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50 साल उम्र के बाद सुपरस्टार की फिल्म क्यों चलती है कम?

वनिता कोहली-खांडेकर /  January 18, 2019

शाहरुख खान की दिसंबर के आखिर में रिलीज हुई फिल्म जीरो का कारोबार ठीक नहीं रहा है। बौने कद के एक शख्स की मानसिक बीमारी सेरेब्रल पॉल्जी से ग्रस्त युवा वैज्ञानिक के साथ प्रेम की कहानी वाली यह फिल्म दो अधूरे लोगों की जिंदगी के कई आयामों को बयां करती है। फैन और जब हैरी मेट सेजल के बाद शाहरुख की यह तीसरी फिल्म है जिसे दर्शकों की ठंडी प्रतिक्रिया मिली है।
53 साल के शाहरुख हिंदी फिल्मों के सबसे बड़े सितारे हैं। उन्होंने अब तक 100 से अधिक फिल्मों में काम किया है जिनमें से 60 फिल्मों में वह अग्रणी भूमिका में रहे हैं। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे और कुछ कुछ होता है जैसी उनकी कई फिल्में भारत की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हैं, लिहाजा दो-तीन फिल्मों का मुनाफा न कमा पाना चिंता की कोई बड़ी बात नहीं है।
असली सवाल यह है कि भारतीय फिल्मों के सुपरस्टार 50 साल की उम्र के बाद लडख़ड़ाने क्यों लगते हैं? दिलीप कुमार और राजेश खन्ना से लेकर अमिताभ बच्चन और अब शाहरुख खान तक हर किसी को इस दौर से गुजरना पड़ा है। इन सभी सुपरस्टार की उम्र 50 साल से अधिक होते ही उनकी फिल्में चलनी कम हो गईं। यहां तक कि शाहरुख की फैन जैसी उनकी अच्छी फिल्मों को भी बाजार से मनमाफिक प्रतिक्रिया नहीं मिलती है।
हिंदी सिनेमा की महिला सुपरस्टार पर भी यही बात लागू होती है। माधुरी दीक्षित और श्रीदेवी इसकी मिसाल हैं। अंतर केवल इतना है कि नायिकाओं के मामले में यह सिलसिला 35-40 साल के आसपास शुरू हो जाता है। इस बारे में मेरी दो धारणाएं हैं।
भारतीय सिनेमा नायक-नायिका की कहानी पर काफी हद तक निर्भर रहा है। फिल्म में एक अग्रणी नायक होना चाहिए और उसके लिए एक बिकाऊ अभिनेता होना जरूरी है। दिलीप कुमार या अमिताभ बच्चन की उम्र 50 साल से ऊपर होने के बाद भी फिल्मकार उन्हें कम उम्र की नायिकाओं के साथ पर्दे पर पेश करते रहे। फिल्म जगत में कोई दूसरा बिकाऊ सितारा नहीं होने से ऐसा होता रहा।
सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींचकर लाने के लिए फिल्म में अमिताभ की मौजूदगी जरूरी हुआ करती थी। उन्हें वन-मैन इंडस्ट्री भी कहा जाता था। लेकिन यह तभी तक कारगर रहा जब तक वह युवा दिखते थे और फिल्म की कहानी भी कोई अर्थ रखती थी। लेकिन केबल टीवी के आगमन से दर्शकों के सामने विकल्प बढ़ गए और तब तक अमिताभ भी उम्रदराज हो चले थे।
वह शहंशाह (1988) और तूफान (1989) जैसी भुला देने वाली फिल्मों में मीनाक्षी शेषाद्रि जैसी नायिकाओं के साथ मशक्कत करते हुए नजर आए। वर्ष 2000 में जब उन्होंने टीवी गेम शो 'कौन बनेगा करोड़पति' की 57 वर्षीय अमिताभ के तौर पर मेजबानी की, तब फिल्मों के लेखकों ने उन्हें नए सिरे से पेश करना शुरू कर दिया। बागबां (2003), पीकू (2015), पिंक (2016) जैसी दर्जनों फिल्में अमिताभ के नए सिरे से बने करियर की बानगी पेश करती हैं।
