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वर्ष 2019 के लिए वृहद आर्थिक चिंतन

शंकर आचार्य /  January 15, 2019

नए वर्ष में देश में रोजगार तैयार करने और वृद्घि दर बरकरार रखने के मामले में काफी अहम चुनौतियां हैं जिनसे निपटना आसान नहीं होगा। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य

 
वर्ष 2019 आरंभ हो चुका है और यह वर्ष का वह समय है जब हम प्रमुख आर्थिक मुद्दों को लेकर विचार विमर्श करते हैं। आने वाले एक वर्ष के बारे में एक बात सुनिश्चित अंदाज में कही जा सकती है और वह यह कि इस वर्ष ऐसी प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक घटनाएं घटेंगी जिनके बारे में हमें अभी कोई अंदाजा नहीं है। भविष्य ऐसी ही महान और डरावनी अनिश्चितताओं से घिरा होता है। बीते वर्षों के दौरान भी मैं अपनी टिप्पणियों को वैश्विक और भारतीय, दो क्षेत्रों में बांटता रहा हूं।
 
वैश्विक मुद्दे
 
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश अमेरिका में वर्ष 2018 में 3 फीसदी की मजबूत वृद्घि दर्ज की गई। इसके लिए प्रमुख तौर पर असाधारण रूप से अमीर समर्थक और कर कटौती प्रोत्साहन को उत्तरदायी माना जा सकता है जो 2017 के अंत में अपनाए गए। हालांकि वर्ष 2018 की दूसरी छमाही में राष्टï्रपति ट्रंप की कारोबारी जंग संबंधी नीतियां सुर्खियों में रहीं। उत्पादन और वृद्घि पर उनका नकारात्मक असर 2019 में महसूस किया जाएगा। कर प्रोत्साहन समाप्त होने के बाद व्यापारिक युद्घ नुकसान पहुंचाएगा और ब्याज दर सामान्य हो जाएगी। मंदडि़ए विश्लेषकों को पिछली तिमाही में मंदी का संकेत भी नजर आ रहा है। ऐसा तब तक नहीं होगा जब तक कि वित्तीय बाजारों में अस्वाभाविक उथल-पुथल न हो, ट्रंप और डेमोक्रेट बहुल प्रतिनिधि सभा के बीच राजनीतिक तनाव गहरा न हो जाए या फिर चीन के साथ व्यापारिक युद्घ एकदम उच्च स्तर पर न पहुंच जाए। 
 
यूरोपीय अर्थव्यवस्था 2018 में धीमी पड़ती नजर आई है और वृद्घि दर 2019 में 1.5 फीसदी के नीचे स्तर पर रह सकती है। यह 2 फीसदी की उस अनुमानित दर से कम होगी जो अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष ने अक्टूबर में जताई थी। इसके पीछे जो कारक हैं उनमें अमेरिका के साथ कारोबारी विवाद, यूरोपीय राजनीति का बढ़ता ध्रुवीकरण, इटली में भारी कर्ज और घाटे की समस्या, जर्मनी में एंगेला मर्केल के नेतृत्व का अंत और ब्रेक्सिट का असर आदि शामिल हैं। ब्रेक्सिट के रूप में यूनाइटेड किंगडम ने आत्मघाती कदम उठाया। अगले कुछ महीनों में यह मामला भी चरम पर पहुंचेगा। 
 
अमेरिका और यूरोप में संभावित मंदी और चीन में वृद्घि में धीमापन भी चिंता की बात है। बाजार विनिमय दर के मुताबिक भी चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिकी अर्थव्यवस्था के दोतिहाई के बराबर है। चीन में जो कुछ होता है वह दुनिया को प्रभावित करता है। भारी भरकम उच्च ऋण (2009 में जीडीपी के 140 फीसदी की तुलना में अब 250 प्रतिशत) के समक्ष वहां की सरकार बैंकिंग क्षेत्र और पर्यावरण संकट से निपटने का प्रयास कर रही है। अमेरिका के साथ व्यापारिक और आर्थिक विवादों को हल करने का प्रयास होगा। बहुत संभव है कि 2019 में जीडीपी वृद्घि दर 2018 के 6.5 प्रतिशत से कम होकर 5-5.5 फीसदी रह जाए। 
 
