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राज्य की हिंसा के खिलाफ सुरक्षा उपायों की अहमियत

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  January 17, 2019

संबद्ध पक्षों के बीच अनुपलब्ध सामग्री के परीक्षण के लिए अदालत के समक्ष सीलबंद लिफाफों को रखना अब भारत में बैठक घरों की चर्चा का हिस्सा हो चुका है। राफेल मामले में दायर याचिका पर आया उच्चतम न्यायालय का फैसला काफी हद तक अदालत में सरकार की तरफ से रखे गए सीलबंद लिफाफे में उपलब्ध कराई गई जानकारी पर ही आधारित था। इस मामले में शामिल अन्य पक्षों को न तो इस सीलबंद सामग्री को देखने का अवसर मिला और न ही वे इस पर बहस कर सकते थे। ऐसा लगता है कि न्यायालय ने सीलबंद लिफाफे में दी गई जानकारी को शाब्दिक अर्थों में ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया। संक्षेप में, अदालत ने यह माना कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने राफेल विमान सौदे का परीक्षण किया हुआ है जबकि सरकार अब यह स्पष्टीकरण दे रही है कि उसके कहने का आशय यह था कि सीएजी भविष्य में इस रक्षा सौदे का परीक्षण करेगा। इससे पैदा हुए विवाद ने इस बात को सार्वजनिक विमर्श में ला दिया है कि सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी गई जानकारी याचियों को सौंपी जा सकती है?
 
दुनिया भर में कहीं भी, खासकर ब्रिटेन में जहां से हमने न्याय, समानता एवं स्वच्छ अंत:करण के विधिक सिद्धांत लिए हैं, याचियों के पीठ पीछे अदालत को सीलबंद लिफाफे में दस्तावेज सौंपना निंदनीय माना जाता है। हालांकि भारत में ऐसा होता रहा है। नियामकीय मामलों से जुड़े वकीलों को नियमित तौर पर ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। न्यायिक या अद्र्ध-न्यायिक हरेक मंच से यह अपेक्षा होती है कि वह सुनवाई के लिए लाए गए मामले से संबद्ध सभी पक्षों को समान समझे। अदालत अपनी जानकारी में लाई गई सभी सामग्रियों पर सभी संबद्ध पक्षों की दलीलें सुनती है और उस सामग्री के सभी पहलुओं पर सभी पक्षों के तर्कों के आधार पर विवेकपूर्ण ढंग से फैसला सुनाती है। नैसर्गिक न्याय का बुनियादी सिद्धांत यह है कि आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति को खुद पर लगे आरोपों से जुड़े सभी दस्तावेजों के बारे में पता होना चाहिए। इन दस्तावेजों में केवल आरोपों को पुष्ट करने वाले ही नहीं, बल्कि उन आरोपों को कमजोर  करने वाले साक्ष्य भी शामिल होते हैं। इसी तरह, अदालत यह भी सुनिश्चित करेगी कि बचाव पक्ष की तरफ से रखी गई दलीलों से संबंधित सारी सामग्री आरोप लगाने वाले पक्ष को मुहैया कराई जाए।
 
इस सिद्धांत से दूर हटने को इतना गंभीर मामला माना जाता है कि वर्ष 2013 में ब्रिटेन ने 'सीलबंद सामग्री प्रक्रिया' (सीएमपी) का नियमन करने वाला एक अलग कानून ही बना दिया। इसके पीछे सोच यह थी कि इस प्रक्रिया की आड़ में अगर राज्य गैरकानूनी तरीके से बरताव करता है तो उससे क्षतिपूर्ति का दावा किया जा सके। आपराधिक मामलों में सीएमपी के इस्तेमाल की मनाही है। किसी भी स्थिति में आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों से संबंधित सभी प्रासंगिक दस्तावेजों को उसे उपलब्ध कराए बगैर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन दीवानी मामलों की सुनवाई में सीएमपी का सहारा लिया जा सकता है। अगर अदालत सीएमपी की अनुमति दे देती है तो उसे एक स्वतंत्र विशेष अधिवक्ता (पक्षकार के वकील से अलग) नियुक्त करना होगा और वह इस तरह की बंद एवं गोपनीय सामग्री के निहितार्थ एवं प्रासंगिकता के बारे में अदालत को बताएगा।
 
पिछले कुछ वर्षों में सीएमपी प्रावधान को ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट में दो बार चुनौती दी जा चुकी है। पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट ने एक  निचली अदालत में सीएमपी को दी गई मंजूरी के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई की थी। इस मामले में एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी पर गैरकानूनी तरीके से दो लोगों को लीबिया के सुपुर्द करने के आरोप लगे थे जहां पर उन्हें प्रताडि़त भी किया गया। ब्रिटेन की महारानी ने इस खुफिया अधिकारी के खिलाफ अभियोग चलाने की इजाजत नहीं दी जिसके बाद संबद्ध पक्ष समझौते के लिए तैयार हो गए। लेकिन ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट ने सीएमपी कानून को 3-2 के बहुमत से सुनाए गए अपने फैसले में यह व्यवस्था दी कि भले ही क्षतिपूर्ति का दावा किए जाने से यह मामला दीवानी लगे लेकिन मूलत: यह मामला आपराधिक ही है, लिहाजा इस मामले में सीएमपी की अनुमति नहीं दी जा सकती है। अगर आरोपी खुफिया अधिकारी पर अभियोग किसी आपराधिक अदालत में चलता है तो वहां पर सीएमपी का सहारा नहीं लिया जा सकता। लेकिन यही मामला अगर दीवानी अदालत में चल रहा हो तो सीएमपी प्रक्रिया अपनाए जाने पर कोई रोक नहीं होगी। 
 
कुछ साल पहले बैंक मेलट के मामले में सरकार ने अपने बचाव में सीएमपी का सहारा लेने की कोशिश की। दरअसल ब्रिटिश वित्त विभाग के एक निर्देश में इस बैंक की लंदन स्थित परिसंपत्तियां ईरान पर लगे परमाणु प्रतिबंधों के उल्लंघन के आरोप में जब्त करने को कहा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने सीएमपी को सरकार का कदाचार बताते हुए कार्यवाही को कुछ मिनटों में ही स्थगित कर दिया। संक्षेप में, अगर बैंक मेलट को खुद पर लगे आरोपों को नकारने और अपना बचाव करने के लिए जरूरी सामग्री नहीं मुहैया कराई जाती तो निष्पक्ष सुनवाई की गुंजाइश नहीं रह जाती।
 
किसी भी समाज में राज्य के पास वैध हिंसा पर एकाधिकार होता है। इस तरह की हिंसा के खिलाफ सुरक्षा उपायों की गुणवत्ता ही समाज को आक्रोशित कर सकने वाले अन्याय को नियंत्रित कर सकती है। लेकिन 'मुठभेड़ों' पर तारीफों के पुल बांधने वाली फिल्में बनाने वाले और घृणित हिंसा को भी दार्शनिक अंदाज में सही ठहराने वाले गुरुओं की भरमार वाले समाज को इस राह में अभी लंबा सफर तय करना है। 
 
(लेखक एक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: mob lynching, states,,
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