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स्वास्थ्य नीति की कैसी हो बुनियाद?

अजय शाह /  January 18, 2019

यदि गुणवत्ता और मूल्य के आधार पर देखा जाए तो भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर निरंतर कमजोर बना हुआ है। इस समस्या को दूर करना तो महत्त्वपूर्ण है ही लेकिन सबसे बेहतर स्थिति तो वह होगी जहां लोग कम से कम बीमार पड़ें। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि जन स्वास्थ्य के पारंपरिक एजेंडे पर ध्यान दिया जाए। इसके तहत पुराने बचाव संबंधी हस्तक्षेपों का प्रयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य सेवाओं के पुनर्गठन की भी आवश्यकता है।
आदर्श स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था वह है जहां चिकित्सकों का पूरा तंत्र लोगों के साथ जुड़कर काम करता है और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि उन्हें अस्पताल जाना ही न पड़े। हमारे देश में यह व्यवस्था अच्छी नहीं है। यहां चिकित्सक और मरीज का रिश्ता मुनाफा कमाने वाले और ग्राहक का है। अक्सर चिकित्सक की कमाई अधिक से अधिक जांच और दवाइयों से जुड़ी होती है।
साफ है कि लोगों के बीमार रहने पर उनकी कमाई अधिक होती है। मौजूदा व्यवस्था में कोई लोगों की सेहत को लेकर फिक्रमंद नहीं है। हमारे देश में नीतिगत बहस काफी हद तक स्वास्थ्य सुविधाओं पर होने वाले आम परिवार के खर्च पर केंद्रित रही है। हमें बीमा योजनाएं अच्छी लगती हैं जहां बीमार लोगों के स्वास्थ्य का खर्च स्वस्थ लोग उठाते हैं। परंतु इससे स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ी हुई लागत और बढ़ती बीमारियों जैसी समस्या दूर नहीं होती।
हमारा ध्यान प्रमुख रूप से देश की आबादी के स्वास्थ्य पर होना चाहिए।
भारत के लिए हमारा स्वप्न एक स्वस्थ देश का होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति बीमार नहीं पड़ता है तो इसमें सबकी बेहतरी है। जन स्वास्थ्य की पारंपरिक अवधारणा में बीमारियों से बचाव ही प्राथमिक है। भारत दुनिया के उन देशों में से है जहां टीकाकरण कार्यक्रम सर्वाधिक कमजोर हैं। अगर हम इनके दायरे में आने वाली बीमारियों को लेकर अपना प्रदर्शन सुधार सकें और टीकाकरण कार्यक्रमों का सफल क्रियान्वयन कर सकें तो बीमार पडऩे वालों की तादाद कम हो जाएगी।
ज्यादातर संक्रामक बीमारियों की जड़ में पानी और सफाई की समस्या है। मच्छर जैसे बीमारी के वाहकों से निपटना आवश्यक है। इस दिशा में आज हमारे प्रयास सन 1970 के दशक से भी कमजोर हैं। इस बीच स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए मोर्चे तैयार हो गए हैं। हवा की गुणवत्ता एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है।
हमें अपनी नई सड़कों पर गर्व है लेकिन राज्यमार्गों पर इंजीनियरिंग का स्तर कमजोर है। प्रति वाहन-प्रति किलोमीटर दुर्घटना दर के मामले में हम दुनिया में शीर्ष पर हैं। नीतिगत कमियों की बदौलत बाढ़ जैसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं और भूकंप अधिक नुकसानदेह साबित हो रहे हैं। हमारे स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रशासनिक सीमा भी समस्या का हिस्सा है।
जन स्वास्थ्य के अधिकांश निर्धारक तत्त्व स्वास्थ्य मंत्रालय के दायरे से बाहर हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक ध्यान देने की आवश्यकता है जो स्वास्थ्य मंत्रालय का कार्यक्षेत्र हैं। अगर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण कम से कम लागत में सड़क बनाने पर केंद्रित रहा तो सड़क सुरक्षा और आपदा नियंत्रण के मसले पर ज्यादा बदलाव आता नहीं दिखता।