कुल मिलाकर देखें तो संकेत यही निकलता है कि बाजार विनिमय दर पर वैश्विक आर्थिक वृद्घि घटकर 2.7 से 2.9 फीसदी के बीच रह सकती है जबकि 2018 में यह 3.2 प्रतिशत थी। इसका भारी असर विश्व व्यापार पर पड़ेगा। इकलौती सुखद खबर कच्चे तेल की कीमतों के मोर्चे पर है जो 50-60 डॉलर प्रति बैरल के सहज स्तर पर बनी रह सकती हैं। 
 
भारत से जुड़े मुद्दे
 
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए 2019 की शुरुआत कमजोर हुई। हाल ही में वित्त वर्ष 2018-19 के लिए जारी पहले अग्रिम अनुमान से यह संकेत मिलता है कि जीडीपी वृद्घि दर 7.2 फीसदी रह सकती है जो पहले जताए गए अनुमानों से कम है। पहली छमाही में 7.6 फीसदी से घटकर दूसरी छमाही में यह 6.8 फीसदी हो जाएगी। विनिर्माण क्षेत्र में खासी गिरावट आ सकती है और यह 10.3 फीसदी से घटकर दूसरी छमाही में 6.4 फीसदी हो सकता है। इतना ही नहीं आने वाले वित्त वर्ष 2019-20 में कुछ कारणों से मंदी भी देखने को मिल सकती है। कारण इस प्रकार हैं:
 
वैश्विक अर्थव्यवस्था में धीमापन आने की आशंका।
 
केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर राजकोषीय तनाव, जो जीएसटी समेत प्रमुख करों के मोर्चे पर कमजोर प्रदर्शन से उपजा है। कर्ज माफी समेत चुनाव के पहले लोकलुभावन योजनाओं के लिए व्यय प्रतिबद्घता भी एक वजह हो सकती है। इससे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और निजी निवेश दूर हो सकता है। 
 
निर्यात का कमजोर प्रदर्शन। विश्व व्यापार की धीमी वृद्घि, अधिमूल्यित विनिमय दर, उच्च सीमा शुल्क, कमजोर बुनियादी ढांचा, नोटबंदी और जीएसटी का छोटे निर्यातकों पर प्रभाव तथा नीतिगत विचलन ने इसे प्रभावित किया है। 
 
सरकारी बैंकों में फंसे हुए कर्ज की स्थिति तथा गैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र की हाल में सामने आई कमजोरी भी एक वजह हो सकती है। 
 
पहली तिमाही में आगामी आम चुनाव से जुड़ी अनिवार्य अनिश्चितताएं भी हमारे सामने होंगी। 
 
इन बातों के मद्देनजर लगता है कि आर्थिक वृद्घि दर 7 फीसदी से नीचे ही रहेगी। बल्कि यह 6 फीसदी भी रह सकती है।  रोजगार के मोर्चे पर ठहराव चिंता का विषय है। इस संबंध में आधिकारिक आंकड़े सात वर्ष पुराने हैं। सितंबर-दिसंबर 2018 के बीच सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकनॉमी द्वारा 140,000 परिवारों पर किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक बेरोजगारी का आंकड़ा 7.4 फीसदी के साथ 15 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। इतना ही नहीं बेरोजगारों की तादाद भी 2018 में 1.1 करोड़ बढ़ गई। रोजगार गंवाने वाले लोगों में महिलाओं की भी अच्छी खासी संख्या थी। इनमें भी तीन चौथाई ग्रामीण इलाकों से थीं। अगर यह तस्वीर आंशिक रूप से भी सही है तो भी यह परेशान करने वाली है। कहा जा सकता है कि वर्ष 2019 में वृद्घि और रोजगार निर्माण को लेकर वृहद आर्थिक चुनौतियां हमारे सामने हैं।
 
(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: employment, BJP, narendra modi,,
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