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आर्थिक आधार पर आरक्षण से ही दूर हो पाएगी समस्या?

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  January 15, 2019

आर्थिक रूप से कमजोर अगड़ों के लिए आरक्षण संबंधी विधेयक संसद में पारित होने से पैदा हुई आशंकाओं ने नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण पर होने वाली बहस में अंतर्निहित विरोधाभास को फिर से उजागर कर दिया है। सामाजिक अन्याय से आक्रांत रहे देश में एक सकारात्मक कदम के तौर पर आरक्षण की अहमियत निरपवाद है। लेकिन इस पर गौर करने की पर्याप्त वजहें हैं कि क्या आरक्षण देने में लंबे समय से अपनाया जाता रहा 'टॉप-डाउन' दृष्टिकोण ही इस दिशा में आगे बढऩे का व्यावहारिक तरीका है? टॉप-डाउन दृष्टिकोण में सरकारी नौकरियों और सरकारी नियंत्रण वाले एवं उसकी आर्थिक मदद से चलने वाले शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का दायरा लगातार बढ़ता रहा है।

 
इस सकारात्मक कार्रवाई के तहत लाभान्वित होने वाले व्यक्ति के लिए जाति, समुदाय या अब आर्थिक हालात में से कोई भी उद्गम सही मायनों में सशक्तीकरण या सामाजिक रूपांतरण करने वाला नहीं है। अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के अधिक संपन्न एवं शिक्षित परिवारों को 'क्रीमी लेयर' प्रावधान से घेरने और निचली जातियों को आरक्षण से होने वाले फायदों को लेकर सार्वजनिक विमर्श और न्यायपालिका के भीतर भी तगड़ा विवाद रहा है। इससे जुड़े एक असहज सच की तरफ नितिन गडकरी ने कुछ समय पहले ही इशारा किया था। गडकरी ने कहा था कि जब केंद्र और राज्यों में सरकारें अब नौकरी नहीं दे पा रही हैं लिहाजा किसी के लिए भी नौकरी में आरक्षण देना असल में एक निरर्थक प्रयास ही है।
 
गडकरी ने अनजाने में ही समस्या की जड़ को उजागर कर दिया। वोट दिलाने वाली कलाबाजी से आगे बढ़कर भारत में व्यापक सामाजिक इक्विटी के निर्माण की चिंता करने वाले किसी भी राजनेता के लिए यह महत्त्वपूर्ण है। बड़ी संख्या में नौकरियां निजी क्षेत्र में सृजित हो रही हैं (इसमें पकौड़े बेचने वाले शामिल नहीं हैं) और यह क्षेत्र ही शिक्षा सेवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता भी है। ऐसे में असली पहेली यह है कि कॉर्पोरेट क्षेत्र को सामाजिक रूप से हाशिये पर मौजूद लोगों के लिए समान अवसर मुहैया कराने के लिए किस तरह तैयार किया जाए? साफ है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण को अनिवार्य करना इस दिशा में आगे बढऩे का गलत तरीका होगा। आखिरकार निजी कंपनियां वाणिज्यिक संगठन हैं।
 
इसका जवाब 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण में छिपा हुआ है जिससे क्षमता निर्माण किया जा सके। अगर हम 21वीं सदी में भी भारत की रगों में प्रवाहित होने वाले जातिवाद को अलग रख दें तो रोजगार और  शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के आरक्षण पर सामान्य आपत्ति का आधार यही होता है कि इनकी वजह से पहले से ही अपर्याप्त नौकरियां निम्न चयन मानक होने से गैर-लाभान्वित लोगों के लिए और कम हो जाती हैं। यह आरक्षण से लाभान्वित होने वाले लोगों के खिलाफ असंतोष एवं पूर्वग्रह को और भी बढ़ाने का काम करता है जो सकारात्मक कार्रवाई के मकसद को ही धराशायी कर देती है।
 
हालांकि वंचित समुदायों को मिलने वाला आरक्षण उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और नौकरियों तक ही सीमित है। कानून-निर्माताओं ने शायद प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों के स्तर पर कभी ध्यान नहीं दिया है जबकि अलग-अलग चयन मानक बताते हैं कि इन बच्चों की बुनियादी शिक्षा सबसे अच्छी नहीं रहती है। इस पहलू को ध्यान में रखें तो क्या यह सरकार के लिए अपनी सार्वभौम शिक्षा नीति को तिलांजलि देने और निजी एवं सरकारी सभी स्कूलों में स्कूली स्तर पर आरक्षण को अनिवार्य बनाने और इस मद में अपनी शिक्षण सब्सिडी प्रवाहित करने का वाजिब कारण नहीं बनता है? इसे लागू करने का रास्ता गरीब छात्रों के लिए स्कूल वाउचर प्रणाली में कुछ हद तक नजर आया है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ने सबसे पहले इसकी अवधारणा दी थी और दिल्ली में कुछ हद तक सफलता के साथ यह व्यवस्था लागू होती नजर आ रही है।
 
वाउचर व्यवस्था वंचित परिवारों के बच्चों को अपनी पसंद के गुणवत्तापरक स्कूलों में पढ़ाई की सुविधा देता है और उन स्कूलों को भी कोई राजस्व क्षति नहीं होती है। अमेरिका समेत कई देशों में यह व्यवस्था कारगर रही है। इस व्यवस्था में सामाजिक समता एवं अखंडता बनाए रखने और आबादी के बड़े हिस्से के लिए बेहतर शैक्षणिक  परिणाम हासिल करने का दोहरा लाभ है। अवसर की समानता से लैस होने पर सामाजिक रूप से वंचित छात्र विश्वविद्यालय या अग्रणी संस्थानों में मिलने वाली उच्च शिक्षा का पूरी तरह लाभ उठा पाने की स्थिति में होगा।
 
नौकरी इस उच्च शिक्षा से ही मिलती है। शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाने वाली कानूनी अनिवार्यता होने से कंपनियों के लिए अपनी चयन प्रक्रिया में किसी तरह का भेदभाव कर पाना न केवल मुश्किल बल्कि गैर-जरूरी भी हो जाएगा। सदियों पुरानी पूर्वग्रहों को खत्म करने के लिए सरकार के सामने एक कारगर उपकरण अमेरिका का न्यू डील प्रोग्राम हो सकता है जो नस्लभेदी अलगाव के असर को खत्म करने के लिए अमेरिकी सरकार ने असरदार तरीके से लागू किया था। ऐसे कार्यक्रम में यह अनिवार्य किया जा सकता है कि सभी सरकारी ठेकेदार कर्मचारियों के चयन में न्यूनतम सामाजिक विविधता सुनिश्चित करें। यह बिग गवर्नमेंट के लिए उपयोगी है। लेकिन ऐसे बदलाव भारत को वह न्यायपरक समाज नहीं बना पाएंगे जिसकी संकल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी। सकारात्मक सामाजिक बदलाव होने में दशकों लग सकते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी शुरुआत होने से उम्मीद की किरण तो दिखती ही है।
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