हमें अपनी नीतियों को ठीक करना होगा ताकि सरकार के सभी विभाग स्वास्थ्य को लेकर सोचें और जन स्वास्थ्य को लेकर पारंपरिक क्षेत्रों में क्षमता विकास किया जा सके। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत कम होगी। इसके अलावा हमें स्वास्थ्य सेवाओं पर पुनर्विचार करने की भी आवश्यकता है।
जब चिकित्सकों को जांच आदि से भी लाभ हो और वे इनसे पैसा कमाने लगें तो जाहिर है लोगों के बीमार होने में उनका फायदा होगा। यह गलत किस्म का प्रोत्साहन है। क्या इस काम को अलग तरह से अंजाम दिया जा सकता है? इस दिशा में एक अंतर्दृष्टि यह भी कहती है कि सेवा प्रदाताओं के नेटवर्क और मरीजों के बीच एक अनुबंध हो जिसमें तयशुदा मासिक भुगतान के बदले किसी व्यक्ति के ताउम्र इलाज की बात शामिल हो।
यह अनुबंध किसी एक चिकित्सक के बजाय चिकित्सा के सभी पहलुओं को समेटे नेटवर्क के साथ होना चाहिए। ऐसे में बीमार व्यक्ति सीधे नेटवर्क में जाकर बिना किसी अतिरिक्त लागत के स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त कर सकता है। एक बार अनुबंध की यह शैली निर्धारित होने के बाद स्वास्थ्य सेवा प्रक्रिया पूरी तरह बदल जाएगी। अब स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क के लिए हर माह भुगतान करना होगा।
जब तक मैं बीमार नहीं पड़ता यह भुगतान उनके लिए विशुद्ध मुनाफा होगा। जब मैं बीमार पड़ता हूं तो इसका बोझ उन्हें उठाना पड़ता है। ऐसे में उन्हें अतिरिक्त दवाएं या जांच आदि लिखने का कोई लाभ नहीं होगा। उनका फायदा हमें स्वस्थ रखने में है।
अब स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क का फायदा इस बात में है कि वह हमें नियमित जांच के लिए बुलाए ताकि समस्या का जल्दी पता लग सके। यह नेटवर्क टीकाकरण को भी बढ़ावा देगा ताकि बीमारी से जुड़ी लागत का बोझ न आए।
फिलहाल देश में चिकित्सक और मरीज के बीच की बातचीत में लक्षणों की व्याख्या कर उपचार किया जाता है।
अब वक्त आ गया है कि इस व्यवहार को बदला जाए। चिकित्सक का कुछ मिनटों का बेहतर व्यवहार स्वास्थ्य और व्यवहार पर सकारात्मक असर डालता है। उदाहरण के लिए चिकित्सक कह सकता है, 'मैं आपको कुछ व्यायाम बता रहा हूं। मैं चाहता हंू आप तीन महीने बाद आएं और तब हम देखेंगे कि आपके कॉलेस्ट्रॉल के स्तर में क्या बदलाव आया है?' यह अधिकांश मरीजों को प्रेरित करेगा। इससे लागत कम होगी और स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क का मुनाफा सुधरेगा।
ऐसे नेटवर्क के चिकित्सक को अगर संक्रामक बीमारियों में इजाफा दिखता है तो वह स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से बातचीत करके कुछ ऐसी पहल करा सकता है जो बीमारी की जड़ को ही समाप्त करें। ऐसा करने से स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क को और अधिक आय जुटाने में मदद मिलेगी क्योंकि कम लोग बीमार पड़ेंगे।
हमारे देश में मौजूदा बहस में पूरा ध्यान परिवारों पर बीमारी के कारण कोई बोझ न पडऩे देने पर केंद्रित है। यह एक मुद्दा है लेकिन हमें गहराई से पड़ताल करने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य नीति का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए एक ऐसी परिदृश्य रचना जहां लोग बीमार न पड़ें। इसके लिए स्वास्थ्य आधारित विचार प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसमें विभिन्न सरकारी विभाग शामिल हों।

Keyword: health, medical services, india, quality, स्वास्थ्य सेवा,
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