेत्र से जुडऩे के लिए इस्तीफा दे दिया। क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं है?
 
संभव है कि वह अपनी नौकरी से थक चुके होंगे या फिर ट्रंप प्रशासन के साथ काम करना आसान न हीं होगा। विश्व बैंक में अमेरिका की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है और यह अपनी ताकत का इस्तेमाल करने में कभी पीछे नहीं रहा है। किम निश्चित तौर पर दूसरी बार भी नौकरी चाहते होंगे। दो साल तक करने के बाद बिना किसी मेडिकल आधार के नौकरी छोडऩे का मतलब यही है कि वह साफतौर पर यह कह रहे हैं कि मैं काम नहीं करना चाहता।
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