बिजनेस स्टैंडर्ड - कितनी गंभीर है चीन की आर्थिक मंदी?
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कितनी गंभीर है चीन की आर्थिक मंदी?

श्याम सरन /  January 17, 2019

चीन को वैश्विक वृद्घि का वाहक कहा जाता था। उसके आर्थिक विकास में आ रहा धीमापन दुनिया को उतना प्रभावित कर सकता है जितना कि हमने अभी तक कल्पना भी नहीं की है। बता रहे हैं श्याम सरन 

 
अमेरिका और चीन के बीच चल रहे मौजूदा व्यापारिक युद्घ के नतीजों का सीधा संबंध चीन की आर्थिक वृद्घि के दायरे से है। अगले एक दशक में 6-6.5 फीसदी की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्घि दर स्थायी रूप से हासिल करने की क्षमता रखने वाला चीन व्यापारिक युद्घ समाप्त करने के लिए अहम नीतिगत बदलाव करता नहीं दिखता। वह अमेरिकी वस्तुओं की खरीद बढ़ाने के रूप में नीतिगत रियायत दे सकता है, चीनी बाजार में उनकी पहुंच बढ़ा सकता है और विदेशी निवेशकों और कंपनियों को चीनी कंपनियों के समान अवसर देने की बात कर सकता है। अमेरिकी वार्ताकार जिन ढांचागत बदलावों की मांग कर रहे हैं उनका चीन प्रतिरोध करेगा। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार वार्ता का ताजा दौर 9 जनवरी को समाप्त हुआ। अमेरिकी और चीनी पक्ष से आ रही रिपोर्ट बताती हैं कि चीन ने अमेरिका से कृषि उत्पाद और ऊर्जा खरीदने के प्रति सहमति दिखाई है परंतु बौद्धिक संपदा, औद्योगिक नीति और साइबर सुरक्षा जैसे ढांचागत मुद्दों पर अभी भी मतभेद है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में अमेरिकी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि दोनों पक्ष चीन में ढांचागत सुधारों के मुद्दे पर अभी भी एकदूसरे से मतभेद रखते हैं। इस बारे में भी कोई घोषणा नहीं की गई कि अमेरिका में वरिष्ठï स्तर पर आगे कोई बातचीत होगी या नहीं। माना जा रहा था कि प्रगति होने पर आगे ऐसी चर्चा होगी। शायद हमें अमेरिका के राष्टï्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नए ट्वीट से ही इस बारे में जानकारी मिलेगी। 
 
चीन की आर्थिक वृद्घि 2010 के 10.6 फीसदी से गिरकर 2015 में 6.9 फीसदी और 2018 में 6.5 फीसदी रह गई। यह गिरावट अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलाव में देखी जा सकती है। चीन का जननांकीय लाभांश 2012 के आसपास सर्वोच्च स्तर पर था वह तब से लगातार गिर रहा है। निर्यात उसकी वृद्घि का बड़ा वाहक रहा है लेकिन अब वह स्थिर हो गया है। दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बनने के बाद चीन को अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाना मुश्किल होगा, खासकर तब जबकि प्रमुख देश संरक्षणवादी रुख अपना रहे हैं। फिलहाल यह 17 फीसदी है। कुल कारक उत्पादकता जो विकास के दौर में अच्छीखासी थी वह 2008-11 के 3 फीसदी के स्तर से गिरकर अब केवल एक फीसदी रह गई है। चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी चक्रीय कारकों की वजह से नहीं बल्कि ढांचागत बदलाव की वजह से है। जब तक नए कारक सामने नहीं आते, जीडीपी वृद्घि अन्य विकसित देशों की तुलना में कम होते रहने की आशंका है। 
 