दिलीप कुमार ने भी बैराग (1976) और सगीना (1974) जैसी बड़ी फ्लॉप फिल्में 50 साल पूरा करने के बाद ही की थीं। हालांकि 1980 के दशक में आई फिल्मों- मशाल, मजदूर, शक्ति और कर्मा में वह अपनी उम्र के मुताबिक भूमिकाएं निभाते हुए सफल भी हुए। इन सभी फिल्मों में उनके किरदार काफी सशक्त तरीके से लिखे हुए थे लेकिन फिल्म का 'नायक' हमेशा कोई युवा ही होता था।
कहानी को परोसने में भूमिका निभाने वाले सभी किरदारों के बारे में फिल्मी खबरें करने का पूरा विचार अब फलक पर आ रहा है। फिल्म-निर्माण का समूचा अर्थशास्त्र इकलौती राजस्व प्रणाली (बॉक्स ऑफिस), एक नायक-आश्रित कहानी वाले अमिताभ एवं दिलीप कुमार के दौर से अब काफी बदल चुका है। अब किसी अभिनेता या अभिनेत्री के लिए पिता, भाई या मां-बहन की भूमिका निभाने को उनके करियर के लिए धब्बा भी नहीं माना जाता है।
वर्ष 2018 की सबसे सफल फिल्मों में शुमार 'बधाई हो' में तो एक अधेड़ दंपती के अचानक मां-बाप बनने के अनुभवों को पिरोया गया है। आप यह दलील दे सकते हैं कि टॉम क्रूज भले ही 60 साल के करीब बढ़ रहे हैं लेकिन कोई भी उनसे मिशन इम्पॉसिबल सीरीज के ईथन हंट या जैक रीचर के अलावा कोई और किरदार की उम्मीद ही नहीं करता है।
क्रूज के ये सारे किरदार एक्शन और स्टंट से भरपूर हैं और क्रूज खुद ही ये सारे स्टंट करने पर जोर देते हैं। इस पहलू की तुलना दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपरस्टार नायकों के साथ उपयोगी होगा। चेन्नई के फिल्म समीक्षक श्रीधर पिल्लै का कहना है कि हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार काफी हद तक रोमांटिक छवि वाले रहे हैं लेकिन दक्षिण भारत के सुपरस्टार एक्शन-केंद्रित फिल्मों में अधिक सक्रिय रहे हैं।
तेलुगू फिल्मों के सुपरस्टार चिरंजीवी और तमिल फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत इसके उदाहरण हैं। पिल्लै कहते हैं, 'मुझे लगता है कि एक्शन हीरो 50 साल की उम्र वाले इस अभिशाप से बच जाते हैं।' हिंदी फिल्मों में भी यह देखा जा सकता है। जहां रोमांटिक छवि वाले शाहरुख को बुरे दौर का सामना करना पड़ रहा है वहीं सलमान खान और अक्षय कुमार की फिल्में अच्छा कारोबार कर रही हैं। लेकिन इस संकल्पना से अमिताभ को उम्र के पांचवें दशक में मिली नाकामी की व्याख्या नहीं हो पाती है।
इससे एक दिलचस्प सवाल खड़ा होता है- क्या फिल्म बाजार उन सुपरस्टार नायकों को दंडित करता है जो अपने मूलभूत खांचे से बाहर जाकर प्रयोग करना चाहते हैं? तभी तो एक दीवाने प्रशंसक (फैन), एक शराब तस्कर (रईस) या रोबोट (रा.वन) के रूप में शाहरुख को देखने के लिए दर्शक तैयार नहीं हो रहे हैं।
शाहरुख की अपनी रोमांटिक छवि से इतर फिल्में- स्वदेश, पहेली, चक दे इंडिया या माई नेम इज खान, करने की पुरानी कोशिश के भी नतीजे मिले-जुले ही रहे थे। चलिए, हम शाहरुख की अगली बड़ी हिट फिल्म का इंतजार करते हैं।
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