परंतु ऐसा कब तक चलेगा? केवल महत्त्वपूर्ण तकनीक प्रगति के माध्यम से ही आगे बढ़ा जा सकता है। यानी चीन की भविष्य की वृद्घि इस बात पर निर्भर करेगी कि वह बौद्घिक संपदा का किस प्रकार इस्तेमाल करता है। मेड इन चाइना 2025 की पहल, जिसका लक्ष्य चीन को तकनीकी उन्नति के क्षेत्र में अग्रणी बनाना था, वह चीन की वृद्घि के लिहाज से बहुत अहम है। ऐसे में लगता नहीं कि वह अमेरिका या अन्य पश्चिमी देशों की बात सुनेगा।  उच्च प्रौद्योगिकी वाले भविष्य को लेकर प्रतिबद्घता के बावजूद ऐसा लगता नहीं कि चीन उच्च मूल्यवर्धित आर्थिक प्रक्रिया की ओर तेजी से बदलाव ला पाएगा। स्टील, सीमेंट और कोयला उद्योग की मौजूदा अतिरिक्त क्षमता में यह बात स्पष्टï है। चीन का कर्ज इस वर्ष जीडीपी के 275 प्रतिशत होने की आशंका है। अब यह स्पष्टï हो चुका है कि इस कर्ज में काफी मात्रा विदेशी ऋण की है। कुल विदेशी ऋण फिलहाल 1.9 लाख करोड़ डॉलर है। इसमें अल्पावधि का ऋण करीब 62 फीसदी है। इसमें से 1.2 लाख करोड़ की राशि को इस वर्ष आगे बढ़ाना होगा। दिलचस्प बात है कि इस विदेशी ऋण का बड़ा हिस्सा बेल्ट ऐंड रोड पहल के तहत परियोजनाओं से संबंधित है। इनमें से कुछ की व्यवहार्यता पर सवाल भी खड़े हो चुके हैं।
 
वृद्धि को गति देने के प्रयास में आर्थिक स्थिरता को लेकर इस बढ़ते जोखिम के साथ बार-बार समझौता हुआ है। इसके राजनीतिक और सामाजिक परिणाम सामने आ सकते हैं। सन 2018 में चीन के केंद्रीय बैंक ने चार बार अपने आरक्षित भंडार की जरूरत में परिवर्तन किया और हाल ही में स्थानीय सरकारों को नए बॉन्ड जारी करने की इजाजत दी गई ताकि बुनियादी परियोजनाओं में निवेश बढ़ाया जा सके। खपत में वृद्धि 12 फीसदी वार्षिक से घटकर 8 फीसदी वार्षिक रह गई है, हालांकि इस बीच प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है। फिलहाल एक युआन का उत्पादन करने में चार युआन के बराबर निवेश लग रहा है।
 
वार्षिक इकनॉमिक वर्क कॉन्फ्रेंस में चीन के सत्ताधारी दल के नेतृत्व ने यह माना कि बाहरी माहौल जटिल है और अर्थव्यवस्था पर दबाव है। जाहिर है यह संकेत अमेरिका के साथ चल रही कारोबारी जंग और विकसित देशों में बढ़ती संरक्षणवादी प्रवृत्ति की ओर था। इसके अलावा चीन द्वारा पश्चिम की हाईटेक कंपनियों के अधिग्रहण पर तमाम प्रतिबंध भी इस चिंता के दायरे में थे। परंतु यह बाहरी माहौल तो पहले से खराब घरेलू हालात में बस एक नया आयाम भर जोड़ता है। क्या चीन का नेतृत्व इन जोखिमों का साथ-साथ सफल प्रबंधन कर पाएगा?
 
अगले एक दशक में चीन का आर्थिक दायरा यह तय करेगा कि नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कैसी होगी? अगर चीन अपने दोहरे जोखिम का सफलतापूर्वक प्रबंधन कर लेता है और तेज गति से वृद्धि करता रहता है तो वह 2030 तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेगा। उसका आकार अमेरिकी अर्थव्यवस्था से दोगुना हो चुका होगा और भारत तीसरे स्थान पर होगा। वह मध्य आय के जाल से निकलकर उच्च आय वाले चुनिंदा देशों में शुमार होगा। एक पार्टी वाले अधिकनायकवादी शासन के रहते यह उपलब्धि हासिल करने वाला वह अब तक का इकलौता देश होगा। चीन ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में फेरबदल चालू कर दिया है। उसका प्रभाव अब बढ़ता ही चला जाएगा। अगर चीन की अर्थव्यवस्था उपरोक्त जोखिमों के बीच ठहर जाती है, तब हमें एक अलग तरह की चुनौती का सामना करना होगा जो उतनी ही गंभीर होगी। दुनिया विस्तारवादी चीनी अर्थव्यवस्था की आदी हो गई है जो वैश्विक वृद्धि को बढ़ावा देती आई है। अगर विकास का इंजन थमा तो हमें कहीं अधिक उथलपुथल का सामना करना पड़ सकता है।
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर के मौजूदा वरिष्ठï फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं। )